मध्यकालीन भारत और स्त्री : भक्ति आंदोलन का इतिहास, उद्भव एवं विकास - Medieval India and Women: History, Origin and Growth of the Bhakti Movement

मध्यकालीन भारत और स्त्री : भक्ति आंदोलन का इतिहास, उद्भव एवं विकास - Medieval India and Women: History, Origin and Growth of the Bhakti Movement


भक्ति आंदोलन एक अखिल भारतीय सांस्कृतिक आंदोलन था जिसका उद्भव दक्षिण में हुआ। उत्तर भारत से बहुत पहले भक्ति का प्रादुर्भाव दक्षिण में हो चुका था। दक्षिण से ही यह उत्तर भारत में आया। इसके विषय में कहा गया है कि-


भक्ति द्रविड़ ऊपजी, लाये रामानंदा परगट कियो कबीर ने, सप्त द्वीप नव खंडा


इस संबंध में रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है “उत्तर भारत में जब वैष्णव भक्तों का जमाना आया उसके पहले ही दक्षिण के आलवार संतों में भक्ति का बहुत कुछ विकास हो चुका था और वहीं से भक्ति की लहर उत्तर भारत में पहुँची।" आलवार संतों के साथ नयनार संतों का भी उल्लेख आता है। डॉ सुनीता गुप्ता ने लिखा है,

“भक्ति आंदोलन का प्रारंभ आठवीं सदी के पूर्वार्द्ध में तमिल आलवार व नयनार संतों द्वारा हुआ।" इसके बाद भक्ति आंदोलन के प्रसार और दक्षिण से उत्तर आने और अखिल भारतीय स्तर पर फैलने का विवरण देती हुई वे लिखती हैं, "तमिल के बाद बारहवीं सदी में कर्नाटक में इसका प्रसार हुआ और बारहवीं से सत्रहवीं सदी तक महाराष्ट्र में यह फैला और बंगाल, उड़ीसा व असम आदि पूर्वोत्तर प्रांतों को इसने पंद्रहवीं शताब्दी में स्पर्श किया। पंद्रहवीं से सोलहवीं शताब्दी के बीच ही इसने हिंदी प्रदेशों तथा राजस्थान, गुजरात, पंजाब व कश्मीर में प्रवेश किया। इस प्रकार भक्ति आंदोलन मध्यकाल में दक्षिण से लेकर पूर्वोत्तर तथा मध्यवर्ती व उत्तर- हर दिशा को स्पर्श करता है।"


भक्ति आंदोलन के उद्भव की स्थितियों पर प्रकाश डालते हुए शहनाज बानो लिखती हैं, "यह वह समय था जब भारतीय समाज इतिहास की अनेक संक्रांतियों के बीच से गुज़र रहा था। राजनैतिक अव्यवस्था एवं सामाजिक उत्पीड़न अपने चरम पर था। अनेक प्रकार की कुप्रथाओं ने जड़ें जमा ली थीं तथा धर्म बाह्याडम्बर और निरर्थक कर्मकांड से आक्रांत हो गया था। ऐसे समय में दक्षिण भारत के साथ- साथ उत्तर भारत में भी भक्ति का उन्मेष हुआ और भक्ति के विविध रूप सामने आए. रामानुज और मध्वाचार्य तथा निम्बार्क ने अद्वैतवाद मायावाद का खंडन करते हुए भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया और अपने-अपने संप्रदायों की स्थापना करके उसके संघटित प्रचार का उपक्रम किया। इन सभी ने उत्तर भारत में अपने केंद्र स्थापित करके भक्ति आंदोलन को गति दी।

भक्ति आंदोलन एक ऐसे धार्मिक आंदोलन के रूप में सामने आया, जो भावना पर बल देता था। यह भावना के धरातल पर समानता को प्रमुख मानता "था।"


दक्षिण भारत के भक्ति आंदोलन से उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन में कतिपय मूलगामी अंतर हैं। उत्तर भारत के भक्ति आंदोलन में वर्णाश्रम व्यवस्था जातिवाद इत्यादि पर आधारित भेदभाव का विरोध है। बाह्याडंबर तथा कर्मकांड का भी विरोध है। शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा उत्तर भारत में नाथों और सिद्धों के प्रभावस्वरूप घटित हुआ। शहनाज बानो ने लिखा है, "उत्तर भारत में भक्ति की विचारधारा तो दक्षिण से आई, लेकिन वह यहाँ पर खरे, आग्रही, विद्रोही तथा आक्रामक रूप में उपस्थित हुई।

इसके लिए नाथ - सिद्धों की आत्मविश्वासी और वर्णव्यवस्था का तीव्र विरोध करने वाली परंपरा उत्तरदायी है।" भक्ति काल पर हुई नवीनतम शोधों का भी यही निष्कर्ष है कि दक्षिण और उत्तर के भक्ति आंदोलन के स्वरूप और अंतर्वस्तु में अंतर है और यह अंतर नाथों और सिद्धों के प्रभावस्वरूप उपस्थित हुआ। डॉ. सेवा सिंह की पुस्तक 'भक्ति और भक्ति आंदोलन की भूमिका 'भक्ति, भक्तीकरण और भक्तिवादी प्रतिक्रियावाद' में डॉ. विनोद शाही ने लिखा है, “भक्ति का मूल चरित्र ब्राह्मणवादी है और सत्तामूलक संस्कृतीकरण की विचारधारा की तरह अपना विकास करती है। यह बात पूर्ववत् बनी रहती है, अंतर यह सामने आता है कि उत्तर भारत में अब तक सिद्धों और नाथों के व्यापक प्रभाव के समानांतर सूफियों की मार्फत इस्लाम का प्रभाव भी जनमानस पर स्पष्ट नजर आता है।"


भक्ति आंदोलन के उद्भव एवं विकास और व्यापक प्रसार के मूलभूत कारण अनेकानेक रहे हैं। राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक, आध्यात्मिक इत्यादि, किंतु सामाजिक कारण अत्यंत प्रबल थे। इसके परिणाम भी मूलतः सामाजिक ही रहे। इसके मूल में वर्णाश्रम व्यवस्था एवं जातिप्रथा का विरोध अंत:प्रेरणा की तरह काम कर रहा था। के. दामोदरन ने यह उचित ही लिखा है, “समय की माँग थी कि जाति-पांति और धर्मों के भेदभाव पर आधारित तुच्छ सामाजिक विभाजनों का, जो घरेलू बाज़ार के विकास और परिणामस्वरूप होने वाले परिवर्तनों के कारण अब एकदम निरर्थक हो गये थे, अंत किया जाए। ईश्वर के सम्मुख सभी प्राणियों की समानता का सिद्धांत उस नई सामाजिक चेतना का द्योतक था,

जो सामंती शोषण के विरुद्ध जूझने वाले किसानों और कारीगरों में फैल रही थी। व्यक्ति के गुणों और योग्यताओं पर जोर, जो ऊँची जाति या किसी विशिष्ट वंश में जन्म लेने के फलस्वरूप प्राप्त सुविधाओं के विपरीत था, व्यक्तिगत स्वतंत्रता की ऐतिहासिक आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति थी। व्यक्तिगत स्वतंत्रता का यह नारा, एक नए पूँजीपति वर्ग का, जिसका कि उदय हो ही रहा था नारा था। ये विचार धार्मिक अर्थों में भी, निःसंदेह, मध्ययुग की उन परिस्थितियों को देखते हुए, जिनमें जाति-पाति की स्पर्धा और अंधविश्वासों के फलस्वरूप समाज का प्रगति करना असंभव हो गया था, प्रगतिशील थे।"