गुप्तोत्तर कालीन साहित्य - Literature in post Gupta Period
गुप्तोत्तर कालीन साहित्य - Literature in post Gupta Period
सांस्कृतिक दृष्टि से गुप्तोत्तर काल (500-1200 ई.) में क्षेत्रीय सांस्कृतिक इकाइयों का आविर्भाव हुआ। आसाम, बंगाल, गुजरात, राजस्थान, उड़ीसा आदि सभी अपना पृथक् सांस्कृतिक अस्तित्व बना रहे थे। 8वीं शताब्दी के एक जैन ग्रंथ 'कुवलयमाला' में 18 प्रमुख राष्ट्रों तथा 16 प्रकार के लोगों की सांस्कृतिक विशिष्टताओं का वर्णन किया गया है। गुप्तोत्तर काल में बाणभट्ट का हर्षचरित, हर्षवर्धन के नागानंद, प्रियदर्शिका, रत्नावली, वाक्पति का गउड़वहो या गोड़वहो, बल्लाल का भोजप्रबंध, राजशेखर की कर्पूरमंजरी एवं काव्यमीमांसा राजा भोज के सरस्वतीकंठाभरण और शृंगार प्रकाश आचार्य हेमचंद्र का शब्दानुशासन, भवभूति का मालतीमाधव, महावीरचरितम् और उत्तररामचरितम्, जयानक की पृथ्वीराजविजय महाकाव्य, कल्हण की राजतरंगिणी इत्यादि अनेकानेक साहित्यिक कृतियों का सृजन हुआ।
उपर्युक्त साहित्यिक कृतियाँ भाषा एवं शैली की दृष्टि से उत्कृष्ट थीं। अधिकांश कृतियों का सृजन संस्कृत में ही हुआ। भाषा एवं साहित्य में इस काल में क्षेत्रीयता के चिह्न देखे जा सकते हैं। संस्कृत के प्रयोग में क्लिष्टता एवं कृत्रिमता आती जा रही थी। अपभ्रंश का विकास आद्य हिंदी, आद्य बंगाली, आद्य राजस्थानी, गुजराती एवं आद्य मराठी में हो रहा था। क्षेत्रीय भाषाओं के साथ-साथ क्षेत्रीय लिपियाँ भी विकसित हो रही थीं। मौर्य से गुप्तकाल तक आते-आते ब्राह्मी लिपि ही प्रमुख लिपि थी एवं इसमें समय के साथ-साथ परिवर्तन होते रहे, किंतु इसके बावज़ूद भी यदि कोई गुप्त ब्राह्मी लिपि पढ़ना जानता हो तो वह भारत में तत्युगीन किसी भाग का अभिलेख पढ़ सकता था,
लेकिन गुप्तोत्तर काल में यह संभव नहीं रहा क्योंकि कई क्षेत्रीय लिपियों का उदय हो चुका था।
इस प्रकार हम देखते हैं कि भाषा एवं साहित्य के क्षेत्र में क्षेत्रीयता के उदय ने भाषा एवं साहित्य की प्रगति ही की। विभिन्न भाषाओं एवं शैलियों का आविर्भाव हुआ। इसी काल में सर्वप्रथम कल्हण ने राजतरंगिणी के रूप में एक पूर्ण ऐतिहासिक ग्रंथ की रचना की। अतः गुप्तकाल एवं उसके पश्चात् का काल साहित्य के सृजन का उत्कृष्ट काल था।
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