महाक्षत्रप रुद्रदामन - Mahakshatrapa Rudradama

महाक्षत्रप रुद्रदामन - Mahakshatrapa Rudradama


मालवा के क्षत्रप चस्टण का पुत्र जयदामन केवल क्षत्रप ही था। वह अपने पिता के बाद महाक्षत्रप नहीं हुआ जैसा कि अन्दौ अभिलेख से ज्ञात होता है, जहाँ चस्टण के साथ जयदामन पुत्र रुद्रदामन को उपराज (क्षत्रप) के रूप में उल्लिखित किया गया है। स्पष्ट है कि जयदामन अपने पिता के साथ क्षत्रप की भाँति उल्लिखित नहीं किया गया है। इससे स्पष्ट होता है कि जयदामन अपने पिता के जीवन काल में ही मृत्यु को प्राप्त हो गया था और चस्टण के साथ उसका पौत्र रुद्रदामन उपराज था। भविष्य में चस्टण की मृत्यु के बाद ही रुद्रदामन महाक्षत्रप हो गया, जैसा कि उसके चाँदी के सिक्कों से ज्ञात होता है।


शक क्षत्रप में रुद्रदामन (130-150 ई.) सर्वश्रेष्ठ है, क्योंकि उसके लेख और मुद्राएँ बाहुल्यता से प्राप्त होती हैं। उसकी सबसे प्रसिद्ध लिपि जूनागढ़ शिलालेख है, जिसमें सुदर्शन झील का इतिहास तथा उसकी विजय और उपलब्धियों का वर्णन किया गया है। जूनागढ़ अभिलेख ही प्रथम बड़ा संस्कृत अभिलेख है, जिससे हमें उस युग के संस्कृत गद्यकाव्य के स्वरूप का दर्शन होता है। अतः इसका न केवल राजनैतिक महत्व ही है वरन् उसका साहित्यिक महत्व भी है। सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि एक शक होते हुए भी उसके शासन काल में भारतीय संस्कृति के मूलांकुर संस्कृत कारूप प्रथमत: दृष्टिगत हुआ था। प्रो. कीलहान ने सर्वप्रथम इसका अनुवाद किया था।



किसी भी शासक के श्रेष्ठत्व का कारण उसका चरित्र और व्यक्तित्व होता है। जूनागढ़ लेख की पंक्ति में उल्लिखित है कि वह गुरुओं के संपर्क में आया था और उन्होंने ही उसे रुद्रदामन की संज्ञा दी थी।


विद्यादक्षता


जूनागढ़ लेख में उसे शब्दार्थ, संगीत, न्याय आदि विद्याओं में कुशल होने के कारण यशस्वी कहा गया है। व्याकरण और मीमांसकों ने क्रमश: 'शब्द' और 'अर्थ' प्रमाणों को स्वीकार किया है। 'शब्दार्थ' से तात्पर्य शब्द-शास्त्र और अर्थशास्त्र से भी हो सकता है। शब्दार्थ के पारण धारण-विज्ञान और प्रयोग से उसका काव्याभ्यास और काव्य-3 य प्रतिभा का परिचय मिलता है।

आचार्य मम्मट ने काव्य के स्वरूप और लक्षणों पर विचार करते हुए शब्दार्थ युगल पदरचना को काव्य कहा है। इसी लेख में आगे चलकर, पंक्ति 14 में इसे विविध शब्द और अलंकारों से युक्त गद्य-पद्य काव्य-विधान में प्रवीण कहा गया है।


शारीरिक दक्षता


रुद्रदामन का शरीर सुडौल, सुंदर और सौष्ठव था एवं वाणी संगीत व व्याकरण के नियमों से परिबद्ध, शुद्ध थी। इससे स्पष्ट सिद्ध होता है कि वह गंधर्व विद्या में भी प्रवीण था।


सैनिक दक्षता


जूनागढ़ लेख की पंक्ति 13 में उल्लिखित है कि उसने घोड़े, हाथी और रथ विद्याओं में भी कुशलता प्राप्त की थी। असि चर्म (ढाल-तलवार) के युद्ध में भी वह कुशल था। इसी रण दक्षता के कारण वह शत्रुओं का नित्य पराभव कर सका।


धर्म प्रेम


रुद्रदामन के चरित्र और व्यक्तित्व में शिक्षा और विद्या का यह वांछनीय प्रभाव ही था कि उसमें धर्म के प्रति अनुराग था। गो-ब्राह्मण की रक्षा अथवा उन्नति के लिए उसने धर्म कीर्ति का विस्तार किया था। उसका धार्मिक अनुराग इस तथ्य से भी सिद्ध होता है कि प्राणि-वध निवृत्ति की उसने सत्य प्रतिज्ञा की थी। इस प्रकार उसके चरित्र में दया का स्थान था, जिसके कारण शरण में आए हुए लोगों को वह शरण देता है।


राजकीय दक्षता


जन्म से लेकर राजत्व की प्राप्ति तक रुद्रदामन राजगुणों और लक्षणों से विभूषित था। इसीलिए सभी वर्गों के लोगों ने अपनी रक्षा के लिए उसे अपना स्वामी (राजा) चुना था। जूनागढ़ लेख में यह भी उल्लिखित है

कि उसने स्वयं ही अपने पराक्रम से महाक्षत्रप के पद को प्राप्त किया था।


उसके पौरुष, पराक्रम तथा रूप कांति का प्रमाण इस बात से भी प्राप्त होता है कि उसने स्वयं वरों में अनेक राजकन्याओं को प्राप्त कर अपनी शक्ति, शौर्य और सौंदर्य से राज सभा को प्रभावित किया, जिसके फलस्वरूप वहीं उसको मालाओं से विभूषित किया गया।


साम्राज्य विस्तार


जूनागढ़ शिलालेख में ही रुद्रदामन को स्ववीर्यजित जनपदों वाला अर्थात् अपने पराक्रम से राज्यों को जीतकर साम्राज्य का स्थापक और शासक (महाक्षत्रप) कहा गया है। ये जनपद निम्नलिखित थे


अवंति


यह पश्चिमी मालवा का प्राचीन नाम था, जिसकी राजधानी उज्जयिनी थी।


अनूप


अनूप देश को विंध्यप्रदेश में स्थित बताया गया है, जो नर्मदा के किनारे स्थित था और हैहयों का प्रसिद्ध नगर माहिष्मति इसकी राजधानी थी। इसीलिए अनूप देश हैहय देश भी कहलाता था। अवति के निवासी भी हैहयों की एक शाखा थी। राजा महिष के द्वारा स्थापित माहिष्मती नर्मदा के तट पर स्थित थी, जिसकी पहचान डॉ. सरकार और बी. सी. ला द्वारा मान्धाता ( आधुनिक नीमाड़, म.प्र.) से की गई है; परंतु अन्य विद्वान इसकी पहचान इन्दौर से 40 मील दक्षिण नर्मदा के तट पर स्थित महेश्वर अथवा महेश से करते हैं। यह चेदि मंडल में स्थित कलचुरियों की राजधानी थी।


नीवृत


स्कंदपुराण की कुमारिकाखंड देशतालिका में नीवृत को एक मंडल कहा गया है, जिसमें 4 करोड़ गाँव सम्मिलित थे। जूनागढ़ अभिलेख में भी इसका नाम जनपद की तालिका में दिया गया है। यह पश्चिमी भारत में स्थित था। वृष्णि के पुत्र का नाम निवृत्ति था। निवृत्ति से बसाया हुआ या शासित देश ही नीवृत कहलाया, जिसको पश्चिमी भारत में वृष्णियों के राज्य से ही अथवा उसके किसी भाग से इसका तादाम्य कर सकते हैं।


आनर्त


यह उत्तरी गुजरात का भाग था, जिसकी राजधानी द्वारिका थी।


सुराष्ट्र


यह सौराष्ट्र या काठियावाड़ था।


यह साभ्रमती की घाटी थी। इस प्रदेश में खेटक भी सम्मिलित था।


मरु


यह राजस्थान का प्रसिद्ध मारवाड़ देश था जिसे मरु-मंडल, मरुभूमि अथवा मरुस्थल भी कहा गया है। जल और वनस्पति की कमी के कारण ही इसका यह नाम पड़ा।


कच्छ


यह प्राचीन काल में कच्छेल्ल भी कहलाता था। यह आधुनिक कच्छ ही है।


सिंधु- सौवीर


यह सिंधु की निचली घाटी थी।


कुकुर


सिंधु और पारियात्र पर्वत के बीच स्थित भूखंड है, जिसमें राजपूताना और उत्तरी गुजरात के कुछ भाग सम्मिलित थे।


अपरांत


यह उत्तरी कोंकण का क्षेत्र था।


निषाद


इन्हें विंध्य पर्वत का निवासी कहा गया है। डॉ. रायचौधरी इन्हें पश्चिमी विंध्य और सरस्वती की घाटी में स्थित बताते हैं।


पश्चिमी भारत में समुद्र तट पर रहने वाली यह एक जाति थी। इससे रुद्रदामन का समुद्रपर्यंत पृथ्वी पर आधिपत्य सिद्ध होता है।


यौधेयों पर विजय


जूनागढ़ शिलालेख में ही उल्लिखित है कि रुद्रदामन ने उन यौधेयों को पराजित किया था, जिन्हें संपूर्ण क्षत्रियों ने अपना वीर मान लिया था। इसलिए जो अपने को अजेय मानते हुए उद्धत् स्वभाव के हो गए थे, रुद्रदामन ने बलपूर्वक उनका उन्मूलन किया । यौधेय एक प्राचीन प्रसिद्ध गण जाति थी, जिसने इतिहास में अपनी भूमि भक्ति और सैन्य शक्ति से विदेशियों के विरुद्ध युद्ध करते हुए अपने देश की रक्षा की थी। सिक्कों के आधार पर ऐसा माना गया है कि उन्होंने कुषाणों के विरुद्ध एक संघ बनाया था। इस अभिलेख के कथन से कि सभी क्षत्रियों ने उसे अपना नेता चुना था, इससे सिद्ध होता है कि उसका तत्कालीन राजनैतिक जीवन में कितना महत्व था।


शातकर्णि पर विजय


जूनागढ़ लेख में उल्लिखित है कि रुद्रदामन ने दक्षिणापथ के शासक शातकर्णि को युद्ध में दो बार पराजित किया, किंतु संबंधों की निकटता के कारण उसके प्राण नहीं लिए। इन युद्धों में रुद्रदामन ने शातकर्णि को पराजित कर यश प्राप्त किया, डॉ. रायचौधरी का विचार है कि यह वसिष्ठ पुत्र शातकर्णि था। किंतु विद्वानों में इस विषय पर मतभेद हैं।


इन विजयों के अतिरिक्त रुद्रदामन को शत्रुओं को पराजित करने वाला बताया गया है। उसने अन्य भ्रष्ट राज्यों को भी प्रतिष्ठापित किया था, किंतु डॉ. चट्टोपाध्याय का विचार है

कि इसका वास्तविक महत्व स्पष्ट नहीं है। समुद्रगुप्त के समान उसने संभवत: पराजित राजाओं को अपना यशवर्ती बनाकर फिर से प्रस्थापित कर दिया था।


इस प्रकार स्पष्ट है कि शक महाक्षत्रप रुद्रदामन प्रथम की बहुमुखी प्रतिभा, प्रज्ञा और पराक्रम के द्वारा स्थापित कीर्ति तत्कालीन राजनैतिक इतिहास में उसी प्रकार प्रसिद्ध हो गई जैसे कि इस युग के अन्य महान शासकों खारवेल और गौतमीपुत्र शातकर्णि की प्रतिष्ठा थी, किंतु मुख्य बात यह है कि उसने एक विदेशी होते हुए भी भारतीय संस्कृति, समाज, साहित्य और धर्म का पालन किया। वह प्रजावत्सल सम्राट था, जिसने अपने विजित राज्य को उदार शासन व्यवस्था द्वारा संगठित किया और इसीलिए यह राज्य अंततः समकालीन शक्तियों से संघर्ष करता हुआ उस समय तक बना रहा जब तक चन्द्रगुप्त द्वितीय (विक्रमादित्य) को स्वयं ही उनके विरुद्ध संघर्ष करना पड़ा।


शासन प्रबंध


प्राचीन स्रोतों से स्पष्ट है कि सभी वर्गों के लोगों ने उसे अपना राजा चुना था। इससे उसकी लोकप्रियता का पता चलता है। उसके साम्राज्य में विभिन्न जनपदों तथा नगरों और निगमों के लोग दस्युओं, सर्पों, हिंसक पशुओं और रोगों से मुक्त थे तथा संपूर्ण प्रजा उससे अनुक्त थी। इस प्रजा प्रेम का साक्ष्य इसी बात से मिलता है कि सुदर्शन झील की मरम्मत हेतु उसने अपने ही कोष से प्रजा को बिना कष्ट दिए हुए अर्थात् बिना कर लगाए हुए राशि स्वीकृत की थी। अतः स्पष्ट है कि रुद्रदामन एक 'प्रजा प्रणय' से परिपूर्ण जनप्रिय शासक था।


प्राचीन हिंदू व्यवस्था का सिद्धांत है कि कर-नीति अत्यंत उदार होनी चाहिए। किसी भी राज्य के शासन की सफलता कोष की समृद्धि पर निर्भर करती है। रुद्रदामन का कोष सोना, चाँदी, रत्न और अन्य बहुमूल्य वस्तुओं से भरा हुआ था, जिन्हें उसने न्याय से धर्मानुसार प्राप्त किया था। इन्हें उसने बलि, शुल्क व भाग के रूप में प्राप्त किया था। इस प्रकार उसका कोष आवश्यक संपत्ति और सामग्री से परिपूर्ण था। कामन्दकीय नीतिसार में भी कोष को मुक्ता, कनक रत्न आदि से भरा हुआ एवं पूर्वजों द्वारा प्राप्त तथा धर्मार्जित बताया गया है।


सेना


सेना भी राज्य का महत्वपूर्ण अंग थी, जिसकी कुशलता पर शासन की सफलता और राज्य की सुरक्षा निर्भर करती है।

रुद्रदामन प्रथम कुशल सेनानायक था, जो रण-विद्या में भी दक्ष था। उसकी सेना चतुरंगिणी थी। असिचर्म युद्ध अर्थात् ढाल-तलवार का युद्ध अधिक प्रचलित था।


मंत्री


रुद्रदामन की शासन पद्धति में सचिवों और अमात्यों का भी महत्वपूर्ण स्थान था । मति सचिव और कर्म सचिवों का उल्लेख मिलता है। मति सचिव अथवा धी सचिव मंत्रणा देने वाला अमात्य था और कर्म-सचिव कार्यकर्ता था। ये सचिव अमात्य गुणों से युक्त थे। इस प्रकार ददामन के शासन में मंत्र-संपद का भी महत्व था। स्पष्ट है कि रुद्रदामन की शासन पद्धति भी प्रचलित प्राचीन सप्तांग राज्य- व्यवस्था पर आधारित थी।


राष्ट्र की समृद्धि के लिए ही सिंचाई का उत्तम प्रबंध किया गया था। इसीलिए रुद्रदामन ने सुदर्शन झील के महत्व को जानते हुए उसकी मरम्मत कराई थी।