गुप्तोत्तर राजनैतिक स्थिति - Political status
गुप्तोत्तर राजनैतिक स्थिति - Political status
भारतीय इतिहास में गुप्तोत्तर काल अनेक दृष्टियों से बड़ा महत्वपूर्ण रहा है। गुप्त शासन के पश्चात् देश की राजनैतिक एकता की दृष्टि से यह काल यद्यपि विघटन का काल रहा है, जिसे दूर करने की सतत चेष्टा चिरस्थायी तो नहीं हो सकी, परंतु देश के इन दो सौ वर्षों के इतिहास में सकलोत्तरापथनाथ हर्ष गौरवशाली मौखरी-नरेश सर्ववर्मन, यशस्वी कन्नौज-नरेश यशोवर्मन, अप्रतिम विजेता कश्मीर- नरेश ललितादित्य मुक्तापीड़ एवं राजनीति विशारद गौड़ नरेश शशांक आदि महान राजाओं ने समय-समय पर देश के राजनैतिक जीवन में नवीन स्फूर्ति अवश्य उत्पन्न की।
वस्तुतः गुप्त साम्राज्य का अंत होने पर मगध साम्राज्य के उत्तराधिकार के इच्छुक परवर्ती गुप्तों एवं मौखरियों के बीच विकट संघर्ष प्रारंभ हुआ, जिसमें परवर्ती गुप्तों को प्रारंभिक विजय तो अवश्य प्राप्त हुई परंतु अंततोगत्वा मौखरी ही सफल मनोरथ हो सके। मौखरी राजवंश के अंत के साथ देश की प्रभुसत्ता हर्ष के हाथों आई जो उसकी मृत्यु के साथ सहसा विलुप्त हो गई। इस काल के उत्तरार्द्ध (647-750 ई.) में देश की राजनैतिक एकता दिवा स्वप्न ही बनी रही। इस काल के अंतिम चरण में यशोवर्मन एवं ललितादित्य जैसे महत्वाकांक्षी सम्राटों ने दिग्विजय द्वारा चक्रवर्तित्व का चिर अभिलषित पद तो अवश्य प्राप्त किया, परंतु देश के राजनैतिक संगठन में योगदान देने में वे सर्वथा असमर्थ रहे।
साम्राज्यवादी गुप्तों के अवसान के साथ भारतीय इतिहास का एक ऐसा युग समाप्त हो गया, जिसकी अनेक निजी विशेषताएँ थीं। मौर्यों और गुप्त का राजनैतिक स्वरूप अखिल भारतीय था और उनके शासन करते प्रायः समस्त भारत वर्ष अनेक दृष्टियों से एकसूत्र में आबद्ध था। किंतु पाँचवीं छठी शताब्दियों से राजनैतिक और सांस्कृतिक दोनों ही क्षेत्रों में कुछ ऐसी प्रवृत्तियाँ प्रारंभ हुई जो अंततः देश को विशृंखलित कर देने का कारण बन गई। प्रांतवाद की संकुचित भावनाओं का उदय सर्वप्रथम हमें गुप्त साम्राज्य की अवनति के साथ दृष्टिगोचर होता है। परिणाम स्वरूप सारा देश छोटे-छोटे राज्यों में विभक्त हो गया, क्षेत्रीय स्वरूप और स्थानीय भावनाओं का तेजी से विकास हुआ और असुरक्षा तथा अनिश्चितता का वातावरण छाने लगा। प्रशासनिक क्षेत्रों में एकरूपता, संतुलन और आंतरिक संघटन ढीले पड़ने लगे। राजनैतिक संघर्षों और सैनिकता की प्रवृत्तियाँ बहुत ही बढ़ जाने के कारण विभिन्न शासकों ने समान समस्याओं पर भी सामूहिक रूप से सोचने-विचारने की चिंता नहीं की।
प्रायः सबकी दृष्टि व्यक्तिवादी, क्षेत्रवादी अथवा स्थानीयतावादी हो गई। सभी राजाओं ने अब अपने ही राज्य और राजवंशों की रक्षा करना अपने कर्तव्यों की इतिश्री मान ली और अखिल भारतीय दृष्टि से सोचने की कोई दूर दृष्टि नहीं दिखाई। इस खंडदृष्टि और अदूरदर्शिता का परिणाम जनता में भी इतना संक्रामक हुआ कि अब वह राज्यों में प्रायः नित्य प्रति बदलने वाले मानचित्रों अथवा नवागंतुक राजाओं और राजवंशों से न तो आकृष्ट होती थी और न अधिकांश को उसका कोई दुराव था। देशभक्ति और देश भावनाएँ अत्यंत शिथिल हो गई। कुछ थोड़े से लोगों को छोड़कर अधिकांश शासितों में राजनीति के प्रति जो उदासीनता का भाव पहले से ही वर्तमान था, वह और भी घनीभूत हो गया। किंतु इन सारी प्रवृत्तियों की ओर इंगित करते हुए यहाँ यह दिखाना उद्देश्य नहीं है कि केवल यही प्रवृत्तियाँ व्याप्त थीं। उत्तरभारत पर मुसलमानी सत्ता के स्थायी स्थापना के पूर्व तथा उसके बाद भी हमें भिन्न-भिन्न अवसरों पर सामूहिक और एकबद्ध भावना, प्रगाढ़ देशभक्ति और संपूर्ण मातृभूमि की रक्षा की उत्कट इच्छा, अप्रतिम शीर्य और विदेशियों के प्रति अनवरत संघर्ष के उदाहरण मिलते हैं।
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