गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : सामाजिक स्थिति - Post-Gupta Period (South India): Social Status
गुप्तोत्तरकाल (दक्षिण भारत) : सामाजिक स्थिति - Post-Gupta Period (South India): Social Status
सामाजिक स्थिति
गुप्तोत्तर कालीन समाज में मुख्यता उन व्यक्तियों का बाहुल्य था जो स्वयं भूमि को जोतकर कृषि करते थे और जो अप्रत्यक्ष रूप से भूमि पर निर्भर थे। इनके नीचे कृषि के भूमिहीन श्रमजीवी (कुदीस) थे। तमिल साहित्य में इनके चार समुदायों, पाणान, सुडीयन, परयन और कदंबन का उल्लेख है। कदाचित् ये समुदाय जनसाधारण का निम्न वर्ग था और आज ये दक्षिण भारत में अछूत जातियों के नाम से विद्यमान हैं। इनके अतिरिक्त समाज में विभिन्न व्यवसाय करने वाले लोग थे जैसे लुहार, बढ़ई या सुतार, स्वर्णकार, जुलाह आदि। इसके बाद समाज की मलवर, नाग, आदि जातियों का उल्लेख साहित्य में उपलब्ध होता है।
संभवतः मलवर व नाग वन्य जीवन व्यतीत करते थे, आखेट करते थे और कभी-कभी जल मार्गों पर लोगों को लूटते भी थे। मलवर लोग युद्ध और संघर्ष करने में बड़े निपुण थे। समुद्र तट और नदी तट पर मछुए रहते थे जिनका स्तर समाज में निम्न श्रेणी का था। कृषक हष्ट-पुष्ट, सशक्त और साहसी होते थे। वे युद्ध के समय सैनिक बनकर रणक्षेत्र में युद्ध भी करते थे। समाज में किसानों का बड़ा सम्मान था। वे अन्नदाता समझे जाते थे। प्रायः कृषक बड़े सुखी और संपन्न थे। फसल काटने के बाद वे भिन्न-भिन्न प्रकार के त्यौहार और उत्सव मनाते थे और नाच-गान तथा अन्य आमोद-प्रमोद में अपना समय व्यतीत करते थे।
इस प्रकार से निर्मित समाज में ब्राह्मण उत्तरी भारत से आकर बस गए थे। अपने चरित्र की विशुद्धता और विद्या तथा ज्ञान की गहनता के कारण समाज में उन्हें अधिक प्रतिष्ठित पद प्राप्त हो गया था। वे बड़े सदाचारी और अल्पसंतोषी होते थे और अपना अधिकांश समय वेदाध्ययन, भजन-पूजन और • यज्ञादि कर्म में व्यतीत करते थे। वे गायों को पालते थे और उनका जीवन सादा और सरल था। समाज में उनके अलग मुहल्ले थे जहाँ वे निवास करते थे और इन मुहल्लों और गलियों को “अग्रहारम" कहते थे और उनके निवास गृहों को "अकरम" कहते थे।
ब्राह्मण कभी-कभी मंत्री या आमात्य का कार्य भी करते थे और युद्ध काल में राजा की विजय के लिए भगवान से प्रार्थना करते थे। ब्राह्मणों के प्रभाव में अनेक तमिल नरेश क्षत्रिय बन गए थे और यज्ञ, अनुष्ठान आदि कर्म करने लगे थे। कई तमिल राजाओं के यज्ञ करने के कारण एक तमिल नरेश का नाम ही “राजसूयमेवत्ता पेरूनईकिल्लि' पड़ गया। कालांतर में ब्राह्मणों के प्रभाव के कारण दक्षिण के राजाओं के नाम में भी परिवर्तन हो गए। शुद्ध तमिल नामों के स्थानों पर आर्यों के नाम आ गए। ईसा की चौथी सदी के पूर्व प्रायः सभी राजाओं के लंबे-लंबे शुद्ध तमिल नाम ग्रंथों में प्राप्त होते हैं परंतु उसके बाद आर्यों के नामों का प्रचार और प्रसार बढ़ गया।
समाज में धनसंपन्न समृद्ध व्यापारियों का भी एक वर्ग था। ये वणिक जाति के समान थे जिनका मुख्य व्यवसाय वाणिज्य व्यापार था। ये जल और थल दोनों मार्गों से व्यापार करते थे। इन्होनें अपनी व्यापार-निपुणता से अपार धन-द्रव्य संचित किया था और राज्य में बड़ी प्रतिष्ठा प्राप्त की थी।
यद्यपि कालांतर में समाज की वैसी ही व्यवस्था हो गई थी जैसी उत्तरी भारत के आर्यों के समाज की थी, परंतु समाज के चार वर्ण या चार आश्रम तमिल देश में अज्ञात थे।
प्रायः लोग अपने अपने धंधों और व्यवसायों के अनुसार समुदायों में विभक्त थे। साहित्य में आकस्मिक हवालों से इन समुदायों का विवरण प्राप्त होता है। विभिन्न जातियाँ अन्य दूसरी जातियों से स्पष्ट रूप से अलग-अलग जीवन व्यतीत करती थीं। प्रत्येक का अपना धंधा और अधिकार था। अंतर्जातीय विवाह और खान-पान में प्रत्येक समुदाय के अपने-अपने नियम और प्रथाएँ थीं। अभी तक ऐसा कोई भी प्रमाण उपलब्ध नहीं हुआ है जिससे यह प्रकट हो कि रीति-रिवाजों तथा आचार-विचारों को लोगों पर लादने का प्रयास किया गया हो या निम्न श्रेणियों को उच्च वर्गों में मिश्रित हो जोने की माँगे रही हों। बाद में विभिन्न वर्गों या जातियों का जो सम्मिश्रण हुआ, वह उन लोगों की श्रेष्ठ भावनाओं और उदाहरणों का परिणाम था जिनके ज्ञान और चरित्र के लिए जनसाधारण श्रद्धा की भावना थी।
अतः कहा जा सकता है कि दक्षिण भारत की सामाजिक व्यवस्था संभवतः रक्त पेशे, धार्मिक विश्वास और वातावरण पर आश्रित थी। 4.2.3.2 आहार और वेशभूषा
गुप्तोत्तर कालीन दक्षिण भारतीय लोगों का भोजन सादा और सरल था। भोजन में दूध, दही और माँस का उपयोग होता था तथा चावल और ज्वार से कई प्रकार के मिष्ठान बनाए जाते थे। प्रायः सभी वर्ग के लोग सुरापान करते थे। मदिरापान में उनकी अभिरूचि थी। राजा और राजकुमार कभी-कभी महँगी सुरा के पीने में मस्त रहते थे। इस प्रकार की सुरा यूनानी और रोमवासी दक्षिण भारत में लाते थे। सुरा के अतिरिक्त अन्य मादक द्रव्यों का भी उपयोग किया जाता था। चावल, शहद और ताड़ी से सुरा और मादक द्रव्य बनाए जाते थे।
गुप्तोत्तर कालीन दक्षिण भारतीय लोगों की वेशभूषा सादी थी और इसमें दो वस्त्र होते थे, एक धोती और दूसरी पगड़ी। तमिल स्त्रियाँ चूड़ियाँ, अंगूठियाँ, हार, भुजबंद, कंदौरे, आयल आदि आभूषण पहनती थीं, संपन्न परिवारों की स्त्रियाँ एक प्रकार की रत्नजड़ित टोपी पहनती थीं तथा बड़े सुंदर, आकर्षक और बहुमूल्य आभूषण और वस्त्र धारण करती थीं, "जो साँप की केंचुली के समान कोमल और धुएँ के सदृश्य पतले होते थे।" यद्यपि सूती, ऊनी और रेशमी सभी प्रकार के वस्त्र पहने जाते थे, पर सूती वस्त्रों की विशेषता और प्रचुरता थी 4.2.3.3 आमोद-प्रमोद
गुप्तोत्तर कालीन दक्षिण भारतीय लोग मनोरंजन प्रिय हँसमुख, खुशदिल और विनोदी होते थे।
खेल-कूद तथा संगीत और नृत्य प्रचलित मनोरंजन के प्रमुख साधन थे। प्रत्येक ग्राम में एक खुला विस्तीर्ण मैदान होता था जिसे "आडुकलम" या नृत्यशाला कहते थे। अवकाश के समय, उत्सव और समारोहों पर ग्रामवासी वहीं एकत्रित होकर नाच-रंग मनाते थे। नृत्य में ग्राम की स्त्रियाँ भी सम्मिलित होती थीं। नृत्य कई प्रकार के होते थे। इनमें आट्टम, कूत्तु और तलैकोल कुनिप्पु नृत्य प्रमुख थे। भिन्न-भिन्न अवसरों पर भिन्न-भिन्न प्रकार के नृत्यों का अभिनय होता था। आम और कूत्तु से नवीन प्रकार के नृत्य का विकास हुआ जिसमें मूक नृत्य होता था और नर्तक केवल आंगिक अभिनय से अपने हृदय के भावों को प्रदर्शित करते थे।
इस प्रकार का नृत्य दक्षिण भारत में (विशेष रूप से केरल प्रदेश में) आज भी प्रचलित है और देवताओं के पूजन-अर्चन के समय भी नृत्य होता था। मुरूगन, मायोन और कौरवै आदि देवताओं के उत्सवों में नृत्य और संगीत प्रधान रूप से होते थे। भावी संकटों से बचने के लिए नृत्य और संगी द्वारा देवताओं को प्रसन्न किया जाता था। “कुरूवैक्कूत्तु” नामक एक विशेष प्रकार का नृत्य होता था जिसमें ग्वालों द्वारा कृष्ण की पूजा की जाती थी। इसका तथा अन्य नृत्यों का उल्लेख 'शिलप्पधिकारम्' महाकाव्य में है। कहीं-कहीं मृत शरीर के चतुर्दिक खड़े होकर नाचने और गाने की प्रथा भी थी। दक्षिण भारत में आजकल भी यह प्रथा निम्न श्रेणी के लोगों में प्रचलित है। शवयात्रा के समय कुछ लोग अर्थी के आगे-आगे नाचते-गाते एवं ढोल, तुरही बजाते हुए जाते हैं।
कुछ लोग गाने-बजाने और नृत्य करने का व्यवसाय भी करते थे। वीणा, मुरली, मृदंगम्, माल, ढोल आदि उस समय के प्रचलित वाद्ययंत्र थे।
कन्याओं को नृत्य और संगीत की शिक्षा दी जाती थी। शिक्षा पूर्ण होने पर राजा के सम्मुख अपनी योग्यता की परीक्षा देना पड़ती थी। और जो उसमें उत्तीर्ण होती थी उन्हें प्रमाण-पत्र दिए जाते थे। इन्हीं परंपराओं के कारण आज भी दक्षिण भारत के जीवन में संगीत और नृत्य का बहुत ऊँचा स्थान है और प्रायः कन्याओं को अन्य शिक्षा के साथ-साथ संगीत तथा नृत्य की शिक्षा दी जाती है।
प्रकृति प्रेम
गुप्तोत्तर कालीन दक्षिण भारतीय लोग प्रकृति के बड़े प्रेमी और फूलों के बड़े शौकीन होते थे। प्रायः प्रत्येक ग्राम में फूलों और फलों का एक उद्यान होता था। स्त्री-पुरूष फूलों की मालाएँ और गजरे पहनते थे। शृंगार के हेतु फूलों के अतिरिक्त सुंदर कोमल पत्तियों का भी उपयोग होता था। रणक्षेत्र में भी फूलों का उपयोग होता था। प्रत्येक युद्धजीवी और वीर जाति का चिह्न एक पुष्प होता था और उस के वीर युद्ध क्षेत्र में जाते समय पुष्प विशेष को अपने सिर में बाँधकर या उसकी माला पहनकर युद्ध करने जाते थे। उत्सवों और समारोहों में भी पुष्पों का प्रचुरता से उपयोग होता था। लोग शरीर पर चंदन लगाते थे। दक्षिण में फूलों के प्रचुर उपयोग और चंदन लगाने की प्रथा आज भी विद्यमान है।
नारी की स्थिति
समाज में नारियों का श्रेष्ठ और ऊँचा स्थान था। सामाजिक समारोहों,
उत्सवों और कार्यों में वे स्वतंत्रतापूर्वक भाग लेती थीं। ये सार्वजनिक नृत्यों में भी सम्मिलित होती थीं। बहु-विवाह की प्रथा कुछ अंशों तक प्रचलित थी। विवाह से पूर्व प्रेम करने की संभावना रहती थी और प्रेम-विवाहों का प्रचार था। कन्याएँ अपनी इच्छानुसार पति चुन सकती थीं। तमिल लोग नारी सौंदर्य के बड़े प्रशंसक थे। तमिल कवियों ने नारी के सौंदर्य का अत्यंत रोचक वर्णन अनेक स्थलों पर किया है।
समाज में वेश्यावृत्ति प्रचलित थी। सुरा और वेश्या समाज के आवश्यक अंग बन गए थे। पुहार, मदुरा आदि बड़े-बड़े नगरों में वेश्याओं की अलग गली होती थी जहाँ धनिकों के विलासमय जीवन का अधिकांश समय वेश्याओं के साथ क्रीड़ा करने और आमोद-प्रमोद में व्यतीत होता था।
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