पल्लव काल :आर्थिक स्थिति - Pallava Period: Economic Status

पल्लव काल :आर्थिक स्थिति - Pallava Period: Economic Status


पल्लव काल में ग्राम का आर्थिक क्रिया-कलाप कृषि मात्र में ही सीमित नहीं था। ग्रामवासियों द्वारा अनेक प्रकार के उद्योग, यथा-बुनकरी कुम्हारी, बढ़ईगिरी, लोहारी, सोनारी आदि पेशे के रूप में अपनाए जाते थे। सामान्य पण्य द्रव्य के रूप में अन्न, तैल, घृत, नारियल, गुड़ आदि थे। नमक, कपूर, मसाले आदि का भी व्यापार होता था। इन द्रव्यों का विशेष विपणन मंदिरों के उत्सवों और मेलों के समय में होता था। सामयिक बाजार भी लगा करते थे। पल्लव शासकों का विदेशी व्यापर के प्रति संरक्षण भाव था। महाबलीपुरम् विशेष रूप से एक अंतर्राष्ट्रीय समुद्रपत्तन के रूप में ही बसाया गया था।

यहाँ से दंतपुर ताम्रलिप्ति, श्रीलंका और पूर्वी द्वीपसमूहों के लिए निरंतर जहाज चलते थे। पूर्वी द्वीपसमूहों से स्वर्ण और मसालों का व्यापर होता था। ईलियट द्वारा प्रकाशित पल्लवों की रजत मुद्राओं पर मस्तूलदार जहाज भी बने हैं। ये सिक्के नरसिंहवर्मन और राजसिंह के समय में प्रचलित समुद्री नौकायन के प्रतीक हैं। जिन मुद्राओं पर विशेषतया जल-प्रतीक, यथा कच्छप, मत्स्य आदि पाए जाते हैं। वे भी पल्लवों के समुद्री व्यापार के प्रमाण हैं। ऐसी मुद्राएँ प्रायः कारोमंडल तट से प्राप्त हुई है। आंतरिक व्यापार के संचालक ग्राम वणिक थे और भारी व्यापारिक मंडियाँ और आढ़त तथा समुद्री व्यापार में नगरश्रेष्ठी या श्रेष्ठी भाग लेते थे।