गुप्तोत्तरकाल (उत्तर भारत) : आर्थिक स्थिति - Post-Gupta period (North India): Economic condition
गुप्तोत्तरकाल (उत्तर भारत) : आर्थिक स्थिति - Post-Gupta period (North India): Economic condition
आर्थिक जीवन
व्यापार
गुप्तोत्तरयुगीन आर्थिक व्यवस्था उच्चकोटि की थी। व्यापार करने वाले व्यवहारक कहलाते थे। इस काल में सामान्यतः तीन प्रकार के व्यापारी होते थे। प्रास्तारिक सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि खनिज पदार्थों के व्यापारी; सांस्थानिक- गाय, घोड़ा, हाथी, ऊँट, आदि पशुओं के व्यापारी; तथा बाँस, चमड़ा व लाख के व्यापारी व्यापारी वर्ग का एक संघ होता था जिसे श्रेणी कहते थे।
एक जैसी वस्तुओं का व्यापार करने वाले व्यापारी एक विशिष्ट पूर्व निर्धारित स्थान में एकत्र होकर वस्तुओं का क्रय विक्रय करते थे। ये श्रेणियाँ संपूर्ण भारत में विस्तीर्ण थीं या इनका स्थानीय स्वरूप था इस विषयक पर्याप्त साक्ष्य नहीं है परंतु अभिलेखिक साक्ष्यों में इनके स्थानीय स्वरूप का वर्णन मिलता है।
प्राचीन वर्ण व्यवस्था व्यापार का आधार था परंतु इस समय तक रूढ़ि में शिथिलता आ गई थी और व्यक्ति अपनी रूचि और सुविधानुसार व्यवसाय अपनाने को स्वतंत्र था। कई ब्राह्मण, क्षत्रिय कृषि करने लगे थे एवं कई वैश्य सेना में सैनिक हो गए थे परंतु इसके उदाहरण कम मिलते हैं।
श्रेणी एवं संघ
यद्यपि श्रेणियों की उत्पत्ति पूर्व कालिक है परंतु इस काल में हमें उनका परिष्कृत रूप देखने को मिलता है। 933 वि.सं. के वल्लभट्टस्वामिन् के ग्वालियर अभिलेख में स्थानीय तैलिक संघ द्वारा एक देवालय को दीप प्रज्वलित करने के लिए तेल देने का, माला-संघ द्वारा पंद्रह पुष्पहार प्रतिदिन विशिष्ट देवालय को देने का उल्लेख है। कामन अभिलेख में कुंभकारों तथा शिल्पियों के संघ का उल्लेख है। ये श्रेणियाँ बैंकर का कार्य भी करती थीं। इन श्रेणियों का कार्य एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी को हस्तांतरित होता रहता था। इनका समाज पर इतना अधिक प्रभाव था कि राजा किसी व्यवसाय पर कर लगाने के लिए संबंधित श्रेणी के सदस्यों से सलाह लेता था। श्रेणियों के कार्यों के लिए इनके सदस्य सामूहिक रूप से उत्तरदायी होते थे।
अनेक गुप्तोत्तर अभिलेखों में व्यापारियों के संघ व व्यवसायों का उल्लेख किया गया है। व्यापारियों के संघ को 'व्यवहारिक' व व्यापारी को श्रेष्ठिन' कहा जाता था। पहेवा अभिलेख में 'घाटका' (घोड़ों का व्यापारी) व 'सार्थवाह' का नाम मिलता है। सियादोनी अभिलेख में सुरा निर्माताओं को 'कल्लपाल' कहा गया है, इनका प्रमुख अधिकारी कल्लपाल महत्तक' कहलाता था। 'कन्दुक' शब्द इस अभिलेख में भड़भूजे के लिए प्रयुक्त किया गया है, इसी अभिलेख में तम्बोली का वर्णन है, इनका प्रमुख तम्बोली महार' कहलाता था। इस संदर्भ में केशव तम्बोली का नाम उल्लेखनीय है, यह बटेश्वर तम्बोली का पुत्र था। इसकी पान की दुकान हाट के मध्य थी। इस तथ्य की पुष्टि अन्य अभिलेखों से भी होती है।
तेल मिल 'घृणिका' और तेल बनाने वाले तैलिक कहलाते थे।
इनका प्रमुख तैलिक महत्तक' कहलाता था। ग्वालियर और सियादोनी अभिलेखों में इस व्यवसाय का विस्तृत वर्णन किया गया है। गंधिकों का व्यवसाय अत्यधिक प्राचीन है। ये सुगंधित तेल तथा सौंदर्य प्रसाधनों का क्रय विक्रय करते थे। अहार अभिलेख में देवंग के पुत्र माधव का उल्लेख है जो माथुर जाति का इत्र बेचने वाला था।
शिल्प कार्य तत्कालीन समाज का एक प्रमुख व्यवसाय था। कामन अभिलेख में स्थापित और कुंभकार शिल्पियों के नाम मिलते हैं। सियादोनी अभिलेख में शिल्पियों की सूची वर्णित है।
जिसमें कुंभकर, ताम्रकार, प्रस्तरकर्तनकर, बढ़ई, सुनार, जौहरी, लुहार आदि नाम मिलते हैं। मनोरंजन करने वालों का व्यवसाय भी सुव्यवस्थित था। राजशेखर ने नट, नर्तक, गाने बजाने वाले, जादूगर आदि का उल्लेख किया है। अरब यात्री अलमसूदी ने एक जाति लहुद का वर्णन किया है। इस जाति के पुरूष तथा स्त्रियाँ मनोरंजन का कार्य करते थे।
कृषि
गुप्तोत्तर काल में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य सभी कृषि कार्यों में संलग्न थे। कामन अभिलेख में साहुल्ल, जज्ज और अन्य ब्राह्मणों को भूमि जोतते हुए बताया गया है।
ग्वालियर अभिलेख में क्षत्रिय देववर्मन के पुत्र मेमाक को कृषक कहा गया है। यह कहा जा सकता है कि जातियाँ स्वयं भूमि नहीं जोतती थीं वरन् मजदूरों से कृषि कराती थीं। जैन धर्म के प्रभाव के कारण अनेक वैश्यों ने कृषि तथा पशुपालन का कार्य बंद कर दिया था क्योंकि इसमें जीवहिंसा की अधिक संभावना रहती थी। अभिलेखों में भूमियों के प्रकार बताए गए हैं। कृषि योग्य भूमि वहानिक कहलाती थी। ऊसर तथा चारागाह की भूमि का उल्लेख भी किया गया है। वस्तुओं का क्रय-विक्रय विनियम तथा मुद्राओं के माध्यम से होता था। आदि वराह, ट्रम्म, पाद, रूपक, पण, काकिणी तथा कार्पदक नाम की मुद्राएँ प्रचलित थीं।
अभिलेखिक साक्ष्यों में वस्तु के क्रय-विक्रय स्थान को 'हट्ट' कहा गया है।
कामन अभिलेख में पशुओं के बाजार के लिए 'कम्बली हट्ट' शब्द का प्रयोग किया गया है। दुकानों को 'अवरी' कहा जाता था। नियमित अवरी प्रायः आवास से संलग्न रहती थी यातायात के लिए बैलगाड़ी, घोड़ों, ऊँटों, गधों तथा समुद्री जहाज का प्रयोग किया जाता था। बड़ी-बड़ी मंडियों को पेष्ठास्थानक' कहा जाता था।
कान्यकुब्ज, गोर्तिया, भोजपुर पृथूडक तथा श्रावस्ती प्रतीहार साम्राज्य के प्रमुख व्यापारिक स्थान थे। व्यापारी संपूर्णदेश में व्यापारार्थ आते-जाते थे। समुद्र पार से भी व्यापार होता था।
वैदेशिक व्यापार
ऐसा प्रतीत होता है कि गुप्तोत्तर शासकों की रूचि विदेशियों से संबंध स्थापित करने में नहीं थी । सुलेमान कहता है कि जुर्ज का शासक अरबों से मैत्री भाव नहीं रखता है, भारत में इस्लाम का उससे बड़ा कोई दूसरा शत्रु नहीं है। उपरोक्त कथन से सिद्ध होता है कि भारतीय समाज और राजा विदेशों से विशेषकर अरबों से संबंध स्थापित करने में रूचि नहीं रखते थे परंतु साहित्य में भारत के वैदेशिक संबंधों के प्रमाण उपलब्ध हैं। डॉ. लल्लनजी गोपाल का मत है कि भारत का चीन, ईरान, अरब देशों तथा एशिया माइनर के देशों से व्यापार संबंध था। इन देशों से व्यापार स्थल मार्ग से होता था। इस्लाम के उदय ने भारत का संपर्क यूरोप से तोड़ दिया।
इसका कारण बताते हुएडॉ. गोपाल लिखते हैं कि मुसलमानों ने अपने क्षेत्र से व्यापारियों का आना-जाना कठिन बना दिया, इससे यूरोपीय संपर्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा। सामुद्रिक व्यापार की अवनति हो गई थी. डॉ. ए. एल. बाशम का मत है कि इस समय तक भारतीयों की नौका निर्माण तकनीक का हास होना प्रारंभ हो गया था। डॉ. गोपाल भी बाशम का समर्थन करते हुए कहते हैं कि भारतीय नौकाएँ चीनी और अरबी नौकाओं से बहुत पीछे थीं परंतु डॉ. पुरी का कथन है कि भारत का संपर्क अरब देशों, लंका व दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देशों से था।
उपरोक्त वर्णन से स्पष्ट है कि गुप्तोत्तर कालीन आर्थिक दशा का आधार कृषि, व्यापार और उद्योग थे। कृषि की दशा उन्नत थी तथा अत्यंत विकसित देशी व विदेशी व्यापार के कारण भारत आर्थिक दृष्टि से संपन्न था।
गुप्तोत्तर काल (उत्तर भारत) : सांस्कृतिक विकास
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