मौर्योत्तर काल : पांड्य वंश - Post-Mauryan Period: Pandya Dynasty

मौर्योत्तर काल : पांड्य वंश - Post-Mauryan Period: Pandya Dynasty


सुदूर दक्षिण के प्रारंभिक राजवंशों में पाइयों का महत्वपूर्ण स्थान था और वे संगम युग में चोलों के प्रमुख प्रतिद्वंदी थे। पांड्य राजवंश के इतिहास के तीन प्रमुख चरण है- 1. संगम युग के पांड्य, 2. कडुंगोन द्वारा स्थापित प्रथम पांड्य साम्राज्य 3. मारवर्मन सुंदर पांड्य प्रथम


द्वारा स्थापित द्वितीय पांड्य साम्राज्य


पांड्यों के प्राचीनतम उल्लेख हमें कात्यायन के वार्तिक ( ई. पू. चैथी शताब्दी) तथा मेगास्थनीज की इंडिका में प्राप्त होते हैं। मेगास्थनीज ने लिखा है कि पांड्य राज्य में सियाँ शासन करती थीं और उस समय वहाँ की शासिका हेराक्लीज की पुत्री पंडिया थी।

वह कुशल प्रशासिका थी। उसके राज्य में 365 ग्राम थे जो नियमित रूप से कर एवं भेटे देते थे। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में बतलाया गया है कि पांड्य जनपद की राजधानी मदु (मदुरई) नगर उत्तम वस्त्रों तथा बहुमूल्य मोतियों के उत्पादन एवं व्यापार के लिए प्रसिद्ध था। अशोक के शिलालेख दो में पांड्य राज्य को मौर्य साम्राज्य की दक्षिणी सीमा पर स्थित


जनपदों में शामिल किया गया है। रामायण तथा महाभारत में भी पांड्य राज्य के उल्लेख मिलते हैं। महाभारत में बतलाया गया है।


कि यह राज्य चंदन के लिए प्रसिद्ध था।


गुंफा अभिलेख के अनुसार पांड्यों को पराजित करने के उपरांत कलिंगराज खारवेल पांड्य राज्य से हाथी, घोड़े तथा बहुमूल्य मुक्तामणि ले गया था। परंतु इस युद्ध का ब्यौरा नहीं दिया गया है। ये हमें ज्ञात होता है कि दक्षिण में कोमारी (कन्याकुमारी) से लेकर कारकै तक का क्षेत्र पांड्य राज्य में सम्मिलित था। इस जनपद में प्रवाहित होने वाली ताम्रपर्णी नदी उत्कृष्ट मुक्ताओं के उत्पादन के लिए प्रसिद्ध थी। टालमी (लगभग 150 ई.) ने भी पांड्य राज्य तथा इसकी राजधानी मदुरा का उल्लेख किया है। स्ट्रैवो ने लिखा है कि पांड्य शासक ने रोम के सम्राट अगस्तस के राज दरबार में अपना दूतमंडल भेजा था।


पांड्य राज्य चोल राज्य के दक्षिण में स्थित था और इसके अंतर्गत मोटे और पर वर्तमान मदुरई,

तिरुनेलवेलि, रामनाथपुरम तथा तिरुचिरापल्ली जिलों के अतिरिक्त भूतपूर्व ट्रावनकोर राज्य का कुछ भू- भाग भी शामिल था। इसकी सबसे प्राचीन राजधानी कोरकाई (कोलकाई) थी। प्रथम शताब्दी में वैगई नदी के तट पर स्थित मदुरा (मदुरई) पांड्यों का शक्ति केंद्र बना 



प्राचीन अनुश्रुतियों तथा साहित्यिक साक्ष्यों में पांड्य शासक बदिमबलन- बनित्र का उल्लेख मिलता है जिसे मदुरई का शासक कहा गया है। पी. एन. चोपड़ा, एन. सुब्रमण्यम तथा टी. के रवीन्द्रन के अनुसार व्याकरण ग्रंथ तोल्काप्पिनम् की एक टीका में इसी राजा का मर्किति के नाम से उल्लेख हुआ है।

मदुरा के प्रारंभिक पांड्य शासकों में मुदुक्कुडुमिपेरुवलुदि उल्लेखनीय है। उसे महान विजेता, कवियों का आश्रयदाता तथा अनेक वैदिक यज्ञों को संपन्न करने वाला बतलाया गया है। उसके बाद के पांड्य राजाओं में मदिवननपोरके तथा इलमपेरुव के नाम मिलते है।


मागुडिमरुदन के मदुक्कंजि तथा कुछ अन्य साक्ष्यों में नेडियोन, पलशालइमुक्कुडुमि एवं डुजेलियन के उल्लेख हुए हैं। इनमें नेडियोन अर्थात् लंबे कद वाला के विषय मे प्रामाणिक सूचना का अभाव है। वेलविक्कुडि तथा शिन्नमनूर-ताम्रपत्रों में उसकी कुछ उपलब्धियों का विवरण प्राप्त होता है।

उसे पहरूलि नदी को उत्पन्न करने तथा समुद्र-पूजा को व्यवस्थित स्वरूप देने का श्रेय दिया गया है। वेलविक्कुडि-ताम्रपत्रों में पालशालैमुदुकुडुमि का प्रथम पांड्य शासक के रूप में उल्लेख हुआ है। उसने बहुत से यज्ञ संपन्न किए और इसीलिए पलशालड़ का विरुद धारण किया।


संगम युग के पांड्य शासकों में नेडुजेलियन सर्वाधिक शक्तिशाली था। वह अल्पायु में ही राजा बन गया था। संभवतः इसीलिए उसके शासक के प्रारंभ में चेरों तथा चोलों ने पाँच अन्य छोटे शासकों के साथ पांड्य य राज्य पर आक्रमण कर दिया।

नेडुजेलियन ने तलैयालंगानम (तिरुवालूर से लगभग 20 किलो मीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित) नामक स्थान पर इस शत्रु संघ का वीरता पूर्वक सामना किया, उन्हें पराजित कर मदुरा से खदेड़ दिया तथा तंजौर तक उनका पीछा किया। इस निर्णायक संघर्ष के प्रारंभ होने के पहले ही नेडुजेलियन ने चेर शासक शेय की बंदी बनाने की प्रतिज्ञा की थी। जिसे उसने पूरा भी किया। पांड्य साक्ष्यों में इस युद्ध को काफी महत्व दिया गया और कम से कम 10वीं शती तक के अभिलेखों में गर्व के साथ इसका वर्णन किया गया। नेडुजेलियन ने कोंगु प्रदेश के शासक अलियन तथा निडूर के राजा एव्वि के विरुद्ध भी सफलताएँ प्राप्त कीं। एव्वि को पराजित करने के उपरांत उसने मिललय एवं मुत्तू क्षेत्र अधिकृत कर लिए थे।


नेडुजेलियन स्वयं कवि था और मागुंडिमरुदन कल्लादनार तथा नक्कीरर उसके संरक्षित कवि थे। इन दरबारी कवियों ने पारंपरिक अतिशयोक्ति के साथ उसकी उपलब्धियों तथा महानता का वर्णन किया है। वह ब्राह्मण का अनुयायी था और उसने कई वैदिक यज्ञ संपन्न किए। उसने व्यापार को भी प्रोत्साहन प्रदान किया। मदुरैक्कांजि में नेडुजेलियन के शासन काल में पांड्यों की राजधानी मदुरा के वैभव एवं गरीमा का विस्तृत विवरण है।


नेडुजेलियन ने चोल करिकाल तथा कांची के शासकइलं दिरैयन के राज्य काल के बाद में शासन किया। नेडुजेलियन नाम के एक से अधिक पांड्य शासक थे। इसलिए इस नेडुजेलियन को तलैयालगनातच्चेरुवेन (तलैयालगानम के युद्ध का विजेता) कहा गया है।

उसी के शासन काल में कण्णगी के निर्दोष पति कोवलान को मृत्यु दंड दिया गया था जिसका विस्तृत तथा रोमांचकारी विवरण शिलप्पदिकारम् काव्य में मिलता है। जब उसे अपने इस अक्षम्य अपराध की जानकारी प्राप्त हुई तो उसने शोक संतृप्त होकर दम तोड़ दिया।


डुजेलियन का छोटा भाई वेरिवरशेलिय कोरकै में शासन कर रहा था। नेडुजेलियन की मृत्यु के पश्चात् वह मदुरा का भी राजा बन गया और उसने कोवलान की पतिव्रता पत्नी कण्णगी के सम्मान में एक उत्सव का समारंभ किया। वह चेर शासक सेंगुटटुवन का समकालीन था। चूँकि भित्ति चित्रों को देखने के दौरान उसकी मृत्यु हुई थी, इसलिए वह चित्तिरमदत्तुतुं जियवरमरन के नाम से भी प्रसिद्ध हुआ। ननभरन की उपाधि उसने संभवतः मदुरा का शासक होने के उपरांत धारण की थी।