पल्लवों का उद्भव एवं प्रारंभिक इतिहास - Origin and early history of Pallavas
पल्लवों का उद्भव एवं प्रारंभिक इतिहास - Origin and early history of Pallavas
पल्लवों का उद्भव इतिहासकारों के बीच विवाद का विषय रहा है। राइस एवं वेंकय्या 'पल्लव' तथा पहलव' अथवा पार्थियाई' को समानार्थी मानते हैं। उनके अनुसार पल्लव पार्थिया से आए तथा कुछ समय तक सिंधु घाटी और पश्चिमी भारत में निवास करने के पश्चात् तोंडमंडलम पर अपना अधिकार स्थापित किया। पल्लवों के विदेशी उद्भव संबंधी सिद्धांत को इस आधार पर बल मिला है कि कांची में अवस्थित वैकुंठ पेरूमल मंदिर की एक मूर्ति का मुकुट हाथी के सिर के समान है। बैक्ट्रियाई यूनानी राजा डिमेट्रियस के सिक्कों पर उसे भी इसी प्रकार का मुकुट धारण किए हुए अंकित किया गया है। इतिहासकारों की दृष्टि में हाथी के सिर के आकार का यह मुकुट नंदिवर्मन द्वितीय को उसके राज्यारोहरण के समय प्रदान किया गया था।
इसी प्रकार, जेन्यु इयुबोल ने रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में उल्लिखित सुविशाख पह्नव को पल्लवों का पूर्वज माना है। कुछ विद्वानों का मत है कि पल्लव शब्द का प्रचलन बाद में हुआ। आरंभ में पल्लव वंश तिरैयर के नाम से जाना जाता था। स्वामीनाथ अय्यर के अनुसार तिरैयर का अर्थ नाविक है, जिसकी उत्पत्ति द्रय', 'दरय' अथवा 'दरिया' से हुई है, जो एक फारसी शब्द है। इस आधार पर वह इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि चूँकि तिरैयर फारसी मूल पर आधारित है, इसलिए पल्लव को फारसी मूल का पह्नव मानना ही उचित है।
पल्लवों को पहव या पार्थियाई मानने में कई कठिनाई है। सबसे पहली बात तो यह है कि भारत के पश्चिमोत्तर भाग से कांची में आकर विदेशी शासकों ने अश्वमेध यज्ञ का आयोजन नहीं किया।
इसी प्रकार, कांची स्थित वैकुंठ पेरूमल मंदिर में चित्रित हाथी के सिर जैसे मुकुट को पल्लवों के विदेशी उद्भव का आधार मान लिया जाए तो नागार्जुनकोंडा के इक्ष्वाकुओं को भी कुषाण मान लेने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए, क्योंकि नार्गाजुनकोंडा में एक “कुषाण योद्धा की मूर्ति मिली है, किंतु ऐसा मानना त्रुटिरहित नहीं है।
शक शासक रूद्रदामन के जूनागढ़ अभिलेख में उल्लिखित सुविशाख पह्नव को भी पल्लवों का पूर्वज मानना उचित नहीं है। सुविशाख रूद्रदामन का मंत्री था,
जिसका पल्लवों की वंशावली में कहीं कोई उल्लेख नहीं है। दसवीं सदी के प्रसिद्ध कवि एवं नाटककार राजशेखर ने काव्यमीमांसा में पल्लव और पह्नव का दो भिन्न प्रजातियों के रूप में उल्लेख किया है। राजशेखर के अनुसार, पल्लव दक्षिण भारत तथा पहव सिंधु प्रदेश के पश्चिमोत्तर भाग में निवास करने वाली जातियाँ थीं।
तोंडमंडलम् (दक्षिण भारत का वह भूभाग, जहाँ पल्लवों ने अपना राज्य स्थापित किया) में पल्लवों को विदेशी माननेवाले अन्य इतिहासकारों की मान्यता है
कि पल्लव मूलतः श्रीलंका के निवासी थे। सी. रसनयगम मुदालियार के अनुसार, "पल्लव चोल-नाग वंश के थे और उनका मूल निवास स्थान दक्षिण प्रायद्वीप का नितांत दक्षिणी भाग तथा श्रीलंका था। उनका मत है कि चोल वंश के किल्ली वलवन अथवा नेडुमुडी किल्ली का विवाह लंका के मणिपल्लवम् नामक जनपद की नागवंशीय कन्या के साथ हुआ था। इनसे तैंडैमान् इलंतियैरन् नामक पुत्र हुआ। यही दूसरी सदी ई. के उत्तरार्द्ध में किल्ली वलवन का उत्तराधिकारी चुना गया। इलंतियैरन् से जिस वंशपरंपरा का प्रारंभ हुआ वह उसकी माता के जन्मस्थल मणिपल्लवम् के नाम से प्रसिद्ध हुआ। बाद में यही राजवंश पल्लवम नाम से जाना जाने लगा, जिसमें पिता की ओर से उरैयूर के चोल वंश का और माता की ओर से लंका स्थित मणिपल्लवम् जनपद के नागवंश का रक्त सम्मिश्रित था।
उपर्युक्त मत को स्वीकार करने में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि पल्लवों की अभिलिखित वंश- परंपरा में संस्थापक के रूप में न तो तँडैमान इलतियैरन् का नाम आता है और न ही किसी अन्य चोल नागवंशीय राजा का। रसनयगम की मान्यता के आधार मणिमेकलै तथा सिलप्पदिकरम नामक तमिल महाकाव्य हैं, किंतु मणिमेकलै में तैंडैमान इलतिरैयन को तमिल साहित्य एवं संस्कृति के पोषक के रूप में चित्रित किया गया है। वह स्वयं भी तमिल भाषा में कविता करता था, किंतु इसके विपरीत पल्लवों के अभिलेख ऐसा कोई संकेत नहीं देते हैं, जिनके आधार पर यह कहा जा सके कि आरंभिक पल्लवों का तमिल साहित्य एवं संस्कृति से संबंध था।
वस्तुतः इन अभिलेखों में पल्लवों के पूर्वजों को भारद्वाज गोत्रीय और अश्वमेध, वाजपेय आदि यज्ञों का कर्ता बताकर वैदिक संस्कृति का पोषक सिद्ध किया गया है। इनके अभिलेखों की भाषा प्राकृत और संस्कृत है। संस्कृत के साथ तमिल भाषा का व्यवहार परवर्ती पल्लवों ने ही किया।
के. पी. जायसवाल एवं के.ए. नीलकंठ शास्त्री पल्लवों को उत्तर भारतीय मूल का राजवंश मानते हैं। शास्त्री के अनुसार पल्लव भी कदबों की भाँति उत्तर से दक्षिण भारत की ओर आए, जहाँ उन्होंने स्थानीय परंपराओं को अपने अनुसार ढाल लिया।
उदाहरणार्थ, कदंबों ने कदंब वृक्ष की उपासना प्रारंभ कर दी तथा वे सुब्रह्मण्यम की पूजा करने लगे, जो तमिल परंपरा के अनुसार कदंब वृक्ष में निवास करते थे। नीलकंठ शास्त्री कहते हैं कि ठीक इसी प्रकार पल्लव शब्द को तोंडई का एक रूप माना जा सकता है, जो एक प्रदेश विशेष तथा उसके शासकों के साथ एक लता की ओर भी संकेत करता है।
एस. कृष्णा स्वामी आयंगर का निष्कर्ष है कि पल्लवों का मूल स्थान तोंडमंडलम् था। उनके अनुसार पल्लव सातवाहन राज्य के दक्षिण-पूर्व भाग में सामंत एवं अन्य अधिकारियों के रूप में नियुक्त थे।
आयंगर पल्लव तथा संगम साहित्य में वर्णित तोंडैयार अथवा तोंडमंडलम के निवासी को समानार्थी मानते हैं और कहते हैं कि 225 ई. के आसपास सातवाहनों के पतन के पश्चात् पल्लवों ने एक नए राजवंश की आधारशिला रखी। शिवस्कंदवर्मन पल्लव के प्राकृत भाषा में लिखित ताम्रपत्र- अनुदानों से पल्लवों के कांची से कृष्णा तक के प्रसार का संकेत मिलता है। चूँकि शिवस्कंदवर्मन का सातवाहनों से घनिष्ठ संबंध था इसलिए उसने अपने अभिलेख प्राकृत में जारी किए और धर्ममहाराज की उपाधि धारण की।
पल्लवों का मूल स्थान तोंडमंडलम ही था। तोंडमंडलम अशोक के साम्राज्य में सम्मिलित था और उसके साम्राज्य में निवास करनेवाले व्यक्तियों की सूची में सम्मिलित पुलिंद तोंडमंडलम के कुरूंच थे।
आर. साथिन थैर की मान्यता है कि पल्लवों का उद्भव मौर्य काल में हो चुका था और अशोक के अभिलेख में इनका उल्लेख 'पलद' के रूप में हुआ हैं। राजसिंह के वायलूर स्तंभ अभिलेख में पल्लव नाम का उल्लेख ब्रह्मा से अश्वत्थामा तक प्रथम सात पौराणिक पूर्वजों के बाद तथा अशोक के नाम के पहले हुआ है। इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि अशोक के पहले तोंडमंडलम में कोई पल्लव शासक था। प्रारंभिक पल्लवों का सातवाहनों से घनिष्ठ संबंध था तथा इनका शासनप्रबंध सातवाहनों की शासन व्यवस्था से प्रभावित था। सातवाहनों के समय भी तोंडमंडलम एक प्रांत था। सातवाहनों के बाद नागों का प्रभुत्व स्थापित हुआ, जिनका उन्मूलन कर पल्लवों ने कांची में एक स्वतंत्र राज्य की नींव रखी।
पल्लवों के प्रारंभिक अभिलेख प्राकृत भाषा में हैं।
भाषा एवं लेखन शैली के आधार पर इन्हें तीसरी-चौथी सदी का माना गया है। इन अभिलेखों से स्पष्ट होता है कि सिंहवर्मन पल्लव राजवंश का संस्थापक था तथा उसने एवं उसके उत्तराधिकारियों ने आंध्रप्रदेश एवं कांची में अपना आधिपत्य स्थापित किया था। यद्यपि इनसे पल्लव राजाओं के उत्तराधिकार का क्रम स्पष्ट नहीं हो पाता है, फिर भी शिवस्कंदवर्मन को सिंहवर्मन का उत्तराधिकारी माना जा सकता है। अपने अभिलेख में शिवस्कंदवर्मन अपने पिता का उल्लेख 'बप्प' के रूप में करता है। दिनेशचंद्र सरकार की दृष्टि में बप्प' शब्द केवल पिता का द्योतक है, शिवस्कंदवर्मन के पिता के नाम का नहीं। संभवतः शिवस्कंदवर्मन के पिता का नाम सिंहवर्मन था,
जिसके मंचिकल्लू अभिलेख की लेखन शैली इक्ष्वाकु अभिलेखों की लेखन शैली से मिलती है और जो निश्चित रूप में शिवस्कंदवर्मन के अभिलेखों की लेखन शैली से पूर्व की है। कुछ इतिहासकार मैडवोलु एवं हीरहडगली अभिलेखों में उल्लिखित शिवस्कंदवर्मन और चारूदेवी के ब्रिटिश म्यूजियम ताम्रपत्र में उल्लिखित विजयस्कंदवर्मन को एक ही मानते हैं, किंतु दिनेशचंद्र सरकार के अनुसार दोनों भिन्न व्यक्ति थे। उनका मत है कि ब्रिटिश म्यूजियम ताम्रपत्र की भाषा संस्कृत बहुल है; इसलिए इसे मैडवोलुएवं हीरहडगली अभिलेखों, जिनमें प्राकृत का बाहुल्य है, का परवर्ती माना जा सकता है।
पल्लवों का प्रारंभिक इतिहास विष्णुगोप का उल्लेख किए बिना पूरा नहीं हो सकता है।
समुद्रगुप्त के प्रयाग स्तंभ अभिलेख में विष्णुगोप का कांची के राजा के रूप में उल्लेख है, जिसे समुद्रगुप्त ने दक्षिणी सैन्य अभियान के क्रम में पराजित किया था। विष्णुगोप का पल्लवों के प्राकृत अभिलेखों में कोई उल्लेख नहीं है, पर चूँकि समुद्रगुप्त का शासनकाल (330-76) तथा उसके दक्षिण भारतीय सैन्य अभियान की तिथि (350-60 ई.) विश्वस्त रूप से ज्ञात है, इसलिए इतिहासकारों ने विष्णुगोप को समुद्रगुप्त का समकालीन मानकर उसकी तिथि 350 ई. निर्धारित की है। दुर्भाग्यवश पल्लवों की वंशावली में उसका स्थान अथवा प्राकृत अभिलेखों में उल्लिखित पल्लव राजाओं के साथ उसका संबंध स्पष्ट नहीं है, किंतु यदि मान लिया जाए कि प्राकृत अभिलेखों में उल्लिखित पल्लव विष्णुगोप के तात्कालिक पूर्वज थे, तो यह मानने में कोई कठिनाई नहीं होगी कि पल्लवों के उत्थान का प्रारंभ तीसरी सदी के मध्य हुआ। यही वह समय था, जब सातवाहनों के राज्य का विघटन भी हुआ।
प्राकृत अभिलेखों में उल्लिखित पल्लवों के पश्चात् कांची पर जिन पल्लवों का आधिपत्य स्थापित हुआ, उनकी जानकारी संस्कृत भाषा में लिखित ताम्रपत्रों से होती है, जिन्हें स्वयं पल्लव राजाओं ने ही जारी किया था। ऐसे ताम्रपत्रों की संख्या लगभग 12 है और उनमें 16 से भी अधिक राजाओं एवं युवमहाराजाओं का उल्लेख है। इनमें पल्लवों की वंशावली निर्धारित करने की दृष्टि से कुमार विष्णु-द्वितीय का चेंदलूर ताम्रपत्र तथा नंदिवर्मन-प्रथम का उदर्येदिरम ताम्रपत्र विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इन ताम्रपत्रों में उन्हें जारी करने वाले पल्लवों के नाम के साथ ही उनके पूर्वजों के नाम भी उल्लिखित हैं। उदाहरणार्थ, कुमारविष्णु-द्वितीय द्वारा जारी किए गए चेंदलूर ताम्रपत्र में कुमार विष्णु द्वितीय का उल्लेख बुद्धवर्मन के पुत्र, कुमार विष्णु-प्रथम के पौत्र, और स्कंदवर्मन के प्रपौत्र के रूप में हुआ है।
संस्कृत अभिलेखों में उल्लिखित पल्लव राजाओं की अवधि 350 ई. से 575 ई. के मध्य की है, किंतु यह बता पाना सरल नहीं है कि प्राकृत अभिलेखों के पल्लव और संस्कृत अभिलेखों के पल्लव एक-दूसरे से किस प्रकार संबद्ध थे। इतना अवश्य है कि चूंकि प्राकृत और संस्कृत दोनों ही प्रकार के अभिलेखों में उल्लिखित पल्लवों के नामों में समानता है, इसलिए यह कहा जा सकता है कि सभी एक ही परिवार के सदस्य थे।
पल्लवों के संस्कृत अभिलेख में उल्लेख है कि वीरकूर्च अथवा वीरकूर्चवर्मन नाग राजकुमारी के साथ विवाह करने के पश्चात् राजा बना।
कुछ इतिहासकारों ने इस तथ्य के आधार पर यह निष्कर्ष दिया है। कि वीरकूर्च ही पल्लव वंश का संस्थापक था, किंतु अन्य इतिहासकार इस मत से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार संस्कृत अभिलेख में उल्लिखित तथ्य की व्याख्या इस रूप में की जा सकती है कि वीरकूर्च ने नाग परिवार के साथ वैवाहिक संधि करके समुद्रगुप्त के दक्षिणापथ अभियान के पश्चात् पल्लवों की शक्ति को पुनर्जीवित किया। इसके साथ यह भी संभव है कि वीरकूर्चवर्मन पल्लवों की संपार्श्विक शाखा जिसने नेल्लोर-गुंटूर क्षेत्र में अपना आधिपत्य स्थापित किया था, का प्रथम शासक रहा हो। वस्तुतः संस्कृत अभिलेखों में मुख्य शाखा के पल्लव राजाओं के साथ-साथ संपार्श्विक शाखा के पल्लव राजाओं तथा युवमहाराजाओं को एक ही वंश परंपरा में इस प्रकार गुंफित कर लिया गया है कि पल्लवों का इस काल का इतिहास अत्यंत जटिल हो गया है।
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