गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : सांस्कृतिक विकास - Post-Gupta Period (South India): Cultural Development

गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : सांस्कृतिक विकास - Post-Gupta Period (South India): Cultural Development


तथा सांस्कृतिक संस्थाओं का चित्रण समीक्षात्मक पद्धति पर किया गया है, जिससे वे अधिक से अधिक बोधगम्य बन सकें।


चालुक्य काल 


चालुक्य काल में लोगों के स्वभाव में सौम्य और उग्रभाव का अपूर्व समन्वय था। युद्ध और अपकार की स्थिति में उनमें जो क्रूरता और उग्रता थी वह सामान्य स्थिति में नहीं देखने को मिलती थी। सामान्य लोग, मुख्यतया खेतिहर किसान शांतिप्रिय थे। उनमें धर्म के प्रति रूचि थी और धार्मिक समन्वय उनका स्वभाव था। वातापी के चालुक्य नृप भी धार्मिक दृष्टि से सद्भाव और समन्वय को मान्यता देते थे। वैदिक और पौराणिक धर्म के अतिरिक्त बौद्ध और जैन धर्म भी फलफूल रहे थे।

हुआन सांग के विवरण से ही ज्ञात होता है कि महाराष्ट्र में नासिक के आसपास पाँच अशोककालीन स्तूप थे और शताधिक बौद्ध मठ थे जिनमें सहस्रों भिक्षु साधना करते थे। उन्हीं के आसपास 'देवोपासक' भस्म रमाते थे। अजंता के बिहार भी आबाद थे। चालुक्य नृप अधिकांशतः शैव और विष्णु के उपासक थे। उनके द्वारा बादामी, पट्टदिकल, अयहोलि आदि में अनेक मंदिरों का निर्माण हुआ। यद्यपि किसी नृप ने जैनधर्म अंगीकृत नहीं किया, किंतु उनकी सद्भावना जैनधर्म के प्रति थी। पुलकेशिन द्वितीय की जैनधर्म के प्रति उदार दृष्टि थी- जिसका उल्लेख रविकीर्ति ने अपने लेख में जैन मंदिर के निर्माण के प्रसंग में किया है। जैनधर्म के प्रति चालुक्य कुल की अनेक रानियों की आस्था थी जिनके द्वारा जैन मंदिर भी निर्मित हुए। कुटकुमादेवी,

और कलियम्मा के द्वारा जैन मंदिरों का निर्माण हुआ। वैदिक धर्म और यज्ञों के प्रति भी चालुक्य नृपों की बड़ी रूचि थी। अयहोलि अभिलेख में ही उल्लेख है कि पुलकेशिन् प्रथम्, कीर्तिवर्मन प्रथम, मंडलेश और पुलकेशिन् द्वितीय द्वारा संपादित अश्वमेध श्रोतादि यज्ञों का उल्लेख मिलता है। इनमें से अनेक के द्वारा ब्राह्मण, माहेश्वर, परमवैष्णव आदि उपाधियाँ धारण की गई। विशेष अवसरों पर यथा, ग्रहण आदि पर उनके द्वारा व्रत दान आदि संपन्न होते थे। कीर्तिवर्मन द्वितीय द्वारा कन्ची के ब्राह्मणों के प्रति उदारता और शत्रु देश के मंदिरों के प्रति सद्भाव और दानवृत्ति एक राजोचित किंतु दुर्लभ उदाहरण है। 


शिक्षा और साहित्य


हुआन सांग ने लिखा है कि लोगों की विद्या से स्वाभाविक रूचि थी। अभिलेखीय प्रसंगों में युवराजों की शिक्षा आदि के प्रसंगों से ज्ञात होता है कि युवराजों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दिया जाता था।

पुलकेशिन् प्रथम को अध्ययन काल में मनु के धर्मशास्त्र, पुराण और रामायण की शिक्षा दी गई थी। मंगलेश को विभिन्न शास्त्रों का ज्ञान कराया गया था। वातापी नगर विद्या और कला का केंद्र था जहाँ सहस्रों द्विज ‘चौदह शास्त्रों' का अध्ययन करते थे। इनमें चार वेद, छह वेदांग, पुराण, मीमांसा, न्याय, धर्मशास्त्र आदि शामिल थे। कुछ अभिलेखों में 'श्री महाचतुर्विद्या का उल्लेख आया है जो अन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दंडनीय समझा जा सकता है। बोलचाल की भाषा कन्नड़ थी, जो प्राकृत भाषा कहलाती थी। अभिलेखों में उच्चकोटि की संस्कृत देखने को मिलती है। संभ्रांत वर्ग की भाषा संस्कृत थी । अयहोलि अभिलेख जहाँ इस युग के संस्कृत काव्य का प्रतिनिधित्व करता है

(जिसके कर्ता रविकृति ने अपनी तुलना कालिदास और भारवि से की है, वहाँ महाकूट अभिलेख अपने युग के प्रवाहपूर्ण संस्कृत गद्य का समकालीन गंगराज दुर्विनीत संस्कृत और कन्नड दोनों ही भाषाओं का प्रकांड विद्वान और कवि था । इसके द्वारा रचित 'शब्दावतार संस्कृत भाषा का अद्भुत व्याकरण ग्रंथ है। इसने भारवि के 'किरातार्जुनीयम्' के पंद्रहवें सर्ग की टीका लिखी है। वृहत्कथा सबसे प्राचीन संस्कृत रूपांतरण का भी यही कर्ता माना जाता है। चन्द्रादित्य की रानी विजयभट्टारिका की पहचान सुप्रसिद्ध संस्कृत कवयित्री विजयांका अथवा विज्जिका से की गई है जो राजशेखर के अनुसार वैदर्भी रीति में रचना में बड़ी पटु थी ।


अचलद के भारतनाट्य की टीका पर कुछ ही छंद पाए गए हैं, किंतु उनका बहुत बड़ा ऐतिहासिक महत्व माना गया है। 'जनेंद्र व्याकरण' नामक संस्कृत व्याकरण का ग्रंथ भी विक्रमादित्य के समय में लिखा गया। सोमदेवसूरि को, जोकि यशस्तिलक चम्पू और नीति वाक्यामृत' का कर्ता माना जाता है, चालुक्य संरक्षण प्राप्त था। दुर्विनीत कन्नड़ गद्य का प्रसिद्ध लेखक था। श्रीवर्धदेव अथवा तुम्बुलुचार्य ने 'तत्वार्थ 'महाशास्त्र' पर 'चूड़ामणि' नामक विस्तृत टीका लिखी है। श्यामकुण्डाचार्य भी इसी का समकालीन था और प्राकृत, संस्कृत तथा कन्नड़ भाषा का कवि था। पंप का 'आदिपुराण' 'विक्रमार्जुन विजय, पंपभारत' चालुक्य शासन के अंतिम वर्षों में लिखे गए ग्रंथ हैं। कन्नड़ कवियों में पंप का सर्वाधिक सम्मान है।


कला एवं स्थापत्य कला


चालुक्य संरक्षण में बिहार और मंदिरों का निर्माण हुआ। इनके संरक्षण में स्थापितों ने कई अभिनव प्रयोग किए बिहार शैली पर प्रकृत शैल- उत्कीर्णित गुफा संरचनात्मक मंडपों का भी निर्माण हुआ और पत्थरों को जोड़कर मंदिर वास्तु की भी परंपरा चली। शैली की दृष्टि से नागर और द्रविड़ दोनों ही शैलियों के तथ्यों के आधार पर अलग-अलग मंदिर भी बने और एक नई शैली, बेसर शैली के अंतर्गत भी मंदिर निर्मित हुए। प्रभाव की दृष्टि से आरंभ में गुप्तवास्तु और मूर्तिशिल्प अयहोलि, बादामी और पट्टदिकल के वास्तु और मूर्तिशिल्प का अनुप्रेरक है, किंतु कालांतर में जब पल्लवों का राजनीतिक प्रभाव या संपर्क चालुक्यों से हुआ तो पल्लव मूर्तिशैली (मामल्ल शैली) का प्रभाव वादामी के मूर्ति की कला विशेष रूप से परिलक्षित हुआ। विरूपाक्ष मंदिर पर यह प्रभाव सर्वाधिक है।

एक तरह से यह कहना उचित है कि ज्यों-ज्यों चालुक्य कला पर गुप्त कला शैली का प्रभाव क्रमागत रूप से घटता गया, उसके स्थान पर उत्तरोत्तर रूप से द्रविड़ (पल्लव) शैली का प्रभाव बढ़ता गया।


चालुक्यों के संरक्षण में अयहोलि वस्तुतः एक मंदिरों के नगर के रूप में विकसित हुआ जहाँ पाँचवीं और सातवीं शती के बीच लगभग सत्तर मंदिरों का निर्माण हुआ। यहाँ का गौहर मंदिर जिसका निर्माण 425-450 ई. के बीच हुआ, सबसे प्राचीन रचना है। इसके बाद लाइखाँ मंदिर की रचना की गई। आरंभिक रचना शैली में मंदिर वास्तु मात्र स्तंभों पर आधारित 'मंडप' मात्र था, जिस पर एक सपाट छत हुआ करती थी। लाडखाँ मंदिर एक ऊँचे और चतुस्र अधिष्ठान पर स्थित है जिस पर उसका स्तंभीय मंडप बना है।

मुख्यतया इसकी ढुलाई छत चार बड़े और भारी स्तंभों पर टिकी है जिसके बाहरी ओर पुनः 12 और 20 अर्धस्तंभों की शृंखला बनी है ऊपरी छत का ढालुआं निचला भाग इन्हीं स्तंभों पर टिका है। इन दो शृंखलाओं के स्तंभ एक प्रदक्षिणापथ जैसा बनाते हैं। बाहरी स्तंभ-शृंखलाओं का अंतराल भारी अलंकृत जालीदार पत्थरों से तीन तरफ से बंद है। केवल पूर्व की ओर वह जाली नहीं है। यह समूचा भाग मंडप' का निर्माण करता है, जिसमें एक विशाल नंदी बना हुआ है। इस मंडप के पूर्व में स्तंभीय मुखमंडल है। मंडप के पीछे की ओर की भित्तिका पर जालीकर्म नहीं है। इस भाग में भीतर की तरफ एक वर्गाकार प्रकोष्ठ बनाकर उसे गर्भगृह का रूप दिया गया है,

जिसमें मुख्य प्रतिमा पधरायी गई है, और गर्भगृह सहित मंडप और मुखमंडप एक ही छत से आच्छादित हैं जिसकी रचना 'द्विछाद्य प्रकार की है। "मंडप' के मध्यभाग के ऊपर एक ओर कोष्ठ है, जो नचनाकठारा (गुप्तकालीन मंदिर) की तरह इस मंदिर को द्वितल प्रकार का सिद्ध करता है। इसमें सूर्य की प्रतिमा पधरायी गई है। इसके ऊपर शिखर का निर्माण नहीं हुआ था। इस प्रकार इस मंदिर की योजना एक 'बिहार' रचना प्रकार से काफी मिलती-जुलती है। मुखमंडप के दोनों ओर गंगा और यमुना की बड़ी सुंदर प्रतिमाएँ बनी हैं। मंडप केदोहरी शृंखलाबद्ध स्तंभ, जिसकी रचना में पीठोपधान स्तंभशीर्षक विधा का उपयोग किया गया है, वस्तुतः ये द्रविड़ प्रभाव की ओर संकेत करते हैं। मंदिर की बाहरी भित्तिका 20 फीट ऊँची है। छत के निर्माण में बारीक तराशी और उचित अनुपात - इसके शिल्पियों की तकनीकी कुशलता के परिचायक हैं।


चालुक्यों की राजनगरी वातापी या वादामी भी चालुक्य वास्तु का केंद्र रहा है। यहाँ पर स्थित चार मंदिरों में तीन ब्राह्मणधर्म से संबंधित हैं और एक जैन। अयहोलि मंदिर के वास्तुविधान की तुलना में यहाँ का वास्तु विधान भिन्न है और वे प्रकृत शैल को उत्कीर्णित करके बनाए गए हैं। किंतु वास्तु-तत्वों का संयोजन बहुत कुछ अयहोलि प्रकार का ही है। यहाँ के चारों मंदिर के वैष्णव मंदिर (गुफा - 3) सबसे प्रचीन (578 ई.) है। जैन मंदिर सबसे बाद का है। इन मंदिरों के प्रमुख वास्तु तत्व स्तमीय मंडप, जिसके बाहरी तरफ बरामदा और मंडप के सबसे पीछे एक गर्भगृह है। गुफा -3 में अनंतनाग पर आसीन विष्णु (जैसा कि देवगढ़ में देखने को मिलता है) तथा नरसिंह का अंकन बड़ा भव्य और शिल्पात्मकता की दृष्टि से उत्कृष्ट है। वादामी के मंदिर का बाहरी भाग सादा, किंतु अभ्यंतर का भाग सुरूचिपूर्ण अलंकरण से सज्जित है।


इन गुफा मंदिरों के अतिरिक्त बादामी में कुछ चालुक्यकालीन वास्तु मंदिर भी है, जो कि दाक्षिणात्य प्रभाव को अपेक्षाकृत अधिक परिलक्षित करते हैं। परवर्ती अयहोलि शैली की परंपरा में एक विष्णु मंदिर संभवत् विक्रमादित्य प्रथम के समय में निर्मित हुआ। कुछ दशक के बाद पुनः इस मंदिर का विस्तार किया गया और इसे शैव मंदिर के रूप में विकसित किया गया। इसे आजकल पापनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है। मूल मंदिर के विमान को अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत किया गया। 725 ई. के आसपास विजयेश्वर के नाम से एक अन्य मंदिर का निर्माण यहाँ विजयादित्य के समय में हुआ। आजकल इसे संगमेश्वर मंदिर कहते हैं। विक्रमादित्य की रानी लोकमहादेवी और त्रैलोक्यमहादेवी ने 740 ई. और 746 ई. के बीच में दो बड़े मंदिरों का निर्माण कराया।

प्रथम विरूपाक्ष और दूसरा मल्लिकार्जुन मंदिर के नाम से जाना जाता है। इन मंदिरों की निर्माण विधा में क्रमागत रूप से गुप्त चालुक्य शैली का प्रभाव कम होता गया और पल्लव मामल्ल शैली का प्रभाव बढ़ता गया। पापनाथ मंदिर में अयहोलि और बादामी शैली का प्रभाव काफी है और इस पर नागरशैली का विकसित शिखर भी है। अलंकरण सज्जा में भी नागरशैली का विशेष प्रभाव है। किंतु संगमेश्वर पर पल्लवशैली का स्तूपी प्रकार का शिखर है। विरूपाक्ष और मल्लिकार्जुन मंदिर पूरी तरह पल्लव मंदिर वास्तु का अनुगमन करते हैं। किंतु सज्जा और अभिप्राय का इसमें पल्लव वास्तुशैली की अपेक्षा यहाँ कम उपयोग है, और इन मंदिरों की बाहरी रूपरेखा पल्लव मंदिरों की तरह बोझिल नहीं है।


नागर और द्रविड़ शैली का प्रयोगात्मक प्रयास पापनाथ मंदिर में प्रथम हुआ। यदि नागरशैली का शिखर इसमें न होता तो यह संपूर्णतया द्रविड़ शैली (मामल्ल शैली) का ही नमूना ठहरता।

90 फीट ऊँचे इस मंदिर में गर्भगृह के बाद एक विस्तृत अंतराल है, जो लगता है मानों एक मंडप ही हो। अंतराल के बाद ‘मंडप' है और उसके मुखमंडप संपूर्ण वास्तु तत्व एक ऊँचे अधिष्ठान पर बनाया गया है। पूरा वास्तु समुदाय एक ऊँची और बंद स्तंभयुक्त भित्तिका से घिरा है, जिसमें कार्निसें (कपोत) बनी हैं। छत सपाट है। पूर्व की ओर एक शिखर निर्मित है। स्थान स्थान पर भित्तिकाओं में अर्द्धस्तंभों के बीच प्रकाश के लिए जालियाँ बनी है। भित्तिकाओं में देवप्रकोष्ठ भी बने हैं। प्रदक्षिणापथ भी है। मंदिर की भूमि योजना त्रिरथ प्रकार की है।


बादामी और पट्टदिकल के बीच स्थित महाकूटेश्वर मंदिर नागरशैली के शिखर से युक्त त्रिरथ प्रकार का है। मध्य रथ के समीप के उपमंदिर पंचरथ का पूर्वाभास प्रकट करते हैं। वर्गाकार विमान के आगे एक मंडप और उसके बाद अर्द्धमंडप इस मंदिर के प्रमुख वास्तु तत्व है। गर्भगृह एक प्रदक्षिणापथ से घिरा है। मंडप आदि स्तंभीय भित्तिका से बंद है किंतु प्रकाशादि के लिए स्थान-स्थान पर संछिद्र प्रस्तर लगे हैं। भित्तिका के ऊपर कपोत (कार्निस) भी है और इसके ऊपर के अलंकरण और विन्यास में दक्षिणात्य तत्व यथा द्वार, कूट, शाला आदि प्रयुक्त हैं। इस मंदिर के सभी तत्व एक ऊँचे अधिष्ठान पर स्थित हैं। इसी मंदिर के प्रांगण में स्थित मल्लिकार्जुन मंदिर इसी आकार प्रकार का है।