राजपूतों की उत्पत्ति संबंधी मत एवं समीक्षा - Opinion and review on the origin of Rajputs
राजपूतों की उत्पत्ति संबंधी मत एवं समीक्षा - Opinion and review on the origin of Rajputs
पुरुष सूक्त में क्षत्रिय की तुलना पुरुष की भुजाओं से की गई है। संपूर्ण विश्व का ही रक्षक राजन्य था। रामायण का 'समर्थ' राम राघव राक्षसों से गो, ब्राह्मण और धर्म तथा मर्यादा का रक्षक था। रामायण और महाभारत, स्मृतियों और पुराणों में इसी 'रक्षक' को क्षत्रिय कहा गया है। क्षत्रिय राजकुमार को ही 'राजपुत्र' (महात्मा राजपुत्रोऽयं ) कहा गया है। युद्ध करना ही उसका स्वधर्म या स्वकर्म भी था। किसी भी कारण से- लोभ, काम अथवा द्रोह से उसे स्वधर्म का परित्याग करना उचित न था। उसको यह भी बताया गया था कि सदा न तो किसी की जय होती है और न किसी की पराजय ही होती है।
"नैव नित्य जयस्तात नैव नित्य पराजयः। "
गीता में भी कृष्ण ने अर्जुन को यही बताया है। क्षत्रिय का यह योगी स्वरूप उनके ब्रह्म तेज का ही परिचायक है, क्योंकि क्षत्रिय ब्राह्मण से ही उत्पन्न हुआ (ब्रह्मतः क्षत्रम) है। यह ब्रह्म तेजोमय क्षत्रिय ही ब्राह्म-क्षत्र कहलाया। सातवीं और आठवीं शती में भारतवर्ष में जीवन के दो मुख्य क्षेत्रों में क्रांति हुई। धार्मिक क्षेत्र में कुमारिल और शंकर ने जो आंदोलन चलाया उससे हासोन्मुख बौद्ध धर्म वैदिक परंपरा में पूर्णतः आत्मसात कर लिया गया और प्राचीन धार्मिक संप्रदायों के स्थान में पुनरुत्थान मूलक किंतु नवसंस्कृत हिंदू धर्म का उदय हुआ।
मध्ययुगीन धार्मिक जीवन की यह एक बहुत बड़ी संक्रांति थी। राजनीतिक क्षेत्र में हूणों और अरबों के आक्रमणों से भारत को बहुत बड़ा मानसिक धक्का लगा। कुमारिल और शंकर की धार्मिक प्रेरणा से राजनीतिक जीवन भी प्रभावित हुआ। राजवंशों में ब्रह्म-क्षेत्र की एक नई परंपरा चल पड़ी। प्राचीन भारतीय राजवंशों के अवशेषों में एक बार पुनः नया प्राण आ गया। उन्होंने राजस्थान, मध्य भारत मध्य प्रदेश, विंध्य प्रदेश आदि प्रांतों में अपने देश और धर्म की रक्षा के लिए शैव धर्म को अपनाया और सतत युद्ध द्वारा विदेशी सत्ता के विरोध का प्रण किया। कुषाण साम्राज्य को नष्ट करने और भारतीय राष्ट्र के पुनरुत्थान का व्रत, तीसरी सदी में नागभारशिवों ने लिया था। प्राचीन क्षत्रियों के नव जागरण का काव्यमय वर्णन चंदवरदाई के पृथ्वीराज रासो में मिलता है।
आठवीं शताब्दी से लेकर 12वीं शताब्दी तक के साहित्य में भी क्षत्रियों का परम कर्तव्य "आत्र परित्राण" (दुखी जन की रक्षा) और पृथ्वीपालन करना ही बताया गया है। उसी क्षत्रिय को हम इस युग में वीर वेश में तलवार लिए हुए (वीरचर्याचिता वेषसंवृत्ति आकृष्टखड्ग) पाते हैं। इन्हीं क्षत्रियों को राजपूत (राजपुत्र) कहा गया है। पृथ्वीराज रासो में सोमेश्वर-पुत्र पृथ्वीराज को क्षात्र धर्म का पालन करने वाला अद्वितीय पुरुष कहा गया है।
यहाँ युद्ध भूमि से न भागने वाले राजपूत शूर को ही क्षत्रिय कहा गया है जो सभी देश सेवा के लिए थे किंतु ऐसा विदित होता है कि सभी शुद्ध क्षत्रिय नहीं थे। इसलिए "कुल शुद्ध' की खोज की जाती थी।
शुद्ध क्षत्रिय वही था, जो खड्ग द्वारा युद्ध भूमि में कट जाने से मुक्ति पाता था (राजपूत मुक्ति खिति खम् खिर)। शत्रु के समक्ष युद्धभूमि से भयभीत होकर भागने वाला शुद्ध क्षत्रिय न था । वह क्षुद्र क्षत्रिय ही वृषलत्व ( शूद्रत्व) को प्राप्त करता था। इस युग को ही ध्यान में रखकर असुरों के उत्पात से राष्ट्र को बचाने वाले शुद्ध क्षत्रिय की आवश्यकता थी। पृथ्वी चिल्ला कर कह रही थी कि क्या संसार में कोई ऐसा साहसिक है, जिसका क्षत्रीपन शुद्ध शौर्य पर आधारित हो और जिसके पास आभरण कृपा और कृपाण हों तथा जो हमको मृत्यु के भय से बचाए ।"
इसलिए देश असुरों- तुरुष्कों के आक्रमणों से त्राहि-त्राहि कर रहा था। उस समय ऐसे शुद्ध क्षत्रिय की आवश्यकता थी, जो पृथ्वी के करुण क्रंदन को सुनकर उसकी रक्षा करता।
इसकी परख ही यज्ञ थी और अग्नि ही साक्षी थी, किंतु चक्र भय से बचाने के लिए शुद्ध और खरे क्षत्रिय की आवश्यकता थी। प्रतिहार, परमार, चंदेल, चौहान, चालुक्य और गढदवाल ऐसे ही शुद्ध क्षत्रिय थे, जिन्होंने क्षत्रिय धर्म का अनुसरण कर यथाशक्ति राष्ट्र की रक्षा की।
भ्रम में कोई इन्हें हूण, शक, गुर्जर आदि विदेशी ही क्यों न माने, परंतु जिन्हें हम राजपूत कहते हैं वे क्षत्रिय ही थे। विदेशी भी आए और उन्होंने यहाँ राज्य स्थापित किया; परंतु वे हिंदू समाज में मिलकर विदेशीपन को भूल गए तथा भारतीय बनकर भारतीय समाज में विलीन हो गए।
राजपूत शब्द का अधिकांश प्रयोग इस देश में मुसलमानों के आने के बाद ही प्रारंभ हुआ। हुआन सांग ने यहाँ के राजाओं को क्षत्रिय ही उल्लिखित किया है। उसने राजपूत शब्द का प्रयोग नहीं किया। देश स्वातंत्र्य हेतु शरीर की आहूति देने वाला राजपूत पूर्ण रूप से भारतीय था। उसके विदेशी होने की बात निर्मूल और निराधार है। विदेशी को गाय और ब्राह्मण, वेद और धर्म की रक्षा करने से क्या प्रयोजन था। इनका रक्षक ही क्षत्रिय राजपूत था।
अग्निकुल का मत
पृथ्वीराज रासो से ज्ञात होता है कि “जब पृथ्वी राक्षसों और म्लेच्छों से त्रस्त थी तब वसिष्ठ ने अर्बुद पर्वत पर अपने यज्ञकुंड से चार योद्धाओं को उत्पन्न किया परमार,
चालुक्य, परिहार और चाहुमाना इन्हीं से चार राजवंशों की स्थापना हुई जो अग्निकुलीय कहलाए। यह कथा बहुत बाद में प्रचलित हुई। कई इतिहासकारों ने इस कथा की विचित्र व्याख्या की। कर्नल टॉड ने इस उत्पत्ति कथा को स्वीकार कर यह मत प्रतिपादित किया कि ये नव जागृत राजपूत विदेशी आक्रमणकारियों के वंशज थे, जो यज्ञ द्वारा शुद्ध होकर हिंदू समाज में सम्मिलित हुए। अतः वी. ए. स्मिथ तथा बहुत से भारतीय इतिहासकारों ने इसे पकड़ लिया। एक तो यह कथा बारहवीं शती की है और दूसरे उपर्युक्त सभी राजवंश • अपने उत्कीर्ण लेखों में अपनी उत्पत्ति प्राचीन सूर्य अथवा चंद्रवंश से मानते हैं। यह संभव है कि विदेशी आक्रमणकारियों के वंशजों में से राजकुलीय या अभिजात वंश प्राचीन क्षत्रियों के साथ मिल गया हो
परंतु अधिकांश और मुख्य राजनू राजवंश प्राचीन क्षत्रियों के वंशज थे इसमें संदेह नहीं । विदेशी 'सीथियन' मूलोत्पत्ति पर विचार करने के बाद डॉ. आर. बी. सिंह इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं
कि इसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है। डॉ. आर. बी. सिंह ने अपनी पुस्तक 'दि ओरिजिन ऑफ दि राजपूताज' में इस समस्या का विस्तार से विवेचन किया है। अतः उनके विचारों का सार देना आवश्यक है।
राजपूत शब्द संस्कृत राजपुत्र (राजकुमार) का ही बिगड़ा रूप है। प्राचीन 'क्षत्रिय' या 'राजन्य' को ही यहाँ रक्षक (राजा) समझा जाता था। महाभारत में विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र चलाने वाले को राजपूत कहा गया है (द्रोणपर्व 112/20-27) यहाँ राजपुत्रों की सैनिक दक्षता का उल्लेख है। महाभारत में साधारणतया राजपुत्र शब्द का प्रयोग क्षत्रियों के लिए हुआ है। अष्टाध्यायी (4-2-39) में भी 'राजपुत्र' शब्द का प्रयोग मिलता है:-
यहाँ यह शब्द राजन्य का ही अर्थ रखता है। राजपुत्र शब्द का प्रयोग अर्थशास्त्र, मालविकाग्निमित्रम् एवं
सौंदरानंद काव्य में क्षत्रिय के रूप में हुआ है। प्रारंभिक साहित्य में अभिलेखों में इसका प्रयोग सूचित करता है कि प्राचीन समय से ही इसका प्रयोग प्रचलित हो गया था तथा एक निश्चित अर्थ प्राप्त हो चुका था। उत्तर मध्यकालीन साहित्य में 'राजपुत्र' का प्रयोग क्षत्रिय के अर्थ में हुआ है। गुजराती Ravat और मराठी (Raut) राउत शब्दों की उत्पत्ति भी संस्कृत शब्द 'राजपुत्र' से ही हुई है। इन शब्दों का प्रयोग अश्व सैनिक Troopers के लिए किया गया है। उड़ीसा के मध्यकालीन अभिलेख एवं साहित्य में इस शब्द (Rautta, Raivta Rauta Rahuta etc.) का प्रयोग आश्रित सरदारों (Subordinate Chiefs) के लिए हुआ है, लेकिन बिहार बंगाल के पालवंशी लेखों में 'राजपुत्र' को राजम् एवं राजन्यक के साथ राजा के आश्रितों (Subordinates ) तथा अधिकारियों की श्रेणी में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ है।
इस प्रकार मध्यकालीन लेखों में 'राजपुत्र' शब्द का प्रयोग उस वर्ग के लोगों के लिए हुआ है, जो या तो सामंत सरदार अथवा राज्याधिकारी या सेना से संबंधितथे एवं प्राचीन काल से ही ऐसे पदाधिकारियों के लिए क्षत्रिय वर्ण को प्राथमिकता दी जाती थी। डॉ. डी.सी. सरकार का विचार यथार्थ प्रतीत होता है कि-
कल्हण ने 36 शाही परिवारों के उत्तराधिकारी के लिए राजपुत्र शब्द का प्रयोग किया है। राजतरंगिणी से पुनः सूचना मिलती है कि यद्यपि क्षत्रिय वर्ण से संबंधित शाही परिवारों की संतानों को 'राजपुत्र' की संज्ञा दी गई तथापि उनके संबंध में एक वर्ग के रूप में 'राजपूत' शब्द का प्रचलन 12 वीं शताब्दी तक न हो सका।
कालांतर में राजपूत पराभव के बाद उत्तर भारत में तुर्क प्रशासन स्थापित हो जाने से हिंदू राजपरिवारों की शक्ति और वैभव के ह्रास हो जाने के उपरांत भी उनके उत्तराधिकारी सामान्य जनों द्वारा 'राजपुत्र' अथवा 'महाराज' जैसी प्राचीन प्रचलित संज्ञाओं द्वारा सम्मानित होते रहे। कालांतर में कई पीढ़ियों के उपरांत राजकुमारों की संख्या में वृद्धि हो जाने से भीषण विपत्त्विों का सामना करते हुए ये राजपुत्र आपस में संगठित हो गए तथा समाज में उनका एक वर्ग उठ खड़ा हुआ, जो अपने प्राचीन विरूद 'राजपुत्र' द्वारा प्रचलित हो गया। इस प्रकार हिंदू समाज में एक नए वर्ग (राजपुत्र वर्ग) की उत्पत्ति हुई, जिसे धीरे धीरे तुर्कों द्वारा 'राजपुत्र' के बिगड़े हुए रूप 'राजपूत' की संज्ञा प्रदान की गई, क्योंकि वैभव के क्षीण हो जाने के कारण अब वे राजपुत्र कहलाने के अधिकारी नहीं रहे थे। इसलिए तुर्की/मुसलमानों ने उन्हें अपमान रूप में राजपूत कहना प्रारंभ कर दिया।
राजपूतों का यह नया वर्ग केवल उत्तरी भारत के विभिन्न भागों में ही सीमित रहा, क्योंकि 12वीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थांश में तुर्क आक्रमण के समय आधुनिक राजस्थान मालवा, गुजरात, बुंदेलखंड और उत्तरप्रदेश में उस समय क्रमशः चाहमान, परमार, चालुक्य, चंदेल और गाढवाल नामक क्षत्रिय राजवंश शासन कर रहे थे, जो तुर्कों के विरुद्ध लगातार संघर्ष करते रहे। लेकिन दक्षिण भारत के विस्तृत क्षेत्र में शासन करने वाली जातियों की संख्या अति अल्प होने के कारण 'राजपूत' शब्द उत्तर भारत की तरह दक्षिण भारत में लोकप्रिय न हो सका।
डॉ. वी.ए. स्मिथ की विचारधारा के अनुसार चार प्रमुख राजपूत राजवशों प्रतिहार, चाहमान, परमार एवं चालुक्य की उत्पत्ति आबू पर्वत पर वशिष्ठ द्वारा किए गए यज्ञ कुंड से हुई,
जिसका काव्यात्मक विवरण पृथ्वीराज तृतीय के दरबारी एवं कवि चंदवरदाई द्वारा रचित 'पृथ्वीराज रासो' नामक ग्रंथ में मिलता है, किंतु पृथ्वीराजरासो की मूल प्रति की रचना 12 वीं शताब्दी में कुछ ही पदों द्वारा की गई थी, जबकि उसके नए संस्करणों ने इसके मूलस्वरूप में परिवर्तन कर दिया। आधुनिक प्रचलित रासो 16 वीं शती की रचना प्रतीत होती है, जिसमें इस अग्निकुल विचारधारा को बाद के संस्करणों में समाविष्ट कर दिया गया। बीकानेर राजपुस्तकालय से उपलब्ध उसकी सबसे प्राचीन हस्तलिपियों में ऐसी कोई कथा नहीं मिलती, जो अग्निकुल मत को स्पष्ट करें अतः ऐसा प्रतीत होता है कि रासो के बढते हुए कलेवर के चारणों ने बाद में (15 वीं शती में) अग्निकुलों की कथा पिरो दी। इसी अग्निकुल विचारधारा के आधार पर विद्वानों ने राजपूतों की उत्पत्ति के अनेक मत प्रतिपादित किए।
पृथ्वीराज रासो की कथा के समरूप कथाएँ हम्मीर रासो तथा वंश भास्कर से भी ज्ञात है, जो मूलतः पृथ्वीराज रासो की कथा पर आधारित हैं। परंतु ऐसा प्रतीत होता है कि अग्निकुल विचारधारा पृथ्वीराज रासो में नवीन संस्करणों के संलग्न हो जाने से प्रकाश में आई।
विलियम क्रुक की विचार धारा के अनुसार चारों अग्निकुलीय राजवंश चाहमान, परमार, प्रतिहार एवं चालुक्य की उत्पत्ति की यह कथा अग्नि द्वारा शुद्ध संस्कार का प्रतीक है, जिसमें विदेशी की अपवित्रता का अंतकर उन्हें हिंदू वर्ण व्यवस्था में उचित स्थान प्रदान किया गया।
डॉ. आर. बी. सिंह का विचार है कि पृथ्वीराज रासो के बढ़ते हुए कलेवरों में तथा अन्य ग्रंथों में अग्निकुल की कथा 16 वीं शताब्दी में अकबर और राणाप्रताप के संघर्ष के समय किसी अज्ञात राजकवि (भाट) द्वारा उन राजवशों को गौरवान्वित करने के लिए पिरो दी गई, जिन्होंने शताब्दियों तक मुस्लिम आक्रांताओं से संघर्ष किया था।
वार्तालाप में शामिल हों