मौर्योत्तर काल : चेर वंश - Post-Mauryan Period: Chera Dynasty
मौर्योत्तर काल : चेर वंश - Post-Mauryan Period: Chera Dynasty
चेरों का सर्वप्रथम उल्लेख संभवतः ऐतरेय आरण्यक में हुआ है। परवर्ती काल में चेर राज्य केरल के नाम से प्रसिद्ध हुआ। चेरों को 'वान-वन' तथा 'मलैयर' भी कहा गया है। कात्यायन (ई. पू. चैथी (शताब्दी) के वातिक तथा अशोक के शिला लेख दो में पांड्यों एवं चोलों के साथ केरलों का भी उल्लेख हुआ है। रामायण एवं महाभारत में भी इसका वर्णन है। प्राचीन चेर राज्य का विस्तार पश्चिमी समुद्र- तटवर्ती क्षेत्र में कोंकण तथा दक्षिणी मलाबार तट तक था और इसमें उत्तरी ट्रावन्कोर, कोचीन तथा दक्षिणी मलाबार क्षेत्र शामिल थे। इस प्रकार चेर, पांड्य राज्य के उत्तर में पश्चिमी घाटों की पर्वत शृंखला तथा समुद्र के मध्यवर्ती भूभाग के शासक थे। परंतु ये सीमाएँ समय-समय पर घटती-बढ़ती रहीं। प्राचीन चेर राज्य की दो राजधानियाँ थी।
1. वंजि (तिरुचिरापल्ली जिले में करवूर या करूर)
2. तोंड़ी (पश्चिमी समुद्र तट पर स्थित )
जि चेरों की शक्ति का अधिक महत्वपूर्ण केंद्र था। परंतु इसके समीकरण के संबंध में काफी मत भिन्नता है। कुछ विद्धानों ने इसे तिरुचिरापल्ली जिले के करूर नामक स्थान और कुछ ने कोचीन के समुद्र तट पर स्थित तिरुवंजिकुलम् (तिरुवाजैक्कलम्) माना है। अन्य विद्वान इसका समीकरण पेरियर नदी के मुहाने के निकटवर्ती क्रांगनोर नामक स्थान से करते हैं। जिसे यूनानी लेखकों ने संभवतः मुजरिस कहा है। मुजरिस महत्वपूर्ण बंदरगाह था। टालमी ने करौरा को चेरों की राजधानी बतलाया है। इस स्थान के निकट काफी संख्या में रोम के सम्राटों के सिक्के प्राप्त हुए हैं।
चेर राजवंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक उदयजीरल (लगभग 130 ई.) था। उसके विषय में कहा गया है कि कुरुक्षेत्र की दोनों (कौरव एवं पाडंव) सेनाओं का भक्षण करने के उपरांत उसने उदयंजीरल की उपाधि धारण की थी। उसने द्वितीय शताब्दी के पूर्वाद्ध में शासन किया।
उदयंजीरल के पश्चात् उसका पुत्र नेदुजीरलम (नेदुजेराल) 155 ई. के आस-पास राजा हुआ। वह वेलीर वंशीय राजकुमारी वेलियानवेनि-मालनल्लिनी से उत्पन्न हुआ।
उसे महान विजेता तथा चक्रवर्ती सम्राट के रूप में प्रस्तुत किया गया है और उसकी विजयों में कन्याकुमारी से लेकर हिमालय तक के समस्त राज्यों को शामिल कर दिया गया है। नेदुंजीरल ने इमयवरम्बन् का विरुद धारण किया जिसका अर्थ विभिन्न विद्वानों ने इस प्रकार किया है-
1. जिसने अपने राजकीय चिह्नों को हिमालय पर्वत पर उत्कीर्ण कराया हो।
2. हिमालय जिसके राज्य की सीमा हो। 3. जिसका यश हिमालय तक पहुँच गया हो।
4. देवानां प्रिय (इमइ - अनवन) अर्थात् देवताओं का प्रिय जिसका प्रयोग मौर्य सम्राट अशोक ने किया था।
दुजील के पास शक्तिशाली नौ सेना थी। उसकी निम्नलिखित महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ तथ्य पर आधारित प्रतीत होती हैं-
1. उसने मलावार तट के यवनों को बंदी बनाकर उनके हाथ पीछे की ओर बंधवा दिए, उनके सिर पर तेल डलवाया और उन्हें अन्य प्रकार से भी अपमानित एवं प्रताड़ित किया। इसके उपरांत उसने यवनों से हीरे, मोती, बहुमूल्य मणियाँ तथा बर्तन आदि प्राप्त कर उन्हें मुक्त कर दिया।
प्राचीन भारतीय साक्ष्यों में पहले यवन शब्द का प्रयोग यूनान के लोगों के लिए किया गया और बाद में विदेशी के सामान्य अर्थ में नंदुजीरल संदर्भ में यवनों का तात्पर्य संभवतः यूनान, रोम या अरब के व्यापारिक अथवा सामुद्रिक दस्युओं से हो सकता है।
2. नेदुंजीरल की दूसरी महान उपलब्धि थी 'कड़म्बु' नामक जनजाति का दमन । प्राचीन तमिल साहित्य में कारवाड़ से मंगलौर तक के सामुद्रिक दस्युओं के क्षेत्र की कड़म्बु कहा गया है। इस भूभाग में संभवतः कड़म्बु नामक वृक्ष भी पैदा होता था।
नेदुजीरल के राज्यकाल में पश्चिमी समुद्र के इस क्षेत्र का पाश्चात्य जगत के साथ व्यापार उन्नत अवस्था में था और कड़म्बु डाकू पाट द्वारा इसमें संभवतः विघ्न उपस्थित करते थे। इसलिए नेदुंजीरल इन दस्तुओं का पूर्णरूप से दमन कर सामुद्रिक व्यापार को उनके खतरे से मुक्त कर दिया।
एस. कृष्णस्वामी आयकर की संभावना है कि इसी कड़म्बु जनजाति के लोग परवर्ती काल में कदम्ब कहलाने लगे। परंतु यह मत किन्हीं पुष्ट ऐतिहासिक साक्ष्य द्वारा समर्थित न होकर केवल कुछ बाह्य नाम साम्य पर ही आधारित है।
नेदुंजीरल ने सात शत्रु शासकों को पराजित करने के उपरांत 'अधिराज' की उपाधि धारण की।
उसका चोल शासक उरुवप्पहरेर् इलैयन् से भी युद्ध हुआ जिसमें दोनों ही मारे गए और उनकी पत्नियाँ सती हो गई। यदि यह विवरण तथ्य पर आधारित है तो इसे प्राचीन भारतीय इतिहास के अद्भुत उदाहरणों में से एक मानना चाहिए। कुछ विद्वानों के अनुसार नेदुंजीरल ने 55 वर्ष तक शासन किया और कुछ के अनुसार 58 वर्ष तक
नेदुंजीरल की मृत्यु के उपरांत उसका भाई पल्यानैशेल्केलुकुडवन चेर राजसिंहासन पर बैठा। उसे कोंगु जनपद तथा अगप्पा के दुर्ग का विजेता कहा गया है। उसके विषय में अधिक सूचना नहीं मिलती दुजीरल के तीन पुत्रों के नाम मिलते हैं-
1. कलंगायक्कणिनाडमुडिच्छच्छीरल-जो 175 ई. के आस-पास शासन कर रहा था। उसका युद्ध नारमुडि नामक शासक से हुआ था।
2. चोल राजकुमारी से उत्पन्न सेंगुडुवन
3. इलंगोअदिगल
इसमें सेगुटटुवन (लगभग 180 ई.) सबसे शक्तिशाली था। उसकी उपलब्धियों तथा महानता का प्रशंसात्मक विवरण संगम युग के कवि परणर ने किया है। सेंगुटटुवन को पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्रों के बीच के समस्त भू-भाग का विजेता बतलाया गया है।
उसने उत्तर भारत के आर्यों को पराजित किया, कोडुगूर को जीता, पलययान के धार्मिक वृक्ष को नष्ट किया, वयिलपुरम् के युद्ध में नौ चोल शासकों को पराजित किया और कड़म्बुओं का विनाश करने के उपरांत कदलपिरक्कोतिय (अर्थात् समुद्र के पीछे हटाने वाला) की उपाधि धारण की। परणर के अनुसार उसके पास सुदृढ़ नौसेना थी, जिसके द्वारा उसने पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र तटों के द्वीपों पर अपना प्रभुत्व स्थापित किया था। उसने मुहूर तथा वियालूर के शासकों पर भी विजय प्राप्त कीं। के. ए. नीलकांत शास्त्री के अनुसार मुहूर पांड्य राज्य का ही एक भाग था।
परणर के अनुसार सँगुटटुवन कुशल अश्वारोही तथा गजारोही हिमालय लेकर कन्याकुमारी तक के अनेक शासकों का विजेता, सात राजमुकुटों की माला धारण करने वाला,
शत्रुओं के दुर्गों में घेरा डालने में चतुर, युद्ध-प्रिय तथा सुरापान में अनुरक्त था। उसने इलंगोवेनिमाल नाम की वेलीर वंशीय राजकुमारी के साथ विवाह किया। वह विद्या एवं धर्म का भी उत्साही संरक्षण था। उसी के शासन काल में पातिव्रत-धर्म की अधिष्ठात्री देवी कण्णगी की पूजा का प्रारंभ हुआ। उसने इस देवी का एक मंदिर बनवाया और उसमें कण्णगी प्रतिमा स्थापित की। शिलप्पदिकारम् में यह वर्णित है कि इस मूर्ति के निर्माण हेतु पत्थर लाने के लिए सेंगुटटुवन ने हिमालय पर्वत की साहसिक यात्रा की थी। प्रतिमा की स्थापना के अवसर पर जिन अनेक शासकों को उसने आमंत्रित किया था, उसमें लंका का राजा गजबाहु प्रथम भी शामिल था। गजबाहु से समकालीनता के आधार पर उसका राज्यकाल द्वितीय शताब्दी के तृतीत चरण में रखा गया है। सेंगुटटुवन ने 55 वर्ष तक शासन किया।
गुटुवन के पश्चात् उसका पुत्र पेरुंजीरलइरुमपोरय (लगभग 190 ई.) राजा हुआ। उसने पोत्ति के चोल शासक तथा क्लैयनमारन को पराजित किया और प्रस्तर से निर्मित पाँच दुर्गों को अधिकृत किया। उसने विच्चि तथा पांड्य शासक के विरुद्ध भी सफलता प्राप्त की और इन युद्धों में प्राप्त बहुत सी धन- संपत्ति सहित अपनी राजधानी वंजि वापस आया । इरमपोरय को कलुवूल एवं अडिगयमान नामक सामंतों को भी पराजित करने का श्रेय दिया गया है। उसने तगडूर (सलेम जिले में धर्मपुरी) में स्थित अडिगयमान के एक दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। परंतु बाद में इन दोनों राजाओं में मित्रता हो गई। इरमपोरय के उत्तराधिकारियों में सेइयै (लगभग 210 ई.) का नाम उल्लेखनीय है। उसने पांड्यों तथा चोलों से युद्ध किया था।
अटूकोतपुत्तूचेरलआदन नामक एक अन्य राजा ने चेर राज्य के कुछ प्रदेश पर 38 वर्ष तक शासन किया। उसे दंडकारण्य की कुछ जनजातियों द्वारा चुराए गएपहाड़ी बकरे-बकरियों को पुनः प्राप्त कर उन्हें तोड़ी में लाने का श्रेय दिया गया है। इससे प्रतीत होता है कि उसकी राजधानी वंजि न होकर संभवतः तोन्डी थी। अदुकोतपुत्तचेरल आदन ने कुडनाडु में एक नगर ब्राह्मणों को दान में दिया मलवारों पर विजय प्राप्त की और वानरवरम्बन की उपाधि धारण की।
उपर्युक्त चेर शासकों के अतिरिक्त अन्दुधन, शेनवक्कुडगोन, वालिआदन ऐ तथा पारि आदि के नाम भी मिलते हैं। कुछ विद्वानों ने इन्हें शाखा-राजवंश से संबंधित किया है।
ये राजा ब्राह्मण धर्म के संरक्षण थे। परंतु उनके राज्यकाल के विषय में कोई महत्वपूर्ण सूचना नहीं मिलती।
उपरोक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि प्रारंभिक शताब्दियों में चोल, पांड्य तथा चेर राज्यों के महत्वाकांक्षी शासक सुदूर दक्षिण की प्रभुसत्ता के लिए आपस में संघर्ष करते रहे और बारी-बारी से एक- दूसरे पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने में सफल हुए किंतु उनमें कोई ऐसा शासक नहीं हुआ जो तीनों राजवंशों को एकता के सूत्र में बाँध पाता। अतः निश्चित है कि उनमें एकता का पूर्णतः अभाव था।
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