मौर्योत्तर काल : चोल वंश - Post-Mauryan Period: Chola Dynasty

मौर्योत्तर काल : चोल वंश - Post-Mauryan Period: Chola Dynasty


संगम युग में चोल मुख्यत: कोरोमंडल-समुद्रतट, तिरुचिरापल्ली तंजोर तथा कावेरी नदी से घिरे भूभाग के शासक थे। के. ए. नीलकान्त शास्त्री के अनुसार प्राचीन चोल राज्य पूर्वी समुद्र-तट पर पेन्नार नदी से बेल्लार तक और पश्चिम में कुर्ग की सीमा तक विस्तृत था। इसके अंतर्गत तोंडमंडलम क्षेत्र भी शामिल था। चोलों का उल्लेख करने वाले प्राचीन साक्ष्यों में पाणिनि की अष्टाध्यायी, संगम साहित्य, महाभारत तथा अशोक की शिलालेख संख्या दी है। चोलों ने अपने को सूर्यवंशी क्षत्रिय माना और पुराणों में वर्णित शिवि एवं मनु से संबंधित किया।


टालमी के अनुसार उसके समय में दो चोल राज्य थे। दक्षिण के चोलों की राजधानी उरगपुर या उरैपुर थी और उत्तर के चोलों की शक्ति का केंद्र अर्काट था। टी.वी. महालिंगम ने अर्काट का समीकरण तंजौर जिले के आरक्काडु नामक स्थान से किया है। चोलों की प्राचीनतम राजधानी उरैयूर कावेरी नदी के तट पर स्थित थी प्राचीन चोल वंश का प्रथम महत्वपूर्ण शासक उरुवप्पहरेंइलमसेतसेन्नि था। उसकी राजधानी उरैयूर थी। उसने वेलीर वंश से वैवाहिक संबंध स्थापित किया। उसके राज्य में तोंडमंडलम् क्षेत्र नहीं शामिल था। संगम साहित्य में वस्तुतः कारैकाल के पूर्ववर्ती कई चोल शासकों के नाम वर्णित हैं, परंतु स्पष्ट प्रमाणाभाव के कारण उनके वंशानुक्रम एवं तिथिक्रम के संबंध में काफी मत भिन्नता तथा अनिश्चितता है।


उरुवप्पहरे का पुत्र एवं उत्तराधिकारी कारैकाल बहुत शक्तिशाली तथा महान शासक था। उसकी उपलब्धियों का भावी पीड़ियों के मानस पटल पर गहरा प्रभाव पड़ा और परवर्ती काल में उससे संबंधित अनेक कथानक गढ़े गए जिनके विवरण शिलप्पदिकारम् के अतिरिक्त 11-12वीं शती तक के साहित्यक ग्रंथों एवं अभिलेखों में मिलते हैं। करिकाल का पितामह पेरुननिकिल्लि चेर शासक कदक्को का समकालीन था और दोनों परस्पर युद्ध करते हुए एक साथ मारे गए थे। कारैकाल के पिता की मृत्यु राज्यारोहण के पहले ही हो गई थी। इसलिए वह (करिकाल) बचपन में ही विषम परिस्थितियों से घिर गया 'था और उसे अपने राज्य से भागकर करुर में शरण लेनी पड़ी। वहीं से वह चोल राजसिहांसन पर प्रतिष्ठित किए जाने के कारण लंगड़ा हो गया था।

विभिन्न विद्वानों द्वारा अग्नि से बुरी तरह जल जाने के लिए लाया गया था। करिकाल बचपन में अग्नि से बुरी तरह जल जाने के कारण लंगड़ा हो गया था। विभिन्न विद्वानों द्वारा सुझाये 7Uउ77छह7 गए उनके नाम के विभिन्न शाब्दिक अर्थ इस प्रकार हैं-


1. जिसकी टांग जल गई हो।


2. जो करि अर्थात् शत्रुरूपी हाथियों के लिए काल के समान हो ।


3. कलि को समाप्त करने वाला। 


4. काली टांग वाला।


इसमें द्वितीय अर्थ अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है।


करिकाल के सम्मान से रची हुई पट्टिनप्पलै में उसकी विजयी तथा अन्य उपलब्धियों का विस्तृत एवं अतिशयोक्तिपूर्ण विवरण प्राप्त होता है। इस साक्ष्य से हमें ज्ञात होता है कि शासन के प्रारंभिक भाग में करिकाल को अनेक राजनैतिक झंझावातों का सामना करना पड़ा। उसके शत्रुओं ने चोल राज्य को अधिकृत कर उसे जेल में डाल दिया था। परंतु वह किसी प्रकार जेल से मुक्ति पाकर पुनः राजसिंहासन प्राप्त करने में सफल हुआ। राज्य एवं राजधानी में राजनैतिक स्थिरता स्थापित करने के उपरांत उसने महत्वाकांक्षी साम्राज्यवादी योजना को कार्यान्वित करना प्रारंभ किया। उसे अनेक राज्यों एवं राजाओं पर विजय प्राप्त करने का श्रेय दिया गया है जिसका संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-


करिकाल ने वेण्णि (तंजौर से लगभग 24 किलो मीटर पूर्व में स्थित ) में दो महत्वपूर्ण युद्ध किए थे। प्रथम संघर्ष में उसने अपने प्रमुख प्रतिद्वंदी पाड्यों चेरों तथा उनके मित्र 11 सामंत शासकों की सम्मिलित सेनाओं को निर्णायक रूप से पराजित कर दिया। इस युद्ध में चेर राजा की पीठ पर घाव लग गया था जिससे अपमानित होकर उसने युद्ध-स्थल पर ही दम तोड़ दिया। करिकाल की यह शानदार विजय न केवल उसके लिए बल्कि, दक्षिण भारत की तत्कालीन राजनीति में दिशा परिवर्तक सिद्ध हुई ।।


करिकाल का दूसरा महत्वपूर्ण युद्ध वाहैप्परन्दले नामक स्थान पर हुआ था।

इसमें उसने नौ छोटे छोटे शासकों को पराजित कर उसके राजकीय छत्र आदि अपहृत कर लिए और उन पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित कर दी। उसने पेन्नार नदी के निचले कां ढे में निवास करने वाले अरुवालर लोगों पर भी आक्रमण किया इनके अतिरिक्त करिकाल को पश्चिमी क्षेत्रों पर विजय प्राप्त करने का श्रेय दिया गया है और बतलाया गया कि उसने नागवंश से संबंधित ओलियन नामक एक असभ्य जनजाति को सभ्य बना दिया था। पट्टिप्पालै में करिकाल की विजयों में एविनार, ओलियार, अरुवालर तथा बड़वर को भी शामिल किया गया है। टी.वी महालिंगम के अनुसार इनमें से प्रथम तीन तोंडमंडलम की जनजातियाँ थी और वडवर तमिल देश की सीमा के बाहर स्थित क्षेत्र में शासक थे।


कारैकाल को उत्तर में हिमालय पर्वत तक के क्षेत्र का विजेता बतलाया गया है। इस कथन में कहाँ तक सत्यता है, कहना कठिन है। शिलप्पदिकारम् के अनुसार करिकाल ने मगध, वज्र तथा अवंति राज्यों के शासकों से कूटनीतिक संबंध बनाए। एस. के. आयंगर ने इस विवरण को प्रमाणिक माना है और वज्र का समीकरण बुंदेलखंड से किया है।


करिकाल के राज्य काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना उसके द्वारा श्रीलंका की विजय थी। श्रीलंका के शासक को पूर्णरूपेण पराजित कर वह वहाँ से 12,000 व्यक्तियों को बंदी बनाकर अपने साथ लाया था।

बाद में उसने इन कैदियों तथा कुछ अन्य पराजित शासकों की सहायता से कावेरी नदी के मुहाने पर पुहार नामक पत्तन का निर्माण कराया। उसकी सिंहल - विजय प्रमाणित करती है कि उसके पास शक्तिशाली नौसेना भी थी। पुहारपत्तन के निर्माण कार्य में उसने जिन शासकों का सहयोग लिया था, उनमें त्रिनेत्रपल्लव भी शामिल था।


एक महान शासक तथा विजेता होने के साथ-साथ करिकाल तमिल साहित्य एवं ब्राह्मण धर्म का उदार संरक्षक था। उसने आर्थिक सुधारों पर भी ध्यान दिया और कृषि तथा व्यापार को काफी प्रोत्साहन प्रदान किया। उसने जंगली भूमि को अधिकृत कर उसे साफ कराया और सिचाई के लिए तालाबों आदि का निर्माण कराया।

उसने चोल राज्य में अन्य क्षेत्रों को स्थानांतरण करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। करिकाल एक न्याय प्रिय शासक था और प्रतिभोजों, सुरापान एवं स्त्रियों में अभिचि रखता था। निप्पल कविता के रचयिता अपने संरक्षित कवि को उसने 1,60000 सोने के सिक्के पुरस्कार के रूप में दिए थे। उसने परणर तथा कलल्लैयर नामक कवियों को भी संरक्षण प्रदान किया। करिकाल ने कावेरीपट्टनम् नगर का निर्माण करा कर उसे अपनी राजधानी बनाया।


चेर शासक सेंगुटटुवन तथा सिंहल के राजा गजबाहु से समकालीनता के आधार पर मुख्यतः करिकाल का राज्यकाल निर्धारित किया गया है।

टी. वी महालिंगम के अनुसार उसने 140 तथा 190 इ. के बीच के अंतराल में शासन किया। वह संगम युग का सबसे महान शासक था और तेलुगू क्षेत्र के कई परवर्ती राजवंश एवं राजाओं ने उसे अपना पूर्वज माना।



करिकाल के उत्तराधिकारी


करिकाल की मृत्यु के उपरांत चोल राज्य विघटित होकर अराजकता का शिकार हो गया। उसके दो पुत्र थे- मनक्किलल्लि तथा पेरुविरकिरल्लिा मनक्किलल्लि की राजधानी उरैयूर थी। उसका पुत्र नेन्दुकिल्लि तथा पौत्र पेरवरनर किल्लि था। पेरचर नर किल्लि था। पेरचर नर किल्लि के तीन पुत्र थे - 1. किल्लिवलवन 2. नलनकिल्लि, 3. मवलत्तना एस. के आयंगर के अनुसार करिकाल की मृत्यु के उपरांत उसका पुत्र या पौत्र नेडमुडिकिल्लि राजा हुआ।

उसने कारियारू नामक स्थान पर चेरों तथा पांड्यों को पराजित किया। उसी के शासनकाल में कावेरीपट्टिनम का विनाश हो गया था। करिकाल के उपर्युक्त उत्तराधिकारियों के विषय में बहुत कम सूचना मिलती है। चेरों के अभ्युदय काल में चोल राज्य की सीमाएँ काफी संकुचित हो गई थीं, किंतु वे अपनी स्वतंत्रता कायम रखने में प्रायः सफल रहे। पांड्यों तथा पल्लवों के उत्कर्ष के परिणामस्वरूप प्राचीन चोल राजवंशों की अवशिष्ट शक्ति तथा गरिमा समाप्त हो गई और नवीं शताब्दी के मध्य के लगभग विजयालय चोल के अभ्युदय तक उनका इतिहास अस्पष्ट अन्धकारमय तथा अनिश्चित है।