चालुक्यों का उद्भव एवं प्रारंभिक इतिहास - Origin and early history of Chalukyas

चालुक्यों का उद्भव एवं प्रारंभिक इतिहास - Origin and early history of Chalukyas


बादामी के चालुक्यों का उद्भव आजतक एक रहस्य बना हुआ है। इस संबंध में चालुक्य अभिलेखों में कई दंतकथाओं का उल्लेख है। इन अभिलेखों में सबसे प्राचीन बादामी से प्राप्त एक अभिलेख है, जिसकी तिथि 578 ई. है। इस अभिलेख में चालुक्यों को स्वामी कार्तिकेय का भक्त एवं दास बताया गया है। इसमें उनका उल्लेख हारीति के पुत्र के रूप में हुआ है तथा उन्हें मानव्य गोत्र का बताया गया है। इस अभिलेख से विदित होता है कि चालुक्यों ने अग्निष्टोम वाजपेय, पौंडरीक, बहुसुवर्ण तथा अश्वमेध यज्ञों में गहरी रुचि ली।


कालांतर में इस दंतकथा में कुछ और विस्तार हुआ। उदारहणार्थ, पुलकेशिन द्वितीय के हैदराबाद अभिलेख में भी चालुक्यों को मानव्य गोत्र के हारीति का पुत्र बताया गया है और कहा गया है कि उन्होंने कार्तिकेय के संरक्षण में यश और समृद्धि प्राप्त की, पर साथ ही यह भी उल्लिखित है कि चालुक्यों का पोषण सप्तमातृकों ने किया तथा नारायण अथवा विष्णु के अनुग्रह से वाराह अंकित एक पताका प्राप्त कर उन्होंने समस्त राज्यों को पराजित किया। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि कदंब वंश के राजा भी स्वयं को मानव्य गोत्र का हारीति- पुत्र कहते थे। इसी प्रकार वे भी कार्तिकेय एवं सप्तमातृकों की आराधना करते थे। संभवतः चालुक्यों ने इन बातों को कदंबों से ग्रहण किया।


बिल्हण अपनी रचना विक्रमांकदेवचरित में चालुक्यों की उत्पत्ति से संबंधित एक दंतकथा का उल्लेख करता है। बिल्हण विक्रमादित्य षष्ठ के दरबार में प्रधान कवि थे। इस कथा के अनुसार, "चालुक्यों की उत्पत्ति ब्रह्मा की हथेली से हुई।" अन्हिलवाड़ के चालुक्य भी यही मानते थे कि ब्रह्मा को राक्षसों द्वारा पृथ्वी पर किसी अशांति की आशंका थी इसीलिए उन्होंने अपने चुलुक (हथेली) से चौलुक्य नामक एक राजा को जन्म दिया। कुछ समय पश्चात् चालुक्य परिवार में हारित और मानव्य नामक दो वीरों ने जन्म लिया। इन वीरों ने परिवार को विशिष्ट ऊँचाई प्रदान की। इस वंश का मूल स्थान अयोध्या था, किंतु कालांतर में इसकी एक शाखा दक्षिण में जाबसी ।


श्रीनिवासाचार्य एवं आयंगर ने अभिलेखों के आधार पर यह मंतव्य दिया है कि दक्षिणापथ में अपना राज्य स्थापित करने के पूर्व चालुक्य दीर्घकाल तक अयोध्या में रह चुके थे। इतिहासकारों द्वारा चालुक्यों को उत्तरापथ के चूलिक लोगों के साथ संबद्ध किए जाने का भी प्रयास किया गया है, जिनके नाम पर प्राकृत की एक बोली का नामकरण चूलिका पैशाची हुआ, किंतु इन अनुमानों की पुष्टि किसी प्रामाणिक साक्ष्य से नहीं होती है। नीलकंठ शास्त्री इन दंतकथाओं को मूर्खतापूर्ण मानते हैं और कहते हैं कि इनका तथ्यात्मक इतिहास में कोई मूल्य नहीं है।


चंदबरदाई रचित पृथ्वीराजरासो के आधार पर कुछ इतिहासकारों ने चालुक्यों को अग्निकुल से संबद्ध माना है। इनके अनुसार चालुक्यों की उत्पत्ति प्रतिहारों परमारों और चौहानों की भाँति आबू पर्वत पर निर्मित एक यज्ञ कुंड से हुई। यज्ञकुंड से संबंधित होने के कारण इतिहासकार इन्हें विदेशी मानते हैं। उनका मत है कि अग्नि पवित्रता की द्योतक है और इसीलिए विदेशियों को सर्वप्रथम अग्नि से पवित्र किया गया और तत्पश्चात् उन्हें हिंदू समाज में स्वीकार किया गया।


जैक्सन चालुक्यों को गुर्जर अथवा उनकी एक शाखा मानते हैं। विन्सेंट आर्थर स्मिथ भी चालुक्यों को गुर्जर की चप शाखा में संबद्ध करते हैं।

स्मिथ के शब्दों में, “ऐसा विश्वास करने के कुछ कारण हैं कि चालुक्य चप से संबंधित थे और इस प्रकार विदेशी गुर्जर जाति से जिसकी चप एक शाखा थी और ऐसी संभावना है कि वे राजपुताना से दक्कन की ओर आए।"


नीलकंठ शास्त्री के अनुसार, "चालुक्य मूलतः दक्षिण भारतीय थे, जो पुलेकिशन- प्रथम द्वारा चालुक्य राजवंश की स्थापना किए जाने से पूर्व सातवाहनों और उसके बाद उनके उत्तराधिकारियों की सेवा में थे।" उनका मत है कि वे मूलतः कुन्तल अथवा कर्नाटक के निवासी थे। उनकी मातृभाषा कन्नड़ थी। शास्त्री उन इतिहासकारों से सहमत नहीं हैं, जो चालुक्यों को मूलतः विदेशी मानते हैं।

कुछ इतिहासकारों ने चालुक्यों को कर्नाटक का क्षत्रिय माना है। इस मत को हुआन सांग के विवरण से बल मिला है, जिसके अनुसार चालुक्य जन्मजात क्षत्रिय थे।


कुछ अभिलेखों में चालुक्यों का उल्लेख 'चल्क्य', 'चलिक्य' एवं 'चलुक्य' के रूप में भी हुआ है। पुलकेशिन द्वितीय के अनुदान-पत्र में चालुक्यों का उल्लेख 'चलुकिक' के रूप में हुआ है। इतिहासकारों का मत है कि चालुक्य शब्द का उद्भव चालुक्यों के एक पूर्वज से हुआ, जिन्हें चल्क, चलिक अथवा चलुक के नाम से जाना जाता था। प्राचीन काल में दक्कन में इस प्रकार का नाम अज्ञात नहीं था। इसकी पुष्टि नागार्जुनिकोंडा में प्राप्त एक अभिलेख से होती है, जिनमें 'चलिकि' शब्द 'स्कंदचलिकिरेम्मनक' नामक एक व्यक्ति के नाम में एक अंश के रूप में प्रयुक्तहुआ है।