मध्यकालीन भारत और स्त्री : विभिन्न धर्मो में स्त्री - Medieval India and Women: Women in Different Religions

मध्यकालीन भारत और स्त्री : विभिन्न धर्मो में स्त्री - Medieval India and Women: Women in Different Religions


भारत के प्रमुख धर्म


संसार में अनेकानेक धर्म पाए जाते हैं। दुनिया में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ कोई-न-कोई धर्म न हो। धर्मों के भी उपधर्म या शाखाएँ पाई जाती हैं। जहाँ तक भारत की बात है, यहाँ भी अनेकानेक धर्म पाए जाते हैं। मोटे तौर पर भारत में प्रमुखतः छह धर्म पाए जाते हैं- हिंदू धर्म, इस्लाम धर्म, ईसाई धर्म, बौद्ध धर्म, जैन धर्म और सिख धर्मी


संक्षेप में इनका परिचय इस प्रकार है-


हिंदू धर्म हिंदू धर्म भारत का प्राचीनतम धर्म है। माना जाता है कि यह भारत का ही नहीं, अपितु दुनिया के प्राचीनतम धर्मों में से एक है।

हिंदूधर्म किसी एक विशिष्ट सिद्धांत या मतवाद पर आधारित नहीं है, अपितु यह एक बहुलतामूलक धर्म है। यहाँ जो जिस पर चाहे विश्वास कर सकता है। कोई चाहे तो एकेश्वरवादी हो सकता है, कोई चाहे तो बहुदेववादी हो सकता है और कोई चाहे तो नास्तिक भी हो सकता है।


हिंदू धर्म के समस्त प्राचीन पवित्र ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। इनमें 'वेद' सर्वप्रमुख एवं प्राचीनतम हैं। वेद का अर्थ है- ज्ञान। वेद चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

इनमें ऋग्वेद सबसे प्राचीन है। इसमें अनेक ईश्वरों, ब्रह्मांडों की चर्चा की गई है। वेदों के अतिरिक्त उपनिषद दूसरे बड़े हिंदू धर्म ग्रंथ माने जाते हैं। इनमें ब्रहमांड की उत्पत्ति पर विचार कियागया है। उपनिषदों में आत्मा और परमात्मा के संबंधों पर विचार किया गया है। महाकाव्यों में रामायण एवं महाभारत भी हिंदू धर्म से जुड़े ग्रंथ हैं। महाभारत का एक अंश गीता' हिंदुओं का बहुत महत्वपूर्ण ग्रंथ माना जाता है। इन सबके अलावा पुराण - जिनकी संख्या अट्ठारह मानी जाती है, हिंदुओं के महत्वपूर्ण ग्रंथ माने जाते हैं। हिंदू धर्म की तीन प्रमुख धाराएँ मानी जाती हैं- वैष्णव, शैव एवं शाक्त।


हिंदू धर्म में वर्णाश्रम व्यवस्था, सोलह संस्कार, पुनर्जन्म, स्वर्ग-नर्क, आवागमन चक्र, नवग्रह जैसी अवधारणाएँ पाई जाती हैं।


इस्लाम धर्म


इस्लाम धर्म की स्थापना सातवीं शताब्दी में अरब में हजरत मुहम्मद द्वारा की गई थी। इस्लाम दुनिया के सबसे बड़े धर्मों में से एक है। मक्का और मदीना इस्लाम के सबसे बड़े धर्म-स्थल माने जाते हैं, जहाँ हजरत मुहम्मद रहे और आवाजाही करते रहे।


इस्लाम एकेश्वरवादी धर्म है। इस्लाम को मानने वाले मुसलमान कहलाते हैं। मुसलमान हजरत मुहम्मद को अल्लाह का पैगंबर/ नबी मानते हैं। पैगंबर हजरत मुहम्मद के इंतकाल के एक सौ साल के अंदर-अंदर इस्लाम पूरी दुनिया में फैल गया।


'कुरान' इस्लाम धर्म का मूल ग्रंथ है। कुरान को ईश्वरीय किताब माना जाता है,

जिसे स्वयं अल्लाह ने फरमाया हैं। मुसलमानों का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ है, 'हदीस', जिसमें पैगंबर के कथन- अभिकथन हैं।


एक धारणा के अनुसार 'इस्लाम' का अर्थ है- 'अल्लाह की मर्जी के प्रति समर्पण इस्लाम के अनुसार अल्लाह सर्वशक्तिमान है। वही मनुष्यता का भविष्य तय करता है, भाग्य का फैसला करता है। अच्छे, पुण्य के काम / नेकी करने वालों को वह जन्नत बख्शता है जबकि पाप कर्म / बदी करने वालों को दोजख में भेज देता है। यह अल्लाह का फैसला होता है।


इस्लाम के सच्चे अनुयायी मुसलमान के पाँच करणीय कर्तव्य माने गए हैं; अल्लाह पर भरोसा,


• पाँच वक्त की नमाज, गरीबों और मस्जिदों की मदद, रमजान के महीने में रोजेदारी और यदि स्वास्थ्य और आर्थिक स्थिति इजाजत दे तो जिंदगी में कम-से-कम एक बार हज यात्रा । मुसलमान लोग हफ्ते में एक दिन शुक्रवार(जुम्मा) को सामूहिक नमाज के लिए मस्जिद में


इकट्ठा होते हैं। इमाम उनका धार्मिक नेतृत्वकर्ता होता है, जो धार्मिक शिक्षा देता है। इस्लाम मुख्यतः दो


धड़ों में बँटा हुआ है- शिया और सुन्नी इस्लाम में सुन्नी बहुसंख्या में पाए जाते हैं।


ईसाई धर्म


ईसाई धर्म एकेश्वरवादी धर्म है, जिसकी स्थापना यीशु (जीसस) के अनुयायियों ने उनको सूली पर चढ़ाए जाने के बाद की। द न्यू टेस्टामेंट गोस्पेल्स में यीशु (जीसस) को एक शिक्षक / उपदेशक तथा चमत्कारी शख्सियत कहा गया है। लिहाजा जेरुसलम में उन्हें क्रूरतापूर्वक सजा देते हुए सूली पर टांगकर मार दिया गया था।


यीशु (जीसस) ने ईश्वर की बादशाहत की उद्घोषणा की थी, जो रोमन साम्राज्य पर भारी पड़ती थी। जीसस ने हृदय परिवर्तन, अपने पापों के लिए पश्चाताप, ईश्वर और पड़ोसियों के प्रति प्रेम तथा न्यायप्रियता को ईश्वर की सत्ता में भागीदारी के लिए आवश्यक अर्हता माना था। तत्कालीन रोमन साम्राज्य इसे अपने लिए चुनौती मानता था तथा इससे भयभीत था ।


यीशु (जीसस) की मृत्यु के पश्चात् उनके अनुयायियों ने उन्हें क्राइस्ट मसीहा घोषित कर दिया। ईसाई धर्म यहूदीवाद/यहूदी धर्म से निकला था। ईसाई मूलतः एक मिशिनरी धर्म रहा है। ईसाई धर्म की उत्पत्ति के विषय में कहा गया है. "ईसाई धर्म को जनसाधारण की उस हताशा की मनःस्थिति ने जन्म दिया, जिसे वे रोमन प्रभुत्व तथा शोषक वर्गों के विरुद्ध दासों के विद्रोहों, गरीबों तथा पराधीन जनगण की कार्रवाइयों के दमन के बाद विशेष तीक्ष्णतापूर्वक अनुभव कर रहे थे।" (फ्रोलोव, आई. टी., संपादक, दर्शनकोश; हिंदी अनुवाद, प्रगति प्रकाशन, मास्को /सो.सं. 1988; ISBN 5-01000907-2 पृष्ठ-93) 1


अगले मात्र दो सौ वर्षों में ईसाई धर्म दुनिया के अनेक देशों तक फैल गया।

आगे चलकर यह रोमन साम्राज्य का राजकीय धर्म बना। ईसाई धर्म का धार्मिक स्थल चर्च कहलाता है। बाइबिल ईसाईयों का धर्मग्रंथ है।


ईसाई धर्म दो धाराओं में बँटा है- कैथोलिक तथा प्रोटेस्टेंट। ईसाई धर्म दुनिया का सर्वाधिक प्रचलित धर्म है। बहुत सारे चर्च तथा पंथ उसका प्रतिनिधित्व करते हैं। ईसाई धर्म पर्याप्त जनतांत्रिक धर्म माना जाता है। यह धर्म जन-आकांक्षाओं का खयाल रखने वाला धर्म माना जाता है। ईसाई धर्म के “विशिष्ट कार्यकलाप तथा राजनैतिक दिशाएँ उनके अस्तित्व की ठोस सामाजिक अवस्थाओं से निर्धारित होती हैं।" (वही; पृष्ठ-वही)।


बौद्ध धर्म


बौद्ध धर्म की स्थापना ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तर भारत में सिद्धार्थ गौतम बुद्ध द्वारा की गई थी।

मनुष्य जीवन के विभिन्न कष्टों, जैसे- वृद्धावस्था, शवयात्रा, अस्वस्थता इत्यादि, को देखकर उन्हें वैराग्य हो गया तथा वे इन समस्याओं के निदान के लिए घर से निकल पड़े। उनतीस साल की उम्र में बोधि वृक्ष के नीचे उन्हें अंतर्दृष्टि, ज्ञान की प्राप्ति हुई ।


बुद्ध के उपदेश हिंदू धर्म के उपदेशों से तत्वतः भिन्न थे। हिंदू धर्म ब्राह्मण वर्चस्ववादी धर्म था। हिंदू धर्म में समस्त धार्मिक आयोजनों के संयोजन का दायित्व एवं अधिकार केवल ब्राह्मण जाति से जुड़े लोगों को था। माना जाता था कि ब्राह्मण ईश्वर का प्रतिनिधि है और वही ज्ञानदृष्टि से संपन्न हो सकता है, जबकि बुद्ध ने कहा कि कोई भी व्यक्ति, जो ऐसा चाहे, वह ज्ञानदृष्टि प्राप्त कर सकता है। बुद्ध की दृष्टि में ज्ञान / अध्यात्म पर किसी एक व्यक्ति या जाति या समूह/नस्ल का एकाधिकार नहीं है। इसके दरवाजे हर किसी के लिए खुले हैं। बौद्ध धर्म के व्यापक प्रसार के पीछे बुद्ध का यही समतामूलक दृष्टिकोण रहा है।


बुद्ध ने चार महानतम सत्यों का प्रतिपादन किया था जिन्हें चार आर्य सप्पती कहा जाता है- 1. समस्त प्राणी दुःख के भागी होते हैं 2. दु:ख की उत्पत्ति का कारण कामइच्छाएँ हैं 3. इच्छाओं पर विजय प्राप्त की जा सकती है और 4 इच्छाओं से मुक्त होने का एक निश्चित मार्ग है। यह मार्ग महान अष्टांगिक मार्ग है; जो इस प्रकार है- सम्यक दृष्टि, सम्यक संकल्प, सम्यक वाचा, सम्यक कर्म, सम्यक आजीविका, सम्यक व्यायाम, सम्यक स्मृति और सम्यक समाधि गौतम बुद्ध ने 'अनात्मन' और अस्तित्व की नश्वरता की अवधारणाओं का प्रतिपादन किया था। इनके अतिरिक्त उन्होंने 'मध्यमार्ग' का प्रतिपादन किया। मध्यमार्ग एक अनुशासित जीवन-चर्या का नाम है। बौद्ध धर्म में 'निर्वाण' की अवधारणा का प्रतिपादन भी हुआ है, जिसका तात्पर्य, समस्त सांसारिक वस्तुओं, लालसाओं इत्यादि के प्रति पूर्ण अरुचि, संबंधविच्छेद । अन्य शब्दों में इसे लोकोत्तरता/इंद्रियातीतता कहा जा सकता है।


बौद्ध धर्म दो शाखाओं में विभाजित हुआ। हीनयान तथा महायान। आगे चलकर एक तीसरी शाखा का भी उद्भव हुआ- वज्रयाना वज्रयान को मंत्रयान या तांत्रिक बौद्ध धर्म भी कहा जाता है। 


जैन धर्म 


हिंदू एवं बौद्ध धर्म की तरह जैन धर्म भारत के प्रमुख धर्मों में से एक है। जैन धर्म में हिंदू एवं बौद्ध दोनों धर्मों के तत्व पाए जाते हैं। बौद्ध धर्म की भाँति जैन भी एक नास्तिक धर्म है। जैन धर्म का अपना


अलग अस्तित्व है। जैन संस्कृत धातु 'जि' से व्युत्पन्न है। इसका संबंध उस तपश्चर्या से है जो अपनी इंद्रियों वासनाओं, इच्छाओं इत्यादि के विरुद्ध लड़ने,

उन्हें जीतने तथा तत्पश्चात प्रबोध / ज्ञान प्राप्ति के उद्देश्य से की जाती है। जो तपस्वी इस तपश्चर्या को सफलतापूर्वक पूर्ण कर लेते हैं, वे 'जिन' (जितेंद्रिय) कहलाते हैं। जो इनके अनुयायी होते हैं, वे जैन कहलाते हैं।


महावीर स्वामी ने जैन धर्म की स्थापना की थी। महावीर स्वामी वर्ण-व्यवस्था एवं जातिवाद के विरोधी थे। जैन मुनि सुशील कुमार ने महावीर स्वामी के विषय में लिखा है, “भगवान महावीर विश्व के अद्वितीय क्रांतिकारी महापुरुष थे। उनकी क्रांति एक क्षेत्र तक सीमित नहीं थी। उन्होंने प्रभावकारी क्रांति का मंत्र फेंका था। आध्यात्मिक, दर्शन, समाज-व्यवस्था यहाँ तक कि भाषा के क्षेत्र में भी उनकी देन थी।" (मुनि, सुशील कुमार जैन धर्म जैन कांफ्रेंस भवन, नई दिल्ली; 1958: पृष्ठ-29)।


जैन धर्म में मनुष्य को उच्च स्थान प्राप्त है। यह श्रमण संस्कृति के अंतर्गत है। श्रमण-संस्कृति साम्य पर आधारित है। इस साम्य के तीन आयाम हैं- समाज विषयक, साध्य विषयक तथा प्राणि जगत के प्रति दृष्टि विषयका जहाँ तक सामाजिक साम्य की बात है, उसमें वर्ण एवं लिंग संबंधी भेदभाव को कोई स्थान प्राप्त नहीं है। इस संबंध में मोहनलाल मेहता ने लिखा है, “(जैन धर्म) समाज रचना में धर्म विषयक अधिकार की दृष्टि से जन्मसिद्ध वर्ण और लिंग भेद को महत्व न देकर व्यक्ति द्वारा समाचारित कर्म और गुण के आधार पर ही समाज रचना करता है।" (मेहता, मोहनलाल जैन धर्म-दर्शन पार्श्वनाथ विद्याश्रम शोध संस्थान, वाराणसी 1973; पृष्ठ 103).


सिख धर्म


सिख धर्म भारत के प्रमुखतम धर्मों में से एक है। इसकी स्थापना पंजाब में गुरु नानक द्वारा की गई। गुरु नानक सिख धर्म के दस गुरुओं की पाँत में सर्वप्रथम गुरु हैं।

सिख धर्म में हिंदू भक्ति आंदोलन तथा सूफी धर्म के अनेक तत्व सम्मिलित हैं।


गुरु नानक एकेश्वरवादी थे। उन्होंने हिंदुओं के बहुदेववाद, हिंदू-मुस्लिम-वाद आदि का खंडन किया। उन्होंने घोषणा की कि न कोई हिंदू है, न मुसलमान सारा संसार एक ही 'नूर' की पैदाइश है। गुरु नानक ने हिंदुओं की मूर्ति पूजा का भी विरोध किया। गुरु नानक ने हिंदुओं की वर्ण-व्यवस्था एवं जाति- प्रथा का खंडन किया। सिख धर्म की लंगर व्यवस्था जाति प्रथा के खात्मे के लिए उठाया गया सबसे महत्वपूर्ण कदम था। यह व्यवस्था आज भी जारी है। सिखों के पाँचवे गुरु, अर्जुन देव ने अपने से पहले के सिख गुरुओं तथा मध्यकाल के हिंदू और मुस्लिम संतों के भजनों पदों इत्यादि को 'आदि ग्रंथ में संग्रहीत किया, जिसे 'गुरु ग्रंथ साहब कहा जाता है।

यह सिख धर्म का पवित्र धर्म-ग्रंथ है। गुरु गोविन्द सिंह ने इसे अंतिम रूप दिया. पूजा स्थलों पर जीवित गुरु के बतौर माना जाता है। गुरुद्वारा सिखों का पूजा स्थल है, जहाँ 'गुरु ग्रंथ साहब स्थापित होते हैं। अमृतसर का स्वर्ण मंदिर सिखों का सबसे बड़ा धर्म-स्थल माना जाता है।


सिख धर्म में खालसा पंथ का विशेष महत्व है। सिखों के दसवें और अंतिम गुरु गुरु गोविन्द सिंह ने इसकी स्थापना की। 'खालसा' का अर्थ है, पवित्र लोगों का समुदाय 'खालसा' एक ऐसा धर्मसंघ है, जिसमें आध्यात्मिक समर्पण, व्यक्तिगत अनुशासन (आत्मानुशासन) तथा सैन्य पराक्रमशीलता का समुच्चय रहा है।


धर्म और स्त्री


धर्म का रवैया स्त्रियों के प्रति मिला-जुला है। धर्म स्त्रियों को सबसे अधिक सीख देता है। हर धर्म स्त्रियों को उसके कर्तव्य कर्म के प्रति सचेत सावधान करता है। धर्म की सबसे अधिक शिक्षाएँ उनके लिए ही हैं। एक प्रकार से धर्म स्त्रियों को नियंत्रित करने के लिए ये सारी शिक्षाएँ देता है। इसका कारण क्या यह है कि धर्म की रचना पुरुषों ने की है? इस संदर्भ में डॉ. निवेदिता ने अपने लेख 'धर्म और खी' में लिखा है, “इतने लंबे अनुभवों के बाद मैंने यही पाया है कि धर्म स्त्रियों के जीवन में दुःख लेकर आता है। धर्म खियों को अपवित्र समझता है और उनके शरीर से घृणा करता है। धर्म स्त्री के शरीर पर कब्जा जमाता है। सवाल यह है कि जिस धर्म की रचना पुरुषों ने की उस धर्म में स्त्री के लिए क्यों जगह होगी। दुनिया का कोई धर्म ऐसा नहीं है जहाँ स्त्री का दर्जा कमतर हो फिर भी स्त्रियाँ अपने जीवन में धर्म के नाम पर पुरुषों द्वारा किए जा रहे इस विभेद को झेलती रहती हैं।”

अपने इस लेख में आगे वे लिखती हैं, “धर्म ने स्त्री के लिए शुचिता जैसे शब्दों का ईजाद किया। उसकी रक्षा के लिए नई-नई तरकीबें निकालीं। इतिहास बताता है कि दुनिया में स्त्री पर एकाधिकार के लिए धर्म का सहारा लिया गया। मनुस्मृति से लेकर अनेक ग्रंथों में इसकी चर्चा है कि स्त्रियों को क्या करना है और क्या नहीं? और जब स्त्री का सवाल हो तो धर्म सबसे वीभत्स रूप में सामने आता है। सती प्रथा से लेकर मंदिरों की दासियों की अनगिनत गाथाएँ हमारे पास हैं। सामंतवादी व्यवस्था में सबसे ज्यादा इसकी शिकार औरतें होती रही हैं।” (वही)। निवेदिता जी हिंदू और मुस्लिम दोनों धर्मों के उदाहरण से स्पष्ट करती हैं कि इन दोनों ही धर्मों में स्त्रियों के प्रति हद दर्जे की क्रूरताएँ और अमानवीयताएँ विद्यमान हैं। वे लिखती है-“धर्म के नाम पर जब मुसलमान औरतों को सार्वजनिक रूप से कोड़े से उधेड़ा जाता है और हिंदू स्त्रियों को नंगा कर घुमाया जाता है

या एक स्त्री को डायन, चुड़ैल कहकर मारा जाता है, तो उसके पीछे कहीं न कहीं धर्म काफी सहारा लिया जाता है।" (वही)


धर्म के स्त्री के प्रति रवैये के बारे में और भी कई लोगों, संस्थाओं, इकाइयों के लगभग ऐसे ही विचार हैं। जैसे कि नेल्सन मंडेला द्वारा दुनिया के सेवानिवृत्त नेताओं को लेकर बनाई गई संस्था Elders, जिसके एक सदस्य अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति जिम्मी कार्टर भी रहे हैं, के सदस्यों का अधिकांशतः यही सोचना है। आस्ट्रेलिया में आयोजित विश्व धर्म संसद में भाषण देते हुए जिम्मी कार्टर ने कुछ समय पहले कहा था, "अनेक धर्मों में खियों को संपूर्ण और बराबरी की भूमिका निभाने से रोका जाता है।

एक ऐसा माहौल बनाया जाता है कि जिसमें स्त्रियों के विरुद्ध हिंसा जायज़ लगे।" आगे अपने भाषण में उन्होंने कहा कि "ईश्वर की निगाह में औरत एक कमजोर मनुष्य है; यह मान्यता पति द्वारा अपनी पत्नी को क्रूरतापूर्वक पीटे जाने को, एक सैनिक द्वारा किसी स्त्री का बलात्कार किए जाने को, नियोक्ता द्वारा स्त्री कर्मचारियों को अपेक्षाकृत कम वेतन दिए जाने को और माँ-बाप द्वारा कन्या भ्रूण की हत्या करा देने को क्षम्य बना देती है।" जिम्मी कार्टर का यहाँ तक मानना था कि “स्त्रियों के अधिकारों के हनन के पीछे के मूलभूत कारणों में धर्म रहा है।" (क्रिस्टोफ निकोलस रिलीजन एंड वीमेन द न्ययार्क टाइम्स, 9 जून, 2010 | निकोलस क्रिस्टोफ ने अनेकानेक धर्मग्रंथों का हवाला देते हुए अपने इस लेख में लिखा है कि औरतों को दोयम दर्जे


का ही माना गया है। कोई भी धर्म / समाज अपनी संरचनाएँ बदलने को तैयार नहीं है। (वही, पृष्ठ-3-4)।