गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : आर्थिक स्थिति - Post-Gupta period (South India): Economic condition
गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : आर्थिक स्थिति - Post-Gupta period (South India): Economic condition
गुप्तोत्तर कालीन दक्षिण भारत सामान्य रूप से समृद्ध और धन-संपन्न था। वहाँ आर्थिक जीवन संतोषप्रद और सुखी था।
ग्राम
प्राचीन तमिल प्रदेश में बड़े-बड़े नगर कम थे। अधिकांश लोग ग्रामों में निवास करते थे। छोटे- छोटे गाँवों की संख्या अधिक थी। प्रायः ग्राम स्वतंत्र और स्वावलंबी होते थे। उनके प्रशासन की समस्त व्यवस्था ग्राम की पंचायत करती थी। ग्राम योजनापूर्वक बनाए जाते थे। उसमें एक या दो सीधी सड़कें या जन-मार्ग होते थे जिसके दोनों ओर पंक्तिबद्ध निवासगृह होते थे। सड़क से मिली हुई गलियाँ होती थीं। ग्राम के मध्य में ब्राह्मणों की गली, जिसे अग्रहारम कहते थे, होती थी, गली के एक छोर पर ग्राम का मुख्य मंदिर होता था। ग्राम के बाहर की अन्य गलियों में कृषक, शिल्पी, वणिक आदि के निवासगृह होते थे। गलयाँ स्वच्छ और चैड़ी होती थीं।
ग्रामों में अमीर और गरीब दोनों प्रकार के लोग रहते थे। अमीरों के निवासगृह दो या तीन मंजिल वाले होते थे और इनको माडम” कहते थे। गरीब लोग प्रायः घास-फूँस और लकड़ी के झोंपड़ों में रहते थे। सुरक्षा के लिए गाँव के चारों ओर दीवार या घने जंगल होते थे जिससे शत्रु या लुटेरे सरलता से प्रवेश कर सकें। 4.3.4.2 नगर
तमिल देश में आर्थिक समृद्धि के कारण कावेरि-पूँ-पट्टिणम, काँची, श्रीरंगम आदि जैसे विशाल नगर भी थे। प्रायः नगर योजना और वास्तुशास्त्र के नियमानुसार बसाए जाते थे। साधारणतया सुरक्षा के हेतु नगर के चतुर्दिक गहरी खाई होती थी जिसमें सदा जल भरा रहता था और उसके बाद भी भीतर की ओर ऊँची सुदृढ प्राचीर होती थी जिस पर नगर-रक्षक पहरा देते थे।
नगर के भीतर कई प्राचीरे होती थीं जिससे नगर अलग-अलग भागों में विभक्त हो जाता था। इन प्राचीरों को प्राकारी कहते थे। नगर के बाहर मठ, शालाएँ तथा सन्यासियों और मुनियों के आश्रम होते थे। नगर की प्रमुख प्राचीर के समीप के प्रकार में निम्न जाति और हीन व्यवसाय करने वाले लोग रहते थे। वहाँ, मद्य, माँस, मछली, नमक, मिष्ठान आदि साधारण वस्तुओं की दुकाने भी होती थीं। इससे भीतर के प्राकार में छोटे-छोटे व्यापारी, शिल्पी और व्यवसायी रहते थे, जैसे लुहार, सुनार, सुतार, जौहरी, कसेरे, दर्जी, गंधी, माली, रंगरेज, शंख और मोतियों के कारीगर, फेरीवाले आदि। इसके बाद के प्राकार में ब्राह्मण, शासकीय अधिकारी और समाज के प्रतिष्ठित व्यक्ति रहते थे। सबने भीतर के केंद्रीय प्राकार में राजमहल, राजसभा भवन, शासकीय भवन
मंत्रणागृह, नृत्यशाला एवं मंदिर आदि होते थे। नगर में यात्रियों के ठहरने व भोजन के लिए धर्मशालाएँ, विश्रामस्थल और भोजनालय थे।
किसी-किसी नगर में अजायबघर और संग्रहालय भी थे। सारे नगर में प्राचीरों के भीतर चैड़ी और सीधी सड़के या जनमार्ग होते थे जिनके दोनों ओर पंक्तिबद्ध निवासगृह होते थे। नगर के प्राचीरों में बड़े-बड़े गोपुरम् या प्रवेश-द्वार बने होते थे। इन सिंहद्वारों पर द्वार-रक्षक देवताओं की मूर्तियाँ बनी हुई थीं जिनकी प्रतिदिन पूजा होती थी। नगर में बड़े- बड़े व्यापारी और धनवान लोग रहते थे। इन व्यापारियों में विदेशी भी होते थे। राजा व्यापारियों की रक्षा करता था और उन्हें हर प्रकार की सुविधा दी जाती थी। सुरक्षा गोदामों में व्यापारियों का सामान रहता था और आयात तथा निर्यात करने के लिए उन पर राजचिह्न लगाया जाता था। चोल राजाओं का ऐसा राजचिह्न व्याघ्र मुद्रा व्यापारिक माल पर कर वसूल करने वाले अधिकारियों द्वारा अंकित की जाती थी। प्रत्येक व्यापारी या व्यापार के अलग-अलग झण्डे होते थे, जो उनकी दुकानों पर फहराते थे।
दक्षिण के नगरों के साथ "पट्टनम" और "ऊर" शब्दों का प्रयोग होता है, जैसे तंजाऊर, उरैयूर, विजगापट्टम, नागपट्टम आदि। ऊर' का अर्थ है गाँव तथा पट्टनम शब्द से तात्पर्य है समुद्रतट पर स्थित गाँव। प्रारंभ में नगर छोटे-छोटे गाँव रहें होंगें और धीरे-धीरे वे बड़े बन गए।
दक्षिण भारत में 'कावेरि पूँ-पट्टिणम' या "पुहार" नामक नगर पूर्वी समुद्र तट पर था। इसे ईसा के लगभग 5000 वर्ष पूर्व बसाया गया था और दुर्भाग्य से आज से लगभग डेढ़ सहस्र वर्ष पूर्व समुद्र ने इसे अपने गर्भ में ले लिया था। यह नगर दीर्घकाल तक चोर नरेशों की राजधानी रहा है।
यह नगर एक प्रसिद्ध और संपन्न बंदरगाह भी था। यहाँ अनेक विदेशी व्यापारी भी रहते थे। तमिल के कवि इलगों अडिगल ने अपने महाकाव्य 'शिल्पाधिकारम में इस नगर का अत्यंत ही सुंदर और रोचक वर्णन किया है। इसके बाद एक अन्य कवि माँगुडी मरुनार ने अपने ग्रंथ “मौक्कांची" में मदुरा नगर का वर्णन भी अत्यंत ही सरस भाषा में किया है। यह ग्रंथसन् 450 में लिखा गया था।
संपन्नता और सुख वैभव का जीवन देश में शांति, सुरक्षा और व्यवस्था रहने से, देशी और विदेशी व्यापार तथा उद्योग-धंधों की निरंतर वृद्धि और प्रगति से दक्षिण भारत ने लोगों, व्यावसायियों और व्यापारियों का जीवन भी समृद्ध, सुखी और वैभवपूर्ण था।
उच्च वर्ग के लोग आलीशान भवनों में रहते थे। ये भवन चार से छह और सात मंजिल तक होते थे। भवन पाषाण और ईंट के बनाए जाते थे और उनमें हिरण की आँखों जैसी छोटी-छोटी सुराखों वाली विशाल खिड़कियाँ होती थीं इन पर सुंदर नक्काशी होती थी। भवन विस्तीर्ण, हवादार, खुले आँगन वाले होते थे। घरों के चारों और चबूतरे भी होते थे। घरों के प्रवेश-द्वार बड़े प्रभावशाली होते थे। अमीरों के निवासगृहों में सुंदर पलंग, चैकियाँ तथा विलास ऐश्वर्य की सभी सामग्री विद्यमान रहती थी। संध्या के समय नगर के अमीर और रईस अपने-अपने वाहनों पर बैठकर शरीर रक्षकों के साथ सैर के लिए निवासगृहों से बाहर निकलते थे। ये लाल रेशमी वस्त्रों से तथा मोतियों की मालाओं से सुसज्जित होकर स्वर्ग से उतरी हुई अप्सराओं के समान अपने-अपने विशाल भवनों की छतों पर ताजी हवा के लिए खड़ी या बैठी होती थीं। रात्रि में संगीत और नृत्य होता था, और स्त्री पुरूष आनंदोत्सव में मग्न रहते थे। गलियों में नाचने-गाने वालों की भीड़ एकत्रित रहती थी।
उद्योग धंधे कृषि लोगों का प्रमुख व्यवसाय था। विभिन्न फसलें उत्पन्न की जाती थीं और उनमें वृद्धि करने के लिए तालाबों, नदियों पर बने बाँधों और कुओं की सिंचाई की जाती थी। पशुपालन भी मुख्य धंधा था, परंतु यह कृषकों से विभिन्न जाति के लोग करते थे। कुम्हार माली, लुहार, सुनार, रंगरेज, स्वर्णकार तथा विभिन्न शिल्पियों के भी व्यवसाय थे। मूंगे, मोती, शंख और सीप की विभिन्न वस्तुओं को बनाने वाले शिल्पी भी थे। मोतियों के आभूषणों का श्रृंगार और सजावट में अधिक उपयोग किया जाता था। हाथी दाँत की भी कई सुंदर आकर्षक वस्तुएँ बनाई जाती थीं और उत्तरी भारत के अवंती, मगध और महाराष्ट्र से अनेक निपुण शिल्पी दक्षिण भारत के व्यापारिक नगरों में बसे थे। वस्त्र बुनना, मछली पकड़ना, नमक तथा अन्य विभिन्न वस्तुओं का व्यापार आदि करना विशिष्ट व्यवसाय थे।
सूत के अत्यंत ही महीन वस्त्र बुने जाते थे। दक्षिण भारत के बुनकरों का महीन सुंदर मलमल बुनकर का यश गौरव ईस्वी सन् की प्रथम सदियों में ही स्थापित हो चुका था। तमिल साहित्य में इस प्रकार के कपड़ों का विवरण है जो या तो तमिलनाडु में बनते थे या विभिन्न उत्पादक केंद्रों से मँगाए जाते थे। कुछ सूत के वस्त्र इतने अच्छे बने हुए थे कि उन्हें वायु का बना हुआ या उबलते हुए दूध का वाष्प कहा जाता था।
धातुकला भी एक प्रमुख व्यवसाय था। विभिन्न धातुओं से लोग परिचित थे। लौह ज्ञात था स्वर्ण प्रचुरता से प्राप्त था। ताम्र से भी लोक अवगत थे। हाथी दाँत की विभिन्न कलापूर्ण सुंदर वस्तुएँ बनाई जाती थीं।
गज-दंत पर उत्कीर्ण कृतियों के हवाले भी उपलब्ध हैं। नमक बनाने और उसका व्यापार करना लोकप्रिय व्यवसाय था। अनेक व्यक्ति जो प्रायः मछुए होते थे, मछली पकड़ते थे और मोती तथा मूँगा भी समुद्र से निकालते थे। मोती और मूँगे की अनेक सुंदर वस्तुएँ मनोरम ढंग से व्यापार के हेतु बनाई जाती थीं। विभिन्न व्यवसायों के कारण धनसंपन्न वर्ग का अभ्युदय हुआ जिसका मुख्य व्यवसाय व्यापार था । व्यापारी वर्ग समृद्ध और धनवान था। बंदरगाहों तथा व्यापारिक केंद्रों के व्यापारियों ने अपने सफल वाणिज्य व्यवसाय से अपार धन संचित किया था तथा समाज और राज्य में बड़ा सम्मान प्राप्त किया था।
विभिन्न व्यवसायों और धंधों के अतिरिक्त समाज में ज्योतिष और चिकित्सा का धंधा करने वाले भी थे। लोग ज्योतिष और भविष्यवाणी, शुभ और अशुभ,
मंगल और अमंगल में विश्वास करते थे। प्रायः अंधविश्वास इनके मूल में था। कुरवा जाति के लोग विशेष करके उनकी स्त्रियाँ भविष्य बताने में निपुण मानी गई थीं। आज भी दक्षिण भारत में कुरवा जाति के लोग प्रातः काल डमरू बजाते हुए भविष्य कहते हुए भिक्षावृत्ति करते हैं। उनके डमरू के गुड़गुड़ शब्द से उनका नाम “गुड गुडु प्पाँडि” पड़ गया है। भविष्यवक्ताओं का दूसरा वर्ग मुरूगम देवता के उपासकों का होता था। ये भविष्य कहने में तथा तंत्र-मंत्र विद्या में निपुण होते थे। दक्षिण भारत में सिद्धों या संतों ने वैद्यक व्यवसाय में बड़ी प्रगति की। अनेक संत प्रसिद्ध वैद्य या चिकित्सक रहे और उन्होंने चिकित्साशास्त्र पर ग्रंथ भी लिखे। इसीलिए तमिल देश में
चिकित्साशास्त्र को सिद्धवैद्यम' कहते हैं।
सिद्धवैद्यम की अधिकांश बातें आयुर्वेद से मिलती-जुलती हैं। दक्षिण भारत में देशी और विदेशी व्यापार थल और समुद्री मार्गों से होता था और वहाँ बड़े-बड़े बंदरगाह भी थे। इससे नौका निर्माण और जलपोत निर्माण भी बड़ा व्यवसाय था और कई बंदरगाहों में इसके लिए बड़े-बड़े कारखाने थे।
तमिल देश समुद्र तट वाला होने से वहाँ के लोग निर्भीक रूप से समुद्र यात्रा करने वाले हो गए। भारतीय जलसेना का निर्माण करने और समुद्री व्यापार का विकास करने वाले ये सर्वप्रथम भारतीय थे। चोलों की सशक्त जल सेना ने ब्रह्मा के समुद्र तटीय द्वीपों, मलाया प्रायद्वीप, जावा, सुमात्रा के द्वीप-समूहों की विजय कर बृहत्तर भारत के विकास में बड़ा योगदान दिया था।
व्यापार-विनिमय-तमिल देश में बाहरी और आंतरिक दोनों प्रकार का व्यापार उन्नत था। दक्षिण भारत के मदुरा, कांची, तंजाऊर, कावेरि पूँ-पट्टिणम आदि बड़े-बड़े नगर व्यापार के केंद्र थे। उत्तर भारत के साथ वैदिक युग से ही दक्षिण भारत का व्यापारिक संबंध था। ईसा पर्व 2000 वर्ष से ही तमिल देश से मोती, मयूर पंख हीरा और सोना उत्तरी भारत को भेजा जाता था। आर्य इसका प्रचुर मात्रा में उपयोग करते थे। ऋग्देव और अथर्ववेद की ऋचाओं में मोती की अधिक प्रशंसा की गई है। देवताओं के रथों, अश्व और तरकसों को सजाने में मोतियों का प्रयोग बाहुल्यता से होता था। संभवतः वस्तु-विनिमय द्वारा आंतरिक व्यापार होता था।
तमिल साहित्य के अनेक ग्रंथो में समुद्री यात्रा, जलपोत, नौकाएँ और व्यापार का विवरण प्राप्त होता है। तमिल ग्रंथों में जलयात्रा से संबंधरखने वाले अनेक शब्द मिलते हैं, जैसे कडल, परवै, पुनारि, अर्कलि, मुन्निरि, कलम, मरक्कलम आदि। तमिल देश के जलपोतों के झंडों पर मछली का चिह्न होता था, जो उनकी तीव्रगति और समुद्री यात्रा का द्योतक था। समुद्री व्यापार का और नोकावाहन का यह भी प्रमाण है कि दक्षिण भारत में उस समय अनेक बंदरगाह थे और बड़े-बड़े बंदरगाहों में नौका तथा जहाज निर्माण के हेतु विशाल कारखाने थे। इन बंदरगाहों में व्यापार की उन्नति तथा जहाजों की सुरक्षा के लिए सब प्रकार की व्यवस्था थी। समुद्र पर ऊँचे द्वीप-स्तंभ भी बने थे जिनमें से कुछ तो ईंट-पत्थर के बने थे और कुछ ताड़ के बड़े-बड़े वृक्षों को काटकर बनाए गए थे। तमिल देश में रोमन सिक्कों की प्राप्ति यह संकेत करती है कि दक्षिण भारत का विदेशों से व्यापार होता था और रोमन सिक्कों का व्यापारिक प्रचार था। भारतीय जलपोत दूरस्थ देशों को समुद्र पार जाते थे।
ब्रह्मा, चीन मलाया तथा अन्य पूर्वी देशों से व्यापार- प्रागैतिहासिक काल में दक्षिण भारत के निवासी अपनी नौकाओं और जहाजों द्वारा ब्रह्मा कंबोडिया, हिंदुचीन, मलाया, जावा, उत्तरी बोर्नियों, चीन फिलीपाइन आदि पूर्वी देशों तक आते-जाते थे। चीन के इतिहास में ईसा पूर्व सातवीं सदी में भारत से चीन आने वाली वस्तुओं का उल्लेख प्राप्त होता है। चीन से भारत आने वाली वस्तुओं में चीनी और रेशम प्रधान आयातित पदार्थ थे। प्राचीन तमिल ग्रंथों में रेशम को "चीनम्" कहा गया है, जिससे यह विदित होता है कि वह चीन से आता था। फिलीपाइन द्वीप के उत्खनन में ईसा पूर्व सातवीं सदी के अनेक आयुध लोहे के चाकू, कुल्हाड़ियाँ, भाले, छुरे, शीशे के दाने, चूड़ियाँ आदि अन्य कई प्रकार की ऐसी वस्तुएँ प्राप्त हुई हैं जिनका भारतीय वस्तुओं से अधिक साम्य है। ऐसी ही वस्तुएँ जावा और बोर्नियों में भी प्राप्त हुई है और ये सब पूर्वी देशों से भारत के विदेशी व्यापार और संबंधों को प्रमाणित करती है।
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