पल्लव काल - Pallava period
पल्लव काल - Pallava period
पल्लवकालीन समाज के संबंध में सूचनाएँ पर्याप्त नहीं मिलतीं। यत्र-तत्र से प्राप्त सूचना के आधार पर समाज की केवल सामान्य रूपरेखा ही प्रस्तुत की जा सकती है। संगम युग की तरह कांची इस समय भी राजनीति और संस्कृति का प्रधान केंद्र था। यह एक व्यापारिक केंद्र भी था अतएव यहाँ की आबादी में प्रवासी या विदेशी जनसंख्या का अनुमान किया जा सकता है, जिसका परिणाम यहाँ की सामाजिक और सांस्कृतिक संरचना पर अवश्य ही पड़ा होगा। किंतु सबसे अधिक प्रभावी परिवर्तन ब्राह्मणधर्म की व्यापकता के कारण हुआ। हिंदू धर्म के प्रभाव में आकर सामाजिक संरचना वर्ण-धर्म के आधार पर थी। अनेक अभिलेखों में राजाओं के वर्णाश्रम धर्म के संरक्षण की प्रशस्ति गायी गई है।
वर्ण और जातियों का प्रभाव व्यवसायिक संरचना पर भी पड़ने लगा था। इस प्रकार बहुत से व्यवसाय जातिविशेष के ही दायित्व अथवा एकाधिकार के रूप में माने जाने लगे थे। प्रायः हीन उद्योग और व्यवसाय शूद्र या अल्प महत्व के वैश्यों के ही द्वारा संचालित होते थे। उच्च पेशों में वर्ण या जाति का एकाधिकार होते हुए भी उनमें परस्पर विपर्यय की संभावना रहती थी। कभी-कभी राजाओं को वर्णेत्तर व्यवसाय को नियंत्रित करने का प्रयास भी करना पड़ता है। फिर भी उत्तर भारत की अपेक्षा पेशों पर वर्ण और जाति का प्रभाव कम था।
ब्राह्मणों का आजीव अनेक अभिलेखों से ज्ञात होता है कि 'शास्त्र के अतिरिक्त शस्त्र' भी था। राजकर्मचारी, सैनिक अधिकारी के रूप में ब्राह्मणों का उल्लेख बराबर मिलता है। किंतु सामान्य रूप से ब्राह्मण 'दानवृत्ति पर ही अपनी जीविका चलाते थे। विभिन्न मंदिरों, "घट्टिकाओं में वे विद्यादान करते थे और प्राप्त दान के आधार पर अपना और अपने शिष्यों का भरण पोषण करते थे। समाज का आर्थिक ढाँचा पूरी तरह कृषकों पर ही आधारित था। भूमिधर कृषकों, कारीगरों और व्यापारियों की अपेक्षा भूमिधर कृषक समाज में विशेष महत्व रखते थे। समाज की संरचना में भूमिहीन कृषकों की संख्या अधिक थी किंतु मान्यता की दृष्टि से इन्हें अर्द्धदास भी कहा जा सकता था।
इन्हें भूमिधर कृषकों के खेतों पर काम करने के लिए विवश किया जा सकता था और सामान्यतया वे ग्राम छोड़कर न तो अन्यत्र जा सकते थे और न अन्य कोई उपार्जन ही अपना सकते थे। समाज में स्त्रियों की दशा अच्छी थी। उन्हें आदर का स्थान प्राप्त था। उन्हें संपत्ति रखने का भी अधिकार था। संभ्रांतवर्ग की स्त्रियाँ शिक्षित होती थीं और पर्याप्त स्वतंत्रतावाद का उपभोग करती थीं। दान-धर्म संबंधी कार्यों के लिए वे स्वतंत्र थीं। बहुविवाह प्रचलित था, विशेषकर राजवर्ग में पल्लवों का विभिन्न राजवंशों और सामंत कन्याओं के साथ विवाह का विशेष राजनीतिक महत्व भी होता था। सती प्रथा प्रचलित थी किंतु इसके उदाहरण कम मिलते हैं।
धनाढ्य वर्ग अपने अतिरिक्त अर्जन का उपयोग भोग-विलास में ही प्रायः करता था। किंतु धार्मिक कार्यों में भी उनकी रूचि होती थी। उनके द्वारा तालाब, कूप, पाठशाला, चिकित्सालय भी संचालित होते थे। मंदिरों तथा वहाँ संचालित होने वाली पाठशालाओं घट्टिकाओं आदि का नियमित व्यय भी उनके अक्षय नीवि प्रकार के दान से चलता था। ये दान प्रायः व्यापारिक और आर्थिक गणों में जमा कर दिए जाते थे और उसके ब्याज से मंदिर आदि की व्यवस्था तथा शिक्षण संस्थानों का कार्य संचालित होता रहता था ।
समाज की संरचना में ग्राम छोटी इकाई होते हुए भी महत्वपूर्ण इकाई थी ग्रामों के बसाव के अंतर्गत, आवास, बाग-बगीचे, मार्ग, बाजार, मंदिर, मठ होते थे। खेतिहर भूमि का प्रमुख वर्गीकरण सिंचित और असिंचित भूमि के आधार पर होता था। ग्राम भूमि का महत्वपूर्ण अंग चारागाह भी होता था। चारागाह पर सामूहिक और खेतों पर व्यक्तिगत भूमि स्वामित्व का विधान था। इसी प्रकार खलिहान भी सार्वजनिक हुआ करते थे। ताबाल, नदी, नहर भी सार्वजनिक उपयोग के लिए थे। ग्रामों की आबादी बहुजातीय थी। यहाँ तक कि 'अग्रहार' अथवा 'ब्रह्मदेय' ग्रामों में भी अन्य जातियों के लोग बसा करते
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