मुगल स्त्रियाँ - Mughal Women

मुगल स्त्रियाँ - Mughal Women

मुग़ल स्त्रियों के जीवन के बारे में इरफान हबीब दो किस्म की श्रेणियाँ बनाते हैं। पहली श्रेणी में निम्न वर्ग की मुस्लिम महिलाएँ रखी हैं। इन मुस्लिम महिलाओं की श्रम में बड़ी भागीदारी थी । इरफान हबीब अमीर खुसरो के माध्यम से बताते हैं कि कताई में महिलाओं की इतनी महत्वपूर्ण भूमिका थी कि सुई और तकली को उनके धनुष बाण की संज्ञा दी गई। कपड़ा उद्योग में खासतौर पर रंगाई, छपाई, कढ़ाई में महिलाओं की बड़ी भूमिका रही। शीरी मुसवी ने मुगलकालीन भारत में स्त्री श्रम" पर अध्ययन किया है। इरफान साहब अलाउद्दीन खिलजी के वेतन नियमों के माध्यम से महिलाओं को उनके श्रम के बदले पुरुषों से कम वेतन मिलने की बात भी बताते हैं। पुरुष दास को जहाँ 10-15 टका तक मिलते थे, वहीं महिलाओं को 5-12 टका मिलते थे। वे सूफी शेख अहमद सरहिंदी के विचार भी रखते हैं। सूफी शेख घोषणा करते हैं कि खुदा ने मर्द पर मेहरबानी की है, इसलिए उसे चार शादियाँ करने का अधिकार प्राप्त है। वह तलाक द्वारा खियाँ बदल सकता है और कितनी ही रखैलें रख सकता है। खुदा ने स्त्रियों को सौंदर्य भी इसलिए बख्शा है कि पुरुष उसका उपभोग कर सके। बादशाह जहाँगीर के सलाहकार भी उसे यह सलाह देते हैं कि "बेटियों की मौत पर शोक मत करो। स्त्रियों की सलाह मत मानो ।"


इस प्रकार हम देखते हैं कि मुगल स्त्रियों के श्रम के शोषण और उच्च वर्गीय स्त्रियों के लिए भी दोयम दर्जे को ही देखते हैं। दूसरी ओर हमें उच्च वर्गीय स्त्रियों में शिक्षा को लेकर लगाव और परिवार द्वारा उन्हें इसकी सहूलियत दिए जाने के प्रमाण भी मिलते हैं। बादशाह हुमायू (1530-36) की बहन मुग़ल शहजादी गुलबदन बेगम शिक्षित थी और उसने हुमायू के जीवन चरित को भी लिखा। बादशाह जहाँगीर की पत्नी नूरजहाँ का जिक्र करना भी महत्वपूर्ण है। नूरजहाँ एक शिक्षित, कला प्रेमी, वास्तुशिल्पकार और बेहतर फैशन की जानकार थीं। आगरा में बना एत्माद्दौला का मकबरा जो नूरजहाँ ने अपने पिता की याद में बनाया था, वास्तुशिल्प का वह एक अद्भुत नमूना है। नूरजहाँ राजनीति में इतनी निपुण थीं कि बादशाह ने उन्हें अपने राज्य की पूरी जिम्मेदार सौंप दी थी। मध्यकाल में ही अकबर के द्वारा हिंदूओं में सती प्रथा को रुकवाने के लिए बड़े प्रयास भी किए गए। यह आदेश 1583 ई. से पूर्व आया था। अकबर का मत था कि कमजोर होने के नाते स्त्रियों को पुरुषों की तुलना में पैतृक संपत्ति का बड़ा भाग मिलना चाहिए।

अकबर ने यह भी न्याय संगत नहीं माना कि यदि किसी परिवार में सिर्फ लड़कियाँ ही हों तो वहाँ अन्य पुरुष विरासत के दावेदार माने जाएँ। अकबर ने 14 वर्ष से कम आयु की लड़कियों से विवाह प्रतिबंधित किया था, जो कि हिंदूओं पर भी लागू था (हबीब इ. 2002) 1 इरफान साहब ने अपने इस आलेख में मध्यकाल में महिलाओं के जीवन की एक झलक प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, जिसमें श्रम, विवाह, तलाक, शिक्षा, संपत्ति जैसे तमाम मुद्दों को शामिल किया गया है। रजिया सुल्तान जैसी शासक के बारे में भी हमें इतिहास में सीमित जानकारी मिल जाती है, जो हमें बताती है कि उसके दरबारियों को उसकी अधीनता स्वीकार्य नहीं थी और वे किसी न किसी बहाने रजिया को सत्ता से हटाना चाहते थे। दिल्ली में स्थित रजिया के उपेक्षित मकबरे से भी हमें पता चल सकता है कि शासिका के रूप में महिलाओं की कोई विशेष स्वीकार्यता नहीं थी।