सिंहविष्णु द्वारा स्थापित वंश के पल्लव - Pallavas of the dynasty founded by Simhavishnu
सिंहविष्णु द्वारा स्थापित वंश के पल्लव - Pallavas of the dynasty founded by Simhavishnu
परमेश्वरवर्मन का उत्तराधिकारी नरसिंहवर्मन द्वितीय राजसिंह था। उसका शासनकाल शांति और समृद्धि का काल था। उसने मंदिरों के निर्माण में विशेष रुचि दिखाई। वह विद्वानों का संरक्षक था। प्रसिद्ध कवि और नाटककार भास ने उसके दरबार को सुशोभित किया। कांची स्थित कैलाशनाथ एवं ऐरावतेश्वर मंदिर, महाबलिपुरम स्थित समुद्रतट मंदिर तथा पनमलै स्थित तालपुरीश्वर मंदिरजैसी श्रेष्ठ वास्तुकलात्मक कृतियों का निर्माण नरसिंहवर्मन द्वितीय ने ही करवाया था। कैलाशनाथ मंदिर स्थित अभिलेखों के अनुसार उसकी मुख्य रानी, रंगपताका ने भी इस मंदिर के निर्माण में गहरी रुचि ली थी।
राजसिंह के अभिलेख तथा काशाक्कुदी एवं उदयँदिरम अनुदान पत्रों से ज्ञात होता है कि उसके शासनकाल में शैव धर्म अपने चरमोत्कर्ष पर था। इसे राजकीय संरक्षण प्राप्त था। उल्लेखनीय है कि नरसिंहवर्मन ने श्रीशंकर भक्त एवं शिव चूड़ामणि' जैसी उपाधियाँ धारण की थीं। कुछ इतिहासकारों की मान्यता है कि शंकराचार्य उसके समकालीन थे यद्यपि यह संदिग्ध है।
नरसिंहवर्मन द्वितीय ने चीनी व्यापारियों के लिए नागपट्टनम में बौद्ध विहार का निर्माण करवाया था। चीनी स्रोतों के अनुसार,
नरसिंहवर्मन द्वितीय ने 720 ई. में चीन के सम्राट के पास अपने दूत भेजे। पल्लव एवं चीनी अरबों एवं तिब्बतियों को समान रूप से अपना शत्रु समझते थे क्योंकि वे दक्षिण पूर्व एशिया के राज्यों के साथ उनके राजनीतिक एवं व्यापारिक संबंधों में व्यवधान उपस्थित करते थे। इसलिए जब नरसिंहवर्मन द्वितीय ने अरबों एवं तिब्बतियों को दमन करने का निश्चय किया तो उसे चीन के सम्राट का भी सहयोग प्राप्त हुआ।
नरसिंहवर्मन द्वितीय का उत्तराधिकारी परमेश्वरवर्मन द्वितीय था। वह सिंह विष्णु की परंपरा का अंतिम शासक था। चालुक्य स्रोतों से ज्ञात होता है
कि युवराज विक्रमादित्य ने 730 ई. में कांची पर आक्रमण किया था। इस आक्रमण में गंग वंश ने चालुक्यों का साथ दिया था। इसमें गंग सेना का नेतृत्व श्रीपुरुष के पुत्र एरेयप्प ने किया था। संभवतः एरेयप्प के साथ ही एक युद्धमें परमेश्वरवर्मन द्वितीय मारा गया।
परमेश्वरवर्मन द्वितीय की मृत्यु से पल्लव राज्य में राजनैतिक असमंजस की स्थिति उत्पन्न हो गई। ऐसी परिस्थिति में पल्लवों की संपार्श्विक शाखा प्रबल हो गई और राज्य के प्रमुख व्यक्तियों का शिष्टमंडल नंदिवर्मन द्वितीय, जो सिंहविष्णु के भाई का वंशज था, से मिला और उससे अनुरोध किया कि वह पल्लवों का राजत्व स्वीकार कर लें। कांची स्थित वैकुंठ पेरूमल मंदिर की मूर्तियाँ और अभिलेख स्पष्ट संकेत देते हैं
कि नंदिवर्मन ने जो परमेश्वरवर्मन द्वितीय की मृत्यु के पश्चात् पल्लवों का राजा बना, पल्लवों का राज्य अनधिकार ग्रहण नहीं किया। काशक्कुडी अभिलेख में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि नंदिवर्मन द्वितीय को राजा के पद के लिए प्रजा द्वारा वरण किया गया था।
राज्यारोहण के पश्चात् नंदिवर्मन को पांड्य राजा मारवर्मन राजसिंह के नेतृत्व में तमिल राजाओं के एक संघ के विरोध का सामना करना पड़ा। वस्तुतः पांड्य राजवंश का पल्लवों के साथ बहुत पहले से ही तनावपूर्ण संबंध था, किंतु इनके बीच वास्तविक संघर्ष की परिस्थिति नंदिवर्मन द्वितीय के राज्यारोहण से प्रस्तुत हुई । पल्लवों के प्रतिद्वंद्वियों की दृष्टि में यह एक ऐसा अवसर था,
जब वे अपनी परंपरागत शत्रुता और विद्वेष को व्यक्त कर सकते थे। उनका अनुमान था कि नंदिवर्मन द्वितीय द्वारा सिंहविष्णु की आनुवंशिक परंपरा का उल्लंघन राज्य की जनता के बीच लोकप्रिय नहीं होगा और नंदिवर्मन द्वितीय को अपदस्थ करके तथा पल्लव वंश के परंपरागत प्रतिनिधि, परमेश्वरवर्मन द्वितीय के पुत्र चित्रमाय को पल्लवों का राजा बनाकर वे पल्लव राज्य की राजनीति पर स्थायी रूप से अपना प्रभाव जमा सकेंगे। उसी उद्देश्य से समकालीन पांड्य राजा राजसिंहप्रथम ने चित्रमाय को शरण दी। पांड्य अभिलेखों से ज्ञात होता है कि राजसिंह ने पल्लवों को तंजोर के आसपास कई स्थानों पर पराजित किया। वेल्वीकुडी अभिलेख के अनुसार, राजसिंह ने नंदिवर्मन द्वितीय को नंदिपुर दुर्ग में कैद कर लिया था, किंतु शीघ्र ही नंदिवर्मन के सेनापति उदयचंद्र ने उसे मुक्ति दिलाई। उदयचंद्र ने अपनी विजय-शृंखला द्वारा तमिल राजाओं के संघ को विच्छिन्न कर दिया। इस संघर्ष में चित्रमाय भी मारा गया। इस प्रकार नदिवर्मन द्वितीय को पल्लव राजसिंहासन के एक प्रबल दावेदार से मुक्ति मिली।
अपने शासन के अंतिम वर्ष में दंतिदुर्ग जो राष्ट्रकूट राजवंश का संस्थापक तथा नदिवर्मन- द्वितीय का समकालीन था, ने कांची पर आक्रमण कर इस पर अपना अधिकार स्थापित किया। कुछ इतिहासकारों के अनुसार बाद में यह शत्रुता मैत्री में परिणत हो गई। दंतिदुर्ग और नंदिवर्मन द्वितीय के बीच एक वैवाहिक संधि हुई, जिसके अंतर्गत राष्ट्रकूट राजकुमारी रेवा का विवाह नंदिन-द्वितीय से हुआ।
फिर भी, पल्लव- राष्ट्रकूट मैत्री स्थायी सिद्ध नहीं हो सकी। बाद में भी पल्लवों एवं राष्ट्रकूटों के बीच युद्ध
होते रहे।
प्रख्यात समकालीन संत तिरुमंग आलवार की रचनाओं से ज्ञात होता है कि नंदिवर्मन द्वितीय उच्च कोटि का विद्वान और विष्णु का परम भक्त था। उसके द्वारा निर्मित मंदिरों में कांची स्थित वैकुंठ पेरूमल मंदिर और मुक्तेश्वर मंदिर महत्वपूर्ण हैं। उल्लेखनीय है कि मुक्तेश्वर मंदिर में पूजा
तिरुक्कुरिप्पुत्तोंडर द्वारा की जाती थी, जो धोबी समुदाय का सदस्य था। दंतिवर्मन नंदिवर्मन द्वितीय का उत्तराधिकारी था। वह नंदिवर्मन द्वितीय एवं रेवा का पुत्र था। उसके शासनकाल में दक्षिण भारतीय प्रायद्वीप में राष्ट्रकूट, पांड्य एवं चोल राजवंश का प्रमुख शक्तियों के रूप में उत्थान हुआ। इसके साथ ही, कांची ने अपना राजनैतिक महत्व खो दिया।
दंतिवर्मन का उत्तराधिकारी नंदिवर्मन-तृतीय था। तमिल प्रशस्ति नंदिक्कलंबगम में नंदिवर्मन तृतीय को तेल्लारू संग्राम का विजेता बताया गया है। इसकी पुष्टि नंदिवर्मन-तृतीय के 'तेल्लाररिण्ड' उपाधि से होती है, जो उसके अनेक अभिलेखों पर अंकित है। दंतिवर्मन के शासनकाल में पांड्य राजा वर्गुण द्वितीय ने पल्लव राज्य के दक्षिण प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया था। पांड्य राजा पल्लव राज्य के अन्य प्रदेशों को भी अधिकृत करने का प्रयास कर रहा था। अभिलेखों और दिक्लम्बगम से स्पष्ट है कि नंदिवर्मन-तृतीय ने पांड्य आक्रमणों का सफलतापूर्वक प्रतिकार किया। उसने कांची के पास तेल्लारू नामक स्थान में न सिर्फ पांड्यों की बढ़ती सेना को रोका बल्कि उसे बुरी तरह पराजित भी किया।
अपराजितवर्मन अंतिम महत्वपूर्ण पल्लव शासक था। उसने 880 ई. में गंग वंश के राजा पृथ्वीपति की सहायता से कुम्भकोणम के निकट श्रीपुरं वियम के युद्ध में पांड्य राजा वर्गुण द्वितीय को पराजित किया। अंततः चोल राजा आदित्य- प्रथम ने 903 ई. के आसपास अपराजितवर्मन को पराजित कर तोंडमंडलम को अपने राज्य में मिला लिया। अभिलेखों से अपराजितवर्मन के पश्चात् कुछ अन्य पल्लव राजाओं की जानकारी मिलती है, किंतु उनकी कोई उपलब्धियाँ ज्ञात नहीं हैं और न ही पल्लव वंशावली में उनका स्थान निश्चित है।
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