सिंहविष्णु द्वारा स्थापित वंश के पल्लव - Pallavas of the dynasty founded by Simhavishnu

सिंहविष्णु द्वारा स्थापित वंश के पल्लव - Pallavas of the dynasty founded by Simhavishnu


छठी सदी का अंतिम चतुर्थांश पल्लवों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण है। इस अवधि के प्रमुख ऐतिहासिक साक्ष्य पाषाण अभिलेख एवं साहित्य हैं जिनसे तत्कालीन राजनैतिक अभिरचनाओं का स्पष्ट ज्ञान होता है। साहित्यिक स्रोतों में 'तेवाराम', 'नालाभिर प्रबंधम, मत्तविलास प्रहसन', ‘नंदिक्ललंबगम तथा ‘अवंतिसुंदरी कथा' प्रमुख हैं, जो अभिलेखीय स्रोतों से प्राप्त जानकारी की पुष्टि करते हैं। चीनी यात्री हुआन सांग का वृत्तांत भी पल्लव इतिहास के अध्ययन की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।


पल्लव राजवंश का वास्तविक संस्थापक सिंहविष्णु था जो अवनिसिंह के नाम से ख्यात था। 'मत्तविलास प्रहसन से उसके विषय में पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है।

काशाक्कुड़ी अभिलेख में उसकी सैन्य शक्ति का गुणगान है। इसमें इस बात का उल्लेख है कि उसने कावेरी नदी से आगे तक अपने राज्य का विस्तार किया था। इसके साथ ही, उसने कलओं सहित कई द्रविड़ राजाओं पर भी विजय प्राप्त की थी।


वातापी के चालुक्य राजा मंगलेश के शासनकाल में जारी महाकूट स्तंभ अभिलेख में शासकों की एक लंबी सूची है, जिन्हें कीर्तिवर्मन प्रथम चालुक्य ने पराजित किया था। महालिंगम इस अभिलेख में उल्लिखित 'द्रमिल' का अर्थ पल्लव' मानते हैं और कहते हैं कि कीर्तिवर्मन एवं सिंहविष्णु के बीच एक संघर्ष हुआ था।

उनके अनुसार दोनों शासक महत्त्वाकांक्षी थे और वे अपने-अपने राज्यों की सीमा का विस्तार करना चाहते थे। किंतु महालिंगम के इस मत को स्वीकार कर लेने में एक कठिनाई यह है कि यह पूर्णतः द्रमिल' शब्द की पहचान पर आधारित है, जिसका अर्थ पल्लव न होकर सामान्य रूप से "तमिल' भी हो सकता है। इसके अतिरिक्त सिंहविष्णु के शासनकाल में पल्लव- चालुक्य संघर्ष का कोई और साक्ष्य उपलब्ध नहीं है। उल्लेखनीय है कि पल्लव- चालुक्य संघर्ष का स्पष्ट उल्लेख पहली बार पुलकेशिन द्वितीय के ऐहोल अभिलेख में मिलता है। सिंहविष्णु की वैष्णव धर्म में आस्था थी। इसके साथ ही, वह संस्कृत कवि भारवि का संरक्षक था जिन्होंने किरातार्जुनीयम्' की रचना की।


महेंद्रवर्मन सिंहविष्णु का पुत्र एवं उत्तराधिकारी था। यद्यपि उसके राज्यारोहण की तिथि विवादास्पद है, नरसिंहवर्मन- प्रथम के वातापी अभिलेख के आधार पर उसके शासनकाल की परवर्ती सीमा 630 ई. नियत की जा सकती है। महेंद्रवर्मन प्रथम के शासनकाल में पल्लवों और चालुक्यों के बीच दीर्घकालिक संघर्ष शुरू हुआ। इसका कारण राजनीतिक था। ऐहोल अभिलेख में उल्लिखित है कि पुलकेशिन द्वितीय के उत्कर्ष का पल्लवों ने प्रारंभ से ही विरोध किया था। इसका कारण यह था कि पुलकेशिन द्वितीय ने अपनी दिग्विजय के क्रम में कदंबों को पराजित करके वेंगी पर अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया था। उल्लेखनीय है कि कदंबवंशीय राजाओं का पल्लव नरेशों के साथ घनिष्ठ संबंध था। वस्तुतः पल्लवों की संरक्षकता में ही कदंबवंश एक स्वतंत्र राज्य के रूप में विकास कर रहा था।

ऐसी स्थिति में वेंगी पर चालुक्यों का अधिकार होना पल्लवों के लिए एक खतरनाक बात थी, क्योंकि कदंबों के माध्यम से पल्लवों द्वारा अपने शत्रु गंगवंशीय राजाओं पर नियंत्रण रखना संभव हो पाता था। कदबों की पराजय से चालुक्य और गंग के रूप में दो प्रबल विपक्षी खड़े हो गए थे। इसी कारण महेंद्रवर्मन- प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय का विरोध किया। किंतु संघर्ष के प्रथम चरण में महेंद्रवर्मन को सफलता नहीं मिली। • ऐहोल अभिलेख के अनुसार पुलकेशिन द्वितीय ने महेंद्रवर्मन प्रथम को पराजित किया । यद्यपि इस पराजय से पल्लवों को अपने राज्य का उत्तरी भाग गँवा देना पड़ा, महेंद्रवर्मन प्रथम ने शीघ्र ही अपनी इस पराजय का बदला लिया। पल्लवों के काशाक्कुड़ी अभिलेख से पता चलता है

कि महेंद्रवर्मन प्रथम ने अपने 'प्रमुख शत्रु' को कांची के निकट पुल्ललूर में एक युद्ध में पराजित किया। चूँकि इस अभिलेख में महेंद्रवर्मन-प्रथम के प्रतिद्वंद्वी के नाम का स्पष्ट उल्लेख नहीं हैं, इसलिए कुछ विद्वान इस प्रमुख शत्रु' को गंगवंशीय राजा मानते हैं किंतु अन्य इतिहासकारों का मत है कि पुल्ललूर में चालुक्यों एवं पल्लवों के बीच ही युद्ध हुआ और इसमें महेंद्रवर्मन ने पुलकेशिन द्वितीय को पराजित किया।


पल्लवों और चालुक्यों के बीच अंतहीन शत्रुता का एक परिणाम यह हुआ कि पल्लवों ने वेंगी सहित अपने राज्य के उत्तरी भाग पर अपना अधिकार खो दिया, जहाँ पुलकेशिन द्वितीय के अनुज ने एक राजवंश की स्थापना की। इसे पूर्वी चालुक्य वंश कहा जाता है।


एक शैव संकलन, पेरिय पुराणम्' के अनुसार, महेंद्रवर्मन प्रथम प्रारंभ में जैन था। बाद में उसकी इस धर्म के प्रति अनास्था हो गई और संत अप्पार के प्रभाव से वह शैव हो गया था, किंतु वैष्णव धर्म के प्रति भी उसके मन में समान आदर का भाव था। मंडगपट्टू मंदिर स्थित अभिलेख में उल्लिखित है कि उसने इस मंदिर का निर्माण ब्रह्मा, ईश्वर और विष्णु के सम्मान में किया। कांची स्थित एकंबरनाथ मंदिर पर महेंद्रवर्मन की एक उपाधि, 'नृपचूड़ामणि' का उल्लेख है। इसी मंदिर की एक भित्ति पर निर्वाण और ध्यान की मुद्रा में बुद्ध का चित्र अंकित हैं। इससे संकेत मिलता है कि महेंद्रवर्मनप्रथम के शासनकाल में बौद्ध धर्म को भी राजकीय संरक्षण प्राप्त था।


महेंद्रवर्मन प्रथम की एक उपाधि थी- चेत्तकारी या चैत्यकारी, अर्थात् चैत्य या मंदिरों का निर्माता।

ऐसा उसे इसलिए कहा जाता है क्योंकि उसने दक्षिण भारत में चट्टानों और पहाड़ों को तराश कर मंदिर बनाने की प्रथा प्रारंभ की। अपने धर्म परिवर्तन के पश्चात् उसने पहाड़ों को काटकर वल्लम महेंद्रवाड़ी एवं दलवनूर में एकाश्म मंदिरों का निर्माण करवाया। महालिंगम के अनुसार महेंद्रवर्मन ने मंडगपड्डु पल्लावरम, सिंयमंगलम् कुरंगनिलमुत्तमपु विलाप्पाक्कम एवं अरकडनल्लूर आदि स्थानों में भी पहाड़ों को काटकर कई संरचनाएँ बनवाई। उसने महेंद्रवाड़ी में एक बड़े तालाब का भी निर्माण करवाया था।


महेंद्रवर्मन बहुमुखी प्रतिभा का घनी था। उसने स्वयं मत्तविलास प्रहसन' नामक एक ग्रंथ की रचना की थी। इसमें उसने शैव और बौद्ध तपस्वियों की कमजोरियों और मूर्खता को उपहास का विषय बनाया है।

उसकी एक उपाधि चित्रकारप्पुलि थी, जिससे संकेत मिलता है कि उसके समय में चित्रकला को राजकीय संरक्षण प्राप्त था। उसने चित्रकला पर भी दक्षिण चित्र' नामक एक ग्रंथ की रचना की थी। बहुमुखी प्रतिभा के कारण ही वह 'विचित्रचित्त' के नाम से भी जाना जाता था।


नरसिंहवर्मन - प्रथम अपने पिता महेंद्रवर्मन प्रथम का उत्तराधिकारी था। वह उच्च कोटि का योद्धा था और इस दृष्टि से उसका उपनाम महामल्ल सर्वथा उचित था। उसने अपने शासनकाल में पल्लव राज्य को प्रायद्वीपीय भारत की सर्वोच्च राजनीतिक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित किया।

परमेश्वरवर्मन प्रथम के कूरम अभिलेख में उल्लिखित है कि नरसिंहवर्मन प्रथम ने पुलकेशिन द्वितीय को मणिमंगलम सहित तीन युद्धों में पराजित किया। मणिमंगलम कांची से 20 मील पूर्व अवस्थित था। इसलिए ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि महेंद्रवर्मन प्रथम की मृत्यु के पश्चात् पुल्ललूर में अपनी पराजय की प्रतिक्रिया स्वरूप पुलकेशिन द्वितीय ने कांची पर आक्रमण किया, किंतु नरसिंहवर्मन के द्वारा वह स्वयं ही पराजित हो गया।


पुलकेशिन द्वितीय को पराजित करने के पश्चात् नरसिंहवर्मन-प्रथम ने चालुक्यों के विरुद्ध एक आक्रामक योजना बनाई और इसके कार्यान्वयन के लिए उसने अपने सेनापति शिरू तोंड,

जिसका उपनाम 'परन जोति' था, के नेतृत्व में एक सेना चालुक्यों की राजधानी वातापी भेजी। पल्लवों ने 642 ई. में वातापी पर विजय प्राप्त की और पुलकेशिन द्वितीय मारा गया। पेरियपुराणम् और बेलूरपाल्यम अभिलेख के अनुसार इस विजय की स्मृति में वातापी में एक कीर्ति स्तंभ स्थापित किया गया। इसके अतिरिक्त नरसिंहवर्मन ने स्वयं वातापीकोड (वातापी का विजेता) की उपाधि धारण की। इस ऐतिहासिक विजय का चालुक्यों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इससे चालुक्यों के राज्य में अराजकता व्याप्त हो गई और लगभग 13 वर्षों तक चालुक्यों का शासन समाप्त हो गया।


नरसिंहवर्मन - प्रथम का सिंहल अभियान उसकी एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। उसने सिंहली राजकुमार को श्रीलंका का राजसिंहासन प्राप्त करने में मदद की।

महावंश के अनुसार मानवर्मा राजच्युत हो गया था और कांची चला आया था। उसने चालुक्यों के विरुद्ध युद्ध में नरसिंहवर्मन को सहयोग प्रदान किया था। इसी से प्रसन्न होकर नरसिंहवर्मन ने उसे अनुराधापुर में पुनः राजा बनने में मदद की। नरसिंहवर्मन प्रथम ने मामल्लई से दो नौसैनिक अभियान श्रीलंका भेजे। इन नौसैनिक अभियानों का काशाक्कुदी अभिलेख में उल्लेख है, जहाँ लंका की विजय के संदर्भ में नरसिंहवर्मनप्रथम की तुलना राम से की गई है।


कुछ विद्वानों के अनुसार नरसिंहवर्मन ने महाबलिपुरम की स्थापना की। महालिंगम इससे सहमत नहीं हैं। वे कहते हैं कि पल्लव राजा और नगर के नामों में समानता के आधार पर यह कहना उचित नहीं है

कि महाबलिपुरम की स्थापना नरसिंहवर्मन मामल्ल ने की थी। वे कहते हैं कि मल्ल की उपाधि अन्य पल्लव राजाओं ने भी धारण की। उसके अनुसार, महाबलिपुरम दूसरी-तीसरी सदी के वैष्णव संतों को इसी नाम से ज्ञात था। श्रीनिवासन के अनुसार, "महालिंगम के तर्क अंशतः सत्य हैं। उनके अनुसार यद्यपि महाबलिपुरम पल्लवों के पूर्व अस्तित्व में आ चुका था, यह नरसिंहवर्मन - प्रथम के शासनकाल में ही एक पत्तन नगर एवं सांस्कृतिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ।"


नरसिंहवर्मन के शासनकाल में चीनी तीर्थयात्री हुआन सांग ने कांची की यात्रा की। उसने अपने यात्रा वृत्तांत में तोंडमंडमल एवं कांची का विवरण दिया है।

यद्यपि कांची के सब में उसके विवरण में कई विसंगतियाँ और परस्पर विरोधी तथ्य सम्मिलित हैं, फिर भी कांची में निवास करने वालों की जीवन- शैली, परंपराओं आदि के संबंध में वह महत्वपूर्ण जानकारी देता है।


परमेश्वरवर्मन प्रथम का राज्यारोहण पल्लवों के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना है क्योंकि उसके शासनकाल में ही चालुक्यों के साथ पल्लवों का संघर्ष अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँचा। गड़वाल अभिलेख से ज्ञात होता है कि परमेश्वरवर्मन प्रथम का समकालीन चालुक्य शासक विक्रमादित्य- प्रथम था,

जिसने परमेश्वरवर्मन- प्रथम (ईश्वर पोतराज) को पराजित कर पल्लव परिवार को नष्ट किया और कांची पर अपना अधिकार स्थापित किया। विक्रमादित्य प्रथम का युद्ध शिविर कावेरी के दक्षिणी तट पर उरगपुर नामक स्थान में अवस्थित था और यह अभिलेख इसी शिविर से 674 ई. में जारी किया गया था।.


दूसरी ओर, पल्लवों के साक्ष्य परमेश्वरवर्मन प्रथम की विजय का संकेत देते हैं। संभवतः परमेश्वरवर्मन- प्रथम विक्रमादित्य प्रथम द्वारा अपनी पराजय का प्रतिशोध लेने में समर्थ रहा।

परमेश्वरवर्मन- प्रथम के कूरम अभिलेख में कहा गया है कि परमेश्वरमर्वन द्वारा विक्रमादित्य के लाखों सैनिक पराजित हुए और स्वयं विक्रमादित्य समर भूमि से भाग गया। वेलूरपाल्यम अभिलेख में भी परमेश्वरवर्मन- प्रथम की सफलता का संकेत है। इसमें कहा गया है कि जैसे "सूर्य कोहरों का विनाश करता है, उसी प्रकार परमेश्वरवर्मन - प्रथम ने अपने शत्रुओं का विनाश किया।" उदयेदिरम अभिलेख के अनुसार, परमेश्वरवर्मन- प्रथम और विक्रमादित्य प्रथम का यह निर्णायक युद्ध पेरूवडवल्लूर में हुआ जो संभवतः उरगपुर के आसपास ही अवस्थित था। परमेश्वरवर्मन प्रथम शैव था और शिव के सम्मान में उसने कई मंदिर बनवाए। उसने पत्थरों को तराश कर मंदिर बनाने की परंपरा कायम रखी। इसके साथ ही उसने ग्रेनाइट के पाषाण- खंडों की मदद से संरचनात्मक मंदिरों का भी निर्माण करवाया।