राजपूतों के आपसी संघर्ष - mutual struggle of rajputs
राजपूतों के आपसी संघर्ष - mutual struggle of rajputs
गुर्जर प्रतिहारों के पतन के पश्चात् 10वीं शताब्दी के अंत और 11वीं शताब्दी के प्रारंभ का युग विशृंखलन, कमजोरी, आपसी प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रवाद की भावना के विस्तार में पहले से भी अधिक भयंकर साबित हुआ। 1000 ई. के आसपास देश के विशृंखलन का जो चित्र दिखायी पड़ता है, वह मौर्यो तथा गुप्तों की अवनति अथवा हर्ष के अंत के बाद होने वाले विशृंखलन से कई गुना अधिक भयंकर था और वह भी ऐसे समय जब सारा उत्तरी भारत महमूद गजनवी के नेतृत्व में तुर्कों के बर्बर आक्रमणों से आक्रांत हो रहा था। प्रतिहार साम्राज्य के खंडहरों पर अन्य राजपूत राजवंश जैसे गहवाल ( कन्नौज- काशी), चंदेल (बुंदेलखंड), तोमर (दिल्ली),
चाहमान (शाकंभरी, अजमेर), परमार (मालवा), चालुक्य (गुजरात-सौराष्ट्र) और कलचुरि (पश्चिम में त्रिपुरी, पूर्व में रतनपुर और उत्तर में गोरखपुर) के जैसे अनेक स्थानीय राज्य स्थापित हो गए। इनमें भी परमारों, चाहमानों और कलचुरियों की अनेक शाखाएँ थीं, जो छोटे-छोटे क्षेत्रों पर शासन करती थीं। पूर्व में पाल राज्य का जो विघटन कैवर्ती के विद्रोह (1075 ई. के आसपास) से प्रारंभ हुआ, उसका परिणाम पालों की अवनति के साथ-साथ अंग, वंग और मगध आदि में लगभग दस स्वतंत्र राजवंशों के उदय के रूप में उपस्थित हुआ।
बंगाल के कई भागों पर कंबोजों ने अधिकार कर लिया तथा बंगाल में सेनों एवं मिथिला के कर्णाों के रूप में दक्षिणात्यों ने उत्तर भारत में नए-नए राजवंशों की स्थापना की।
उन्होंने बदायूँ और पीठी में भी स्वतंत्र राज्यों की स्थापना की। एकदम पूर्व में असम स्वतंत्र था और दक्षिणपूर्व में कलिंग गंगों के अधिकार में चला गया। ये सारे क्षेत्र राजेन्द्र चोल (1012-1044 ई.), कलचुरि कर्ण (1041-1073 ई.), प्रथम सोमेश्वर (1042-1075 ई.) और षष्ठ विक्रमादित्य चालुक्य (1076-1126 ई.) तथा अनंतवर्मा चोडगंग (1078-1147 ई.) जैसे महत्वाकांक्षी विजेताओं के लिए सैनिक क्रीडास्थल बन गए। इस युग में उत्तरभारत के उत्तरी, मध्य तथा पश्चिमी भागों में भोज परमार (1010-1055 ई.), भीम चालुक्य (1024- 1065 ई.) तथा कलचुरि कर्ण (1041-1073 ई.) ने प्रथम दौर में एवं गोविन्दचंद्र ( 1114-1154 ई.) और जयचंद्र गहड़वाल (1170-1194 ई.);
विग्रहराज वीसलदेव (1151-1166 ई.) और तृतीय पृथ्वीराज चौहान (1177-1192 ई.) तथा जयसिंह सिद्धराज (1093 1142 ई.) एवं कुमारपाल चालुक्य (1143- 1173 ई.) ने दूसरे दौर में अपने-अपने राज्यों को साम्राज्य का रूप देने के लिए घोर आपसी संघर्ष किया। वे सभी एक-दूसरे को दबाने के प्रयत्न करते हुए अपनी सत्ता को ऊपर उठाकर भारत की प्रमुख राजनैतिक सत्ता बनने का जो अनवरत प्रयत्न करते रहे, वही इस युग की मुख्य राजनैतिक प्रवृत्ति प्रतीत होती है। इसी कारण इसे 'राजपूतों के आपसी संघर्ष का युग' कहा जाता है, किंतु इनमें से किसी ने यह सोचने की चिंता नहीं की कि भारतीय संस्कृति के शत्रु इस्लाम के प्रतिनिधि क्या सोच रहे हैं अथवा तुर्क अफगान मुसलमानों की ललचायी आँखें किस प्रकार उन्हें समाप्त कर जाना चाहती हैं।
यद्यपि तुर्क आक्रमणों के मुकाबले कई बार भारतीय राजाओं को गौरवपूर्ण सफलताएँ प्राप्त हुई और वे व्यक्तिगत वीरता में उनसे कम न थे, किंतु कुछ साधारण अपवादों को छोड़कर, वे समवेत होकर उस समस्या का हल निकालने के लिए कभी नहीं जुटे अथवा जब जुटे भी तो अनियंत्रित, दुःसंचालित और खंडरूप में, जिनके परिणाम अंततः उनके विपरीत ही हुए। प्रतिहारों के पतन के बाद मुसलमान आक्रामकों को सीमाओं के पार ही रोकने की इच्छाशक्ति समाप्त हो गई-सी जान पड़ती है, किंतु ऐसा नहीं हुआ कि तुर्क आक्रामक बेरोकटोक देश के विभिन्न भागों में घुस गए। आपस में लड़ते हुए इस समय के हिंदू राजाओं ने इस्लाम की चुनौती को अपनी राजनीति में मुख्य स्थान क्यों नहीं दिया, यह एक पहेली है। इस चुनौती में उन्होंने युद्ध तो जीते किंतु वे अपनी विजय को स्थायी नहीं बना सके।
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