गुप्तोत्तर शून्यकाल - Post -leend zero hour
गुप्तोत्तर शून्यकाल - Post -leend zero hour
हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद लगभग 150 वर्षों तक यशोवर्मन की दिग्विजय के बावजूद कन्नौज का उत्तर भारतीय राजनीति में कोई महत्वपूर्ण योगदान नहीं दिखायी देता । यह समय एक प्रकार से गुप्तोत्तर शून्य काल सा प्रतीत होता है जो बहुत अंशों में छठी शताब्दी की राजनैतिक स्थिति के समान दिखायी देता है। कामरूप / असम, वंग-समतट/दक्षिण-पूर्वी बंगाल, गौड वारेन्द्र/पश्चिम और उत्तर-पश्चिमी बंगाल, कोंगद मध्य उड़ीसा, ओडू / उत्तर-पूर्वी उड़ीसा और कलिंग दक्षिण-पश्चिमी उड़ीसा, कोसल / दक्षिण कोसल अथवा महाकोसल,
अंग मगध तथा कन्नौज में अनेक छोटे-छोटे राजे-रजवाड़ों की स्थिति से अराजकता की स्थिति उत्पन्न हो गई थी। इस काल में इन क्षेत्रों में उस समय के सर्वप्रमुख उत्तर भारतीय राज्यों-कश्मीर, तिब्बतियों और नेपाली भोटियों ने कई बार आक्रमण किया। पश्चिमी भारत में सिंधु, भड़ौंच, वल्लभी, मालवा, जोधपुर, उत्तर में छंब और कीर (काँगड़ा) तथा मध्य भारत में मत्स्य (अलवर, भरतपुर और जयपुर) और विदर्भ के स्वतंत्र राज्य थे। राजनैतिक अस्तव्यस्तता में ही पश्चिमी समुद्र तट के क्षेत्रों पर 712 ई. में अरबों का आक्रमण हुआ तथा सिंध और मुल्तान उनके अधिकार में चले गए।
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