गुप्तोत्तरकाल (उत्तर भारत) : सामाजिक स्थिति - Post-Gupta Period (North India): Social Status
गुप्तोत्तरकाल (उत्तर भारत) : सामाजिक स्थिति - Post-Gupta Period (North India): Social Status
सामाजिक स्थिति
वर्ण व्यवस्था
सातवीं शताब्दी के पञ्चात् भारतीय समाज में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए। अनेक प्राचीन व्यवस्थाएँ समाप्त हो गई और उनके स्थान पर नई व्यवस्थाओं ने जन्म लिया परंतु समाज के मूलाधार, वर्णाश्रम व्यवस्था में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। गुप्तोत्तर काल में समाज का मूल आधार वर्ण व्यवस्था बनी रही। तत्कालीन समाज ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र चार वर्गों में विभाजित था।
वर्ण व्यवस्था में ब्राह्मणों का स्थान सर्वोच्च था। अलमसूदी तथा अलबरूनी के कथन से भी इस तथ्य की पुष्टि होती है। इनका प्रमुख कार्य अध्ययन व अध्यापन, यज्ञ करना, पूजा करना तथा बलि देना था।
कुछ ब्राह्मणों ने अन्य व्यवसाय भी अपना लिए थे क्योंकि वर्णाश्रम व्यवस्था में शिथिलता आने लगी थी। कुछ ब्राह्मण राज्य में उच्च पदाधिकारी थे तो कुछ ने व्यापार करना प्रारंभ कर दिया था। यों तो ब्राह्मण अन्य कोई भी व्यवसाय अपना सकता था परंतु यह समाज में अच्छा नहीं समझा जाता था। वल्लभट्टस्वामिन के ग्वालियर अभिलेख में ग्वालियर दुर्ग के कोट्टपाल अल्ल को ब्राह्मण जाति का बताया गया है। अबू जैद का भी कथन है कि धार्मिक कार्य में रत व्यक्ति ब्राह्मण कहलाते थे तथा ये दरबार में कवि, ज्योतिषी, दार्शनिक आदि का कार्य भी करते थे। ब्राह्मणों के पश्चात् समाज में दूसरा वर्ग क्षत्रियों का था इनका युद्ध और शासन का कार्य करना था। वैश्यों का समाज में तीसरा स्थान था। यह जाति संपूर्ण भारत में निवास करती थी। इनका कार्य कृषि व व्यापार करना था।
वर्ण व्यवस्था में शूद्रों का स्थान निम्न था। इनका कार्य उपरोक्त सभी वर्णों के व्यक्तियों की सेवा करना था। इन्हें धार्मिक कार्य तथा पूजा उपासना की अनुमति नहीं थी परंतु मेघातिथी के मतानुसार शूद्र यजनयाजन और बलि जैसे प्रकरण, श्राद्ध, अष्टका और वाषवदेव आदि धार्मिक कार्य कर सकते थे। शूद्रों में ऊँच नीच की भावना थी। जो जातियाँ अधिक गंदे कार्य करती थीं वे अंत्यज कहलाती थीं इसके अंतर्गत धोबी, मोची, जुलाहे, नट, टोकरी बनाने वाले, कुंजड़े, मछली मारने वाले और शिकारी आते थे।
ये नगर ग्राम या कस्बे के बाहरी भाग में रहते थे। इनका स्पर्श वर्जित था तथा असावधानीवश स्पर्श होने पर शुद्धि के लिए स्नान तथा प्रायश्चित करना होता था।
जातिप्रथा
उपरोक्त के अतिरिक्त अलबरूनी अपने वर्णन में हादी, डोम, चांडाल और वधाताऊ जातियों का उल्लेख करता है। ये जातियाँ किसी वर्ग के अंतर्गत नहीं आती थीं। इनका कार्य नगर, कस्बे तथा ग्राम की सफाई करना था। ये चारों वर्णों की अवैध संतान कहलाते थे।
प्रतीहार काल में कायस्थ जाति का वर्णन मिलता है। कायस्थों का संबंध शासन से अधिक था। वे न्यायाधीश, महकमों के अध्यक्ष तथा लेखा-जोखा का कार्य करते थे। मुस्लिम इतिहासकार इब्नखुर्दबदा के अनुसार भारतीय समाज सात भागों में विभक्त था सवकुप्रया इसमें सर्वोच्च जाति के - लोग रहते थे। राजा का चुनाव इसी वर्ग से होता था।
शेष छह वर्गों के व्यक्ति इनका सम्मान करते थे। दूसरे वर्ग के अंतर्गत ब्राह्मण आते थे। ये सुरा तथा सभी व्यसनों से दू रहते थे। तीसरा वर्ग कटारिया संभवतः क्षत्रिय जाति का था। ये तीन प्याले से अधिक सुरा का पान नहीं कर सकते थे। चैथा वर्ग सुदरियों का था। ये व्यवसाय करते थे। संभवतः इब्नखुर्दबदा ने वैश्यों को सुदरिया कहा है। पाँचवाँ तथा छठवाँ व बसुरिया तथा संडलिया का था बसुरिया बाँस से विभिन्न वस्तुओं का निर्माण करते थे तथा संडलिया का कार्य चांडालों के समान था। सातवाँ वर्ग लाहुद जाति का था इस जाति की स्त्रियाँ अपने को सजाने संवारने में व्यस्त रहती थीं तथा पुरुष विभिन्न खेलों तथा तमाशों के प्रदर्शन का कार्य करते थे।
उपरोक्त वर्णित वर्णों की सामाजिक स्थिति में भिन्नता थी।
अलबरूनी का कथन है कि इन वर्णों में आपस में सामान्यतः खान-पान नहीं होता था। शूद्र तथा उससे निम्न जाति वालों के यहाँ उच्च वर्ग के व्यक्ति पानी भी नहीं पीते थे। हिंदूमुस्लिम संबंधों पर प्रकाश डालते हुए वह कहता है किहिंदू म्लेच्छों के यहाँ अन्न जल ग्रहण करते थे। यदि किसी हिंदू दास को म्लेच्छ अपने देश ले जाते थे तो वहाँ से लौटने पर शुद्धीकरण के पश्चात् समाज उसे पुनः अपना लेता था। इस समय जबकि बलात् हिंदुओं को मुसलमान बनाया जाता था शुद्धीकरण की यह प्रक्रिया सत्य प्रतीत होती है। दास प्रथा का प्रचलन था। राजशेखर और अलबरूनी दोनों दासों का वर्णन करते हैं। राज महल की दासियों की दशा अच्छी थी, वे राजकुमारियों की सखियों की भाँति रहती थीं। चँवर डुलाने वाली, तलवार लिए केश सँवारने वाली, बाण लिए, पानदान उठाने वाली, माला लिए, स्नान कराने वाली, ढाल, तलवार लिए तथा कविता करने वाली स्त्रियों का वर्णन मिलता है। इससे स्पष्ट है कि स्त्रियाँ सेवा तथा रक्षा दोनों कार्य करती थीं।
विवाह
समाज में संयुक्त परिवार प्रथा प्रचलित थी। अंतर्जातीय विवाह संबंधों में कठोरता न थी । समाज में अनुमोल विवाह प्रचलित थे। इब्नखुर्दबदा व अलबरूनी का कथन है कि व्यक्ति अपने वर्ण तथा अपने वर्ण से एक नीचे वर्ण से विवाह संबंध कर सकता था उसके इस कथन की सत्यता प्रतीहार वंश के संस्थापक हरिचंद्र के क्षत्रिय कन्या भद्रा के साथ हुए विवाह से पुष्ट होती है। राजशेखर की कर्पूरमंजरी में भी उल्लेख है कि ब्राह्मण राजशेखर का विवाह क्षत्रिय कन्या अवंति सुंदरी के साथ हुआ था परंतु समाज में इन विवाहों को हेय दृष्टि से देखा जाता था। प्रतिलोम विवाह का समाज में प्रचलन न था। अलबरूनी कहता है कि व्यक्ति को अपने से उच्च वर्ण की कन्या से विवाह का निषेध था। इब्नखुर्दबदा भी इस कथन की पुष्टि करता है। माता-पिता के गोत्र में विवाह वर्जित था। समाज में बाल विवाह प्रथा प्रचलित थी।
बहुविवाह प्रथा का भी समाज में प्रचलन था। अलबरूनी का कथन है कि एक व्यक्ति चार विवाह कर सकता था। समाज के उच्च वर्ग में यह अधिक प्रचलित था।
विवाह विच्छेद तत्कालीन हिंदू समाज में संभव न था, पति-पत्नी मृत्यु द्वारा ही एक दूसरे से अलग हो सकते थे। विधवा विवाह का समाज में प्रचलन न था। नियोग प्रथा को समाज में सम्मान की दृष्टि से नहीं देखा जाता था। सती होना समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। अलबरूनी का कथन है कि मृत राजा के शव के साथ उसकी सभी पत्नियाँ अग्नि में प्रवेश करती थीं। इस काल में सती प्रथा में रूढ़ता आ गई थी।
स्त्रियों की दशा
कन्या की अपेक्षा पुत्र जन्म को अधिक महत्व दिया जाता था। 'विद्धशालभंजिका में वर्णन है कि लाट देश के राजा चंद्रवर्मा ने अपनी पुत्री मृगां कवली को मृगांकवर्मा के नाम से प्रसिद्ध किया क्योंकि उससे कोई पुत्र न था तथा पुत्री ही राज्य की उत्तराधिकारी थी। परिवार में इनकी उच्च स्थिति का परिचय प्रतीहार अभिलेखों में मिलता है। अहार अभिलेख में भट्टनी महादेव का परिचय उसकी स्थिति का परिचय देता है। राज्य और प्रशासन चलाने में प्रतीहार रानी महादेवी सहायता देती थी। उसे अग्रहार दान देने का पूरा अधिकार था। अल्पवयस्क राजा की संरक्षिका के रूप में वह प्रशासन संभालती थी।
स्त्रियों को शिक्षा अर्जन का पूर्ण अधिकार था। राजशेखर की पत्नी अवंति सुंदरी एक प्रसिद्ध कवियित्री थी। मारूला, मोरिका तथा सुभद्रा इस काल की प्रमुख विदुशी महिलाएँ थी।
शिक्षा के अतिरिक्त ललितकालाओं का भी स्त्रियों को ज्ञान कराया जाता था परंतु सामान्यतः स्त्रियों में शिक्षा का प्रसार अल्प था। समस्त समाज में लगभग 10 प्रतिशत स्त्रियाँ ही शिक्षित थीं। स्त्रियाँ शास्त्रों में भी रूचि रखती थीं। देवदासी और वैश्यावृत्ति का भी समाज में प्रचलन था। इन के विकास में राजा और धनी व्यक्तियों का प्रमुख हाथ था।
पर्दाप्रथा
समाज में पर्दा प्रथा प्रचलित थी। परंतु उसके नियम कठोर नहीं थे। अबूज़ैद का कथन है कि तत्कालीन अधिकांश राजा रानियाँ सहित राज दरबार में आते थे। मेलों और धार्मिक उत्सवों में स्त्रियाँ भाग लेती थीं। समाज में स्त्रियों का सम्मान था।
वस्त्र तथा आभूषण
स्त्रियाँ और पुरूष दोनों धोती पहनते थे, उसे कमर में लपेटकर शेष भाग को स्कंध पर डाल देते थे। ऊपर पहनने का वस्त्र उत्तरीय था जिसे स्त्री-पुरूष दोनों पहनते थे। स्त्री समाज अलंकरण और प्रसाधन में रूचि रखती थी। अनेक प्रकार की केश विन्यास प्रणालियाँ प्रचलित थीं। वे गंधतेल, चंदन, कज्जल, सुरमा, मिस्सी आदि सौंदर्य प्रसाधनों का प्रयोग करती थीं। उनके प्रमुख आभूषण वलय, मुक्ताहार, कुण्डल, कांची, नूपुर आदि थे। नीवी, चोलक, दुकूल आदि परिधान स्त्रियों द्वारा धारण किए जाते थे। परिधान नील, लोहित, आदि रंगों के होते थे। धनिक वर्ग में चीनांशुक का प्रयोग होता था। रेशमी वस्त्र के विषय में सुलेमान लिखता है कि वह मुद्रिका के मध्य से निकल जाता था। पुरूषों के वस्त्र अधिकतर श्वेत होते थे। बौद्ध भिक्षु भिक्षुणियाँ गेरूए चीवर धारण करती थीं। जैन सन्यासी पीत तथा हिंदू सन्यासी काषाय वस्त्र धारण करते थे। अलबरूनी का मत है कि पुरूष चर्म-उपानह धारण करते थे परंतु स्त्री समाज में इनका उपयोग नहीं होता था।
साहित्य
राजशेखर के ग्रंथों में मसिपिंड, अष्टादश लिपि, केतलीदल लेख पाठ इत्यादि शब्द मिलते हैं जिनसे ज्ञात होता है कि शिक्षा की समुचित व्यवस्था थी। राजशेखर ने 'कर्पूरमंजरी' में विद्यार्थियों के तीन वर्गों का वर्णन किया है, सहजा (जो एक बार सुनकर याद कर ले), आहार्यबुद्धि (जो अभ्यास से याद करे) और औपदेशिका (जो उपदेश से भी शिक्षा ग्रहण न कर सके। परंपरागत चौदह विषयों के अतिरिक्त वार्ता ( कृषि और वाणिज्य), दंडनीति, कामशास्त्र, शिल्पशास्त्र, और साहित्य विद्या की शिक्षा दी जाती थी। नालंदा विक्रमशिला, वलभी, कांपिल्यू पाटलिपुत्र, अवति निमाल, कन्नौज आदि उच्च शिक्षा के केंद्र थे। इन केंद्रों में समय-समय पर ब्रह्म सभाएँ होती थीं जो काव्य शास्त्र की परीक्षा लेती थीं।
गुप्तोत्तर नरेश विद्वानों के आश्रयदाता थे। प्रसिद्ध विद्वान राजशेखर इस युग की साहित्यिक विभूति थे, जिन्होंने कर्पूरमंजरी विद्धशालभंजिका, काव्यमीमांसा, बाल-भरत आदि ग्रंथों की रचना की।
खान-पान
मदिरा पान का समाज में प्रचार था। राजशेखर ने राजा, सन्यासी और साधारण प्रजा तीनों में मदिरा पान का प्रचलन बताया है। राजशेखर की साहित्यिक कृतियों में मदिरापान का इतना वर्णन है कि तत्कालीन समाज में इसकी लोकप्रियता प्रमाणित हो जाती है। अलमसूदी और राजशेखर का कथन है कि स्त्रियाँ भी सुरापान करती थीं।
ब्राह्मण समाज में मांस भक्षण निषिद्ध था परंतु इस विषय में मुस्लिम इतिहासकारों के वर्णन में विरोधाभास है। अलमसूदी का कथन है कि ब्राह्मण किसी भी जानवर का मांस नहीं खाते थे किंतु अलबरूनी का कथन है कि वे गैंडे का मांस खा सकते थे। सामान्यतः भेड़, बकरी, खरगोश, भैंस, मछली, मुर्गा, बदक, मोर आदि जानवरों का मांस खाया जाता था। पशुओं में घोड़ा, गाय, खच्चर, गधे, ऊँट, तथा हाथी का मांस भक्षण वर्जित था। इनकी स्वतः मृत्यु हो जाने पर शुद्ध इनका मांस भक्षण कर सकते थे। ब्राह्मणों के लिए लहसुन, प्याज, गाजर,
एक प्रकार की लौकी तथा पानी में उगने वाली कमल ककड़ी का सेवन वर्जित था। वे गाय तथा भैंस के दूध के अतिरिक्त अन्य जानवरों के दूध का भक्षण नहीं करते थे। सामान्यतः भोजन में अनाज, घी, दूध तथा शक्कर का समावेश रहता था। अलबरूनी कहता है कि ब्राह्मण एक-एक करके भोजन करते थे तथा भोजन के पूर्व तथा पश्चात् उस स्थान को गाय के गोबर से लीपते थे।
गुप्तोत्तर कालीन सामाजिक जीवन सादा था। कर्पूरमंजरी में कहा गया है कि हिंदू परस्पर मिलने पर अभिवादन करते थे।
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