राजपूत काल में साहित्य के क्षेत्र में प्रगति - Progress in the Field of Literature in Rajputa Age
राजपूत काल में साहित्य के क्षेत्र में प्रगति - Progress in the Field of Literature in Rajputa Age
राजपूत काल में साहित्य के क्षेत्र में भी पर्याप्त उन्नति हुई। राजपूत शासकों ने विभिन्न कवियों एवं साहित्यकारों को प्रश्रय दिया। कुछ राजपूत नरेश स्वयं ही उच्चकोटि के विद्वान थे। इनमें परमार वंश के शासक मुंज तथा भोज का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। भोजराज मुंज एक उच्चकोटि का कवि था। उसकी राजसभा में ‘नवसाहसांकचरित' के रचयिता पद्मगुप्त एवं दशरूपकम् के रचयिता धनंजय निवास करते थे।
राजाभोज - मालवा के परमार राजा भोज ने साहित्य के क्षेत्र में अमिट योगदान दिया। उसका शासन काल 1000 से 1055 ई. तक था।
एक विजेता के साथ-साथ भारतीय इतिहास में राजा भोज की ख्याति उसकी विद्वता एवं कला तथा विद्या के उदार संरक्षक के रूप में अधिक है। उसने खड्क और लेखनी दोनों से कीर्ति लिखी। रणक्षेत्र में यदि वह एक तलवार का धनी था तो शांति काल में वह कलम का सिपाही था। उदयपुर प्रशस्ति में उसे 'कविराज' कहा गया है। उसकी राजधानी धार नगर कला, साहित्य एवं विद्या का एक प्रमुख केंद्र बन गई थी। स्वयं राजा भोज समस्त शास्त्र, समस्त कला एवं विज्ञान के ज्ञाता थे। कल्हण के अनुसार, "कश्मीर राजा कलश एवं मालवा नरेश भोज दोनों मित्र थे।" आइन-ए-अकबरी में अबुल फजल ने लिखा है, "भोज ज्ञान का आदर करता था, विद्वानों का सम्मान करता था एवं ज्ञानपिपासुओं की सहायता कर उन्हें प्रोत्साहन देता था।"
राजा भोज ने स्वयं ही संस्कृत के महत्वपूर्ण ग्रंथ लिखे। इनमें शृंगार प्रकाश प्राकृत व्याकरण, कूर्मशतक, शृंगार मंजरी, भोज चंपू कृत्यकल्पतरु, तत्वप्रकाश, शब्दानुशासन एवं सरस्वती कंठाभरण व राजमृगांक का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। स्वयं विद्वान तो था ही उसने विद्वानों को भी संरक्षण दिया। राजा भोज के दरबार में भास्कर भट्ट, दामोदर मिश्र, धनपाल आदि को प्रश्रय प्राप्त था। पद्यगुम् धनिक, धनंजय, हलायुध एवं मेरुतंग आदि सभी विद्वानों ने राजा भोज के प्रभा मण्डल को प्रकाशित किया था।
राजा भोज विद्वानों को उनकी विद्वता से प्रभावित होकर पुरस्कार एवं उपाधियाँ देता था।
वह इतना बड़ा दानी था कि उसके नाम से यह अनुश्रुति प्रचलित थी कि राजा भोज हर श्लोक पर एक लाख मुद्राएँ प्रदान करता था।'
राजा भोज ने धार सरस्वती मंदिर में एक प्रसिद्ध संस्कृत विद्यालय की स्थापना कराई। राजपूत काल में साहित्य एवं विद्या के संरक्षक के रूप में राजा भोज की कीर्ति सदैव अमर रहेगी। एक प्रसिद्ध लोकोक्ति के अनुसार राजा भोज की मृत्यु पर विद्वानजन शोक मग्न हो गए थे। इस श्लोक में लिखा है- अद्यधारा निराधारा, निरालंबा सरस्वती । पण्डिता: मण्डिताः सर्वे भोजराजे दिवंगते।
अर्थात् राजा भोज की मृत्यु पर धार नगरी की धारा समाप्त हो गई, सरस्वती अर्थात् विद्या निराश्रित हो गई, समस्त विद्वान शोक मग्न हो गए।
अन्य साहित्य
राजा भोज की भाँति तो नहीं, परंतु उसके कुछ कम सही कुछ अन्य राजपूत शासकों ने भी साहित्य सृजन एवं साहित्य के उन्नयन में पर्याप्त योगदान दिया। कुछ प्रमुख राजा एवं उनके द्वारा रचित
ग्रंथ निम्नवत् है।
शासक
रचना
विग्रहपाल बीसलदेव चौहान
बल्लाल सेन अमोघ वर्ष (राष्ट्रकूट)
हरिकेलि नाटक
दानसागर एवं अदभुत्सागर कविराजमार्ग प्रश्नोत्तरमालिका
सोमेश्वर तृतीय (चालुक्य)
मानसोल्लास
इन राजाओं के अलावा भी राजपूत काल में कई प्रमुख विद्वानों ने इतिहास प्रसिद्ध साहित्य का
सृजन किया।
विद्वान
कविराज
श्रीहर्ष
कृति
काव्य-
राघव पाण्डीय
नैषधीयचरित्
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