प्रमुख स्त्री भक्त कवयित्रियाँ / प्रमुख स्त्री भक्त कवयित्रियों का परिचय - Prominent female devotee poets / Introduction to prominent female devotee poets
प्रमुख स्त्री भक्त कवयित्रियाँ / प्रमुख स्त्री भक्त कवयित्रियों का परिचय - Prominent female devotee poets / Introduction to prominent female devotee poets
हिंदी की स्त्री भक्त कवयित्रियों को निम्नलिखित कोटियों में वर्गीकृत कर अध्ययित किया जा सकता है-
राजघरानों से जुड़ी स्त्री भक्त कवयित्रियाँ
मध्यकाल के स्त्री-लेखन का काफी बड़ा हिस्सा वह है, जो राजघरानों से जुड़ी कवयित्रियों द्वारा लिखा गया है। ये स्त्री कवयित्रियाँ भक्ति भाव या भक्ति-संवेदना से संचालित हैं। इन्हें भक्त कवयित्री कहा जाता है। राजघरानों से जुड़ी कवयित्रियों की रचनाएँ अधिकांशतः कृष्ण भक्तिपरक हैं। इनमें कुछ ही रामभक्ति काव्यधारा से जुड़ी दिखाई देती हैं। इस संबंध में डॉ. सुनीता गुप्ता का यह कथन उल्लेखनीय है, “मध्यकाल की स्त्री रचनाकारों ने कृष्ण को राम से अधिक अपने निकट पाया। इस पर उस स्त्री लोकमानस का प्रभाव माना जा सकता है, जो राम को अग्नि परीक्षा और सीता वनवास के लिए क्षमा नहीं कर पाया। इसके विपरीत कृष्ण के चरित्र ने स्त्रियों को अधिक आकृष्ट किया। कृष्ण के व्यक्तित्व में स्त्री ने अपने को सुरक्षित पाया। वे अत्याचारियों का दमन करने वाले हैं,
लोकरक्षक भी हैं और स्त्रियों के सखा भी हैं।" राजघरानों से जुड़ी स्त्री भक्त कवयित्रियों में ये प्रतिभाएँ प्रमुख हैं- मीरा बाई (संवत 1573), चंपा दे (संवत 1650), छत्र कुंवर बाई (संवत 1715), रानी बख्त कुंवरि (संवत 1734), ब्रजदासी रानी बांकावती (सं. 1760), प्रतापबाला (सं. 1813), सुंदरीकली (सं. 1900 से पूर्व), प्रताप कुंवर बाई (सं. 1900 से पूर्व), बाघेली विष्णुप्रसाद कुंवरि (सं. 1903), जुगलप्रिया (सं. 1900), रत्नकुंवर बाई (सं. 1900), तुलछराय, रघुवंश कुमारी, रघुराज कुंवरि आदि.
संत कवयित्रियाँ
संत कवयित्रियों में पाँच कवयित्रियों का नाम प्रमुखता से लिया जाता है- उमा, पार्वती, दयाबाई, वीरा और सहजोबाई ।
सामान्य घरों की स्त्री कवयित्रियाँ
राजघरानों से अलग सामान्य घरों की स्त्रियों ने भी बड़ी संख्या में काव्य-रचना के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। ये स्त्रियाँ समाज के विभिन्न वर्गों से संबंधित रही हैं।
इन कवयित्रियों में ये प्रमुख हैं- गंगाबाई, विट्ठल गिरधरन (विट्ठलदास की शिष्या सं. 1600 के आस-पास), रत्नावली (तुलसीदास की पत्नी सं. 1613), अलबेली अली, रूपमती बेगम (सं. 1637), प्रवीण पातुर राय (सं. 1650), इंदुमती (सं. 1700), ताज (सं. 1700), तुलछराय, रत्नकुंवरि बीबी, कविरानी चौबे, शेख आलम रंगरेजन (सं. 1753), साई (सं. 1770), वीरां (सं. 1800), रसिक बिहारी/बनी ठनी (सं.1800), सुंदरकली (सं. 1900), कृष्णावती (सं. 1900), चंद्रकला (सं. 1900), माधवी आदि.
चारण कवयित्रियाँ
चारण कवयित्रियों में इनके नाम प्रमुखता से लिए जाते हैं- झीमा चारिणी (सं. 1460), पद्मा चारिणी (सं. 1654), बिरजू बाई (1743) आदि। भक्ति आंदोलन से जुड़ी कुछ प्रमुख कवयित्रियों का संक्षिप्त परिचय इस प्रकार दिया जा सकता है-
1.मीरा बाई
मीराबाई कृष्ण भक्ति शाखा की सर्वश्रेष्ठ कवयित्री मानी जाती हैं। मीरा का जन्म संवत् 1573 में जोधपुर राजस्थान के चौकड़ी गाँव में हुआ था। मीरा का विवाह उदयपुर के महाराणा कुमार भोजराज के साथ हुआ था। विवाह के कुछ ही समय बाद इनके पति का देहांत हो गया था। किंतु परंपरानुसार मीरा ने पति की चिता के साथ सती होने से मना कर दिया। यह मीरा का विद्रोह था।
मीरा ने इन चार ग्रंथों की रचना की थी- 1. नरसी का मायरा, 2. गीतगोविंद टीका, 3. राग गोविंद 4. राग सोरठ के पदा संपूर्ण भक्ति आंदोलन में मीराबाई का स्थान सर्वोपरि माना जाता है। डॉ. जगदीश्वर चतुर्वेदी ने लिखा है, "इस दौर की सबसे महत्वपूर्ण कवयित्री होने के कारण मीराबाई का स्थान सबसे ऊपर है। निजी जीवन के अनुभवों एवं अनुभूतियों की सघन अभिव्यक्ति उनकी कविता में मिलती है। इनके काव्य में अपूर्व भाव-विह्वलता और आत्मसमर्पण का भाव है। इसी के कारण उनकी चारों ओर लोकप्रियता बढ़ी।
मीराबाई की सबसे उल्लेखनीय विशेषता है, उनके व्यक्तित्व में परंपर विरोधी गुणों और प्रवृत्तियों का समाहार। इस विशेषता ने उन्हें सबका प्रिय बना दिया। डॉ. सुनीता गुप्ता ने मीरा की इस विशेषता पर प्रकाश डालते हुए लिखा है, “मीरा का व्यक्तित्व समूचे मध्यकालीन परिवेश में अपनी विलक्षण आभा से चमत्कृत करता है। मीरा का संघर्ष, उनकी अपराजेयता, निर्भयता व उनका साहस अद्भुत है। उनमें परस्पर विरोधी गुणों का सहज व विलक्षण समाहार दिखलाई पड़ता है- एक तरफ भक्ति-विह्वलता तो दूसरी तरफ अपराजेय जीवन-संघर्ष, एक तरफ मिलन कातरता तो दूसरी तरफ निर्भयता, एक तरफ उनका निश्छल समर्पण है, तो दूसरी तरफ अद्भुत साहस- ये सारी चीजें मीरा के व्यक्तित्व में एकाकार हो गई हैं।"
मीरा धार्मिकता के आवरण में पितृसत्ता का विरोध करने वाली कवयित्री की प्रतीक रही हैं। भक्ति के सहारे स्त्री चेतना और स्त्री- अस्मिता की अभिव्यक्ति मीरा ने सबसे सशक्त ढंग से की. इस संबंध में मीरा को लक्ष्य कर डॉ. शहनाज़ बानो लिखती हैं, “ये वे कवयित्रियाँ हैं,
जिन्होंने अनौपचारिक और घरेलू माहौल में भक्तिपरक रचनाएँ कीं। इन्होने स्त्री चेतना और स्त्री अस्मिता की अभिव्यक्ति के लिए 'भक्ति' का सहारा अधिकतर प्रसंगों में लिया। पितृसत्ता का विरोध धार्मिकता के आवरण में ये कवयित्रियाँ करती हैं। सामाजिक विभेद और स्त्री की अधिकार-हीनता के विरोध के लिए 'भक्ति' साधन बनी।”
मीरा भक्तिकाल की एक ऐसी कवयित्री हैं, जिनका प्रभाव एवं स्मृति समय की सीमाएँ लाँघकर चली हैं। वे आज इतने लंबे समय के पश्चात् भी न केवल साहित्य अपितु लोक की परंपरा में भी निरंतर लोकप्रिय रही हैं। मीरा की हैसियत ठीक वैसी है, जैसी कबीर की है। डॉ. सुमन राजे ने यह ठीक ही लिखा है, “हिंदी प्रदेश के एक हजार वर्षों के इतिहास में जिस तरह कबीर अकेले हैं, उसी तरह मीराबाई भी दूसरी नहीं हैं।"
उदाहरण के रूप में मीरा का यह पद उल्लेखनीय है-
बसो मेरे नैनन में नन्दलाला
मोहिनी मूरत, साँवरि सुरत, नैना बने बिसाल || अधर सुधारस मुरली राजति, उर बैजन्ती माला क्षुद्र घंटिका कटि-तट सोभित, नूपुर सबद रसाल। मीरा प्रभु संतन सुखदाई, भक्त बछल गोपाला।
2. ताज
मीरा के बाद विद्रोहिणी कवयित्री के रूप में ताज का नाम सबसे ऊपर आता है। ये मुसलमान थीं, कृष्ण की भक्त थी। मुसलमान होकर भी कृष्ण का भक्त होना ही एक तरह का विद्रोह है। ताज लेकिन बीवी ने पद तो लिखे ही पदों के अलावा बीवी बाँदी का झगरा' तथा 'बारहमासा' भी उनकी कृतियाँ मानी जाती है। ताज ने धर्म, जाति, कुल, वंश सबकी सीमाओं से ऊपर उठकर कृष्ण भक्ति में डूबने का उदाहरण प्रस्तुत किया। वह मुसलमान होकर भी परम वैष्णव थीं। पता नहीं धर्म परिवर्तन उन्होंने किया या नहीं,
लेकिन यह निश्चित है कि कृष्ण-भक्त हिंदू होना उन्हें अत्यंत प्रिय था। डॉ. शहनाज बानो ने लिखा है, “उनके लिए लोक और शास्त्र व्यर्थ था। मध्यकालीन धार्मिक संकीर्णताओं तथा सामाजिक बंधनों का अतिक्रमण ताज ने जिस रचनात्मक ढंग से किया है, वह उल्लेखनीय है।"
उदाहरण के लिए ताज की एक रचना प्रस्तुत है- सुनो दिलजानी, मेरे दिल की कहानी तुम दस्त ही बिकानी, बदनामी भी सहूँगी मैं। देव पूजा ठानी, मैं निवाजी हूँ भुलानी, तजे कलमा कुरान साढ़े गुनान गहूंगी मैं।। स्यामला सलोना सिर ताज कुल्ले दिए। तेरे नेह दाग में निदाघ है दहूंगी मैं। नन्द के कुमार कुरबान तोरी सूरत पै त्वाद नाल प्यारे हिंदुवानी है रहूंगी में।
3. दयाबाई
दयाबाई संत चरणदास की शिष्या थीं। ये निर्गुण संत कवयित्री थीं। दयाबाई की रचनाएँ अत्यंत भावप्रवण और प्रभावपूर्ण हैं। इनके प्रमुख विषय हैं- ज्ञान, ब्रह्म,
विनय, उपदेश, गुरु-महिमा, प्रेम इत्यादि । गुरु की महिमा का अत्यंत विस्तृत वर्णन इन्होंने किया है। दया बाई की दो प्रमुख रचनाएँ उपलब्ध हैं- 'दयाबोध' तथा 'विनयमलिका । प्रभु के प्रति प्रेम तथा विनय की भाव विह्वलता सर्वत्र उनमें मिलती है। प्रेम के साथ ज्ञान का भी महिमापूर्ण वर्णन इन्होंने किया है। डॉ. सुनीता गुप्ता ने यह ठीक ही लिखा है- “दयाबाई की रचनाओं में अनुभूति की गहराई व ज्ञान की गंभीरता दोनों का सुंदर समन्वय हुआ है।" उदाहरण के लिए दयाबाई का एक छंद प्रस्तुत है-
ज्ञान रूप की भयौ प्रकास,
भयौ अविद्या तम की नासा
सूझ परत निज रूप अभेद
सजै मिट्यो जीव को खेदा।
4.सहजोबाई
सहजोबाई भी संत चरणदास की शिष्या थीं। ये दयाबाई की चचेरी बहन थीं। इन्होंने दोहा, चौपाई इत्यादि छंदों में रचनाएँ लिखीं। इन्होंने छंदों में कहीं-कहीं रागों का भी अनुपालन किया है। सहजोबाई की एक ही रचना उपलब्ध है- सहजप्रकाश'.
सहजोबाई की रचनाएँ अनुभूति/ भाव के स्थान पर ज्ञान तत्व से ओत-प्रोत हैं। सहजोबाई भी चूँकि निर्गुणवादी संत कवयित्री थीं इसलिए उनकी काव्यवस्तु भी दयाबाई की जैसी ही है। सहजोबाई का गुरु महिमा से संबंधित एक छंद चौपाई) यहाँ प्रस्तुत है-
राम तजू पै गुरु न बिसाएँ।
गुरु के सम हरि कूँ न निहारूं।।
चरनदास पर तन मन वारूं।
गुरु न तजूं हरि कूँ तजि डारू।।
5. रसिक बिहारी / बनी ठनी
रसिक बिहारी उर्फ बनी ठनी नागरीदास की दासी थीं। इनकी रचनाएँ नागर समुच्चय' में संकलित हैं। बनी ठनी कृष्ण की भक्त थीं। इनकी रचनाएँ माधुर्य से भरी हुई हैं। कृष्ण की विविध लीलाएँ, जन्मोत्सव, पनघट लीला, राधा-कृष्ण का प्रेम, प्रेमावेग, परकीया भाव, रति-चेष्टाएँ, होली इत्यादि इनके प्रिय विषय हैं। स्त्री की व्यापक-शारीरिक एवं वैयक्तिक अनुभूतियों का चित्रण बनी ठनी के काव्य की विशेषता है। इस संबंध में डॉ जगदीश्वर चतुर्वेदी ने लिखा है, "स्त्री के शारीरिक एवं वैयक्तिक अनुभूतियों के प्रति आग्रह वस्तुतः प्रगतिशील दृष्टिकोण को व्यक्त करता है।"
बनी उनी की कविताएँ अत्यंत ही भावप्रवण हैं। उनकी कविताएँ कृष्ण प्रेम से ओत-प्रोत हैं। कृष्ण के प्रति उन्मुक्त प्रेम कवयित्री बनी ठनी के अपने स्वयं के उन्मुक्त व्यक्तित्व की सूचना देता है।
बनी उनी की भक्ति का स्वरूप शृंगारपरक है, जिसमें मिलन, विरह, उत्सव, उल्लास, प्रकृति - उत्फुल्लता इत्यादि की प्रधानता दिखाई देती है। राधा-कृष्ण का शृंगारपरक मनोरम वर्णन बनी ठनी में प्रकृष्ट रूप में मिलता है। बनी ठनी के छंदों में राधा और सखियों के माध्यम से स्त्री-जीवन के राग-रंग अभिव्यक्त हुए हैं।
बनी ठनी की सबसे बड़ी उल्लेखनीयता यह है कि उन्होंने 'लली' (लड़की) के जन्म पर बधाई का चित्रण किया है। इस संबंध में डॉ सुनीता गुप्ता ने लिखा है, “मध्यकाल की समूची स्त्री-कविता पुत्र- जन्म में उल्लास से भरी पड़ी है, किंतु बनी ठनी जी लली के जन्म की बधाई को चित्रित करती हैं। कई पदों में वे राधा के जन्म और बधाई तथा उल्लास का वर्णन करती हैं।" इस संबंध में उन्होंने राधा के जन्म संबंधी यह पदांश भी उद्धृत किया है-
आज बरसाने मंगल गाई।
कुँवरलली को जन्म भयौ है घर-घर बाजत बधाई।।
6. शेख आलम रंगरेजन
शेख की कविताएँ ‘आलम केलि' में संकलित हैं। शेख मुस्लिम रंगरेजिन थीं जो कपड़े रंगकर जीवन-यापन करती थीं। शेख की कविता में शृंगार रस की प्रधानता है। परकीया प्रेम और विरहानुभूति इनके काव्य में बहुतायत से हैं। मांसलता अथक शारीरिक प्रेम उनके यहाँ प्रबल है। विरह की अवस्था में आध्यात्मिकता के सहारे जीने की धारणा का शेख ने खंडन किया है। अपने प्रिय से मन की बजाय शारीरिक रूप में मिलना इन्हें ज्यादा प्रिय है।
शेख आलम का यह एक छंद जिसमें उन्होंने कृष्ण की बाल छवि एवं बाल जीवन का सुंदर
बीस विधि आऊँ दिन बारीये न पाऊँ और,
नेकु फिरि ऐहै केह देरी है जसोदा मोहि,
वर्णन किया है, यहाँ उदाहरणार्थ प्रस्तुत है- याही काज वाही घर बांसनि की बारी है। मो पै हठि माँगै बसी और कहूँ डारी है। झारी गारिहाइनु की सीखे लेतु गारी है। संग लाइ भैया नेकु न्यारो न कन्हैया कीजै बलन बलैया लैकै मैया बलिहारी है।।
'ख' कहै तुम सिखवौ न कछु राम याहि
7. रत्नावली
प्रसिद्ध कवि तुलसीदास की पत्नी रत्नावली भक्ति आंदोलन की प्रमुख कवयित्रियों में से एक मानी जाती हैं। रत्नावली की दो रचनाएँ पाई जाती हैं- 'रत्नावली लघु दोहा संग्रह तथा दोहा रत्नावली'. रत्नावली ने अधिकतर आत्मकथात्मक पद लिखा है। इनमें उनके निजी जीवन की पीड़ा ओर-
पोर भरी पड़ी है। एतत्संबंधी उनका एक काव्यांश यहाँ उद्धृत है- हाय बदरिका बन भई, हों वामा विष बेलि
रत्नावलि हों नाम की, रसहि दियो बिस मेलि।। दीनबंधु कर घर पली दीनबंधु कर छांहा
तऊ भाई हौं दीन अति, पति त्यागी मों बांह।
सनक सनातन सुकुल कुल, गेह भयो पिय स्यामा रत्नावलि आभा गई, तुम बिन बन सम गामा।
भक्ति आंदोलन और स्त्री: विभिन्न विमर्श भक्ति आंदोलन की विभिन्न धाराओं / शाखाओं में स्त्री के विषय में विविध प्रकार का विचार-
चिंतन हुआ है। इस चिंतन एवं विमर्श में परस्पर पर्याप्त अंतर है। इस पूरे विमर्श को निम्नलिखित बिंदुओं में संग्रथित किया जा सकता है-
1. निर्गुण भक्ति धारा में स्त्री संबंधी विमर्श
इसे पुनः दो उपविभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
(1) संत भक्ति-धारा में स्त्री-विमर्श
(2) सूफी भक्ति-धारा में स्त्री-विमर्श
2. सगुण भक्ति धारा में स्त्री संबंधी विमर्श
इसे भी दो उपविभागों में वर्गीकृत किया जा सकता है-
(1) कृष्ण भक्ति-धारा में स्त्री-विमर्श
(2) राम भक्ति-धारा में स्त्री-विमर्श
इन चारों धाराओं के स्त्री-विमर्श पर संक्षेप में निम्नानुसार अलग-अलग विचार किया जा सकता
(1) संत भक्ति-धारा
संत कवि स्त्री को विभिन्न रूपों में चित्रित करते हैं। इनमें से कुछ प्रशंसनीय हैं तो कुछ
निंदनीय हैं।
प्रशंसनीय रूप ये हैं-
1. पतिव्रता स्त्री
2. सती
3. दांपत्य में समर्पित स्त्री
निंदनीय रूप ये हैं-
1. स्त्री कामिनी
2. मायारूपिणी स्त्री
संत कवि पतिव्रता, सती तथा दांपत्य में समर्पित स्त्री की प्रशंसा करते नहीं अघाते। लगभग समस्त संत कवि-कवयित्रियों का यही दृष्टिकोण है। वे सच्ची स्त्री उसी को मानते हैं, जो पातिव्रत का ईमानदारी से पालन करती है, और हर हाल में पति की आज्ञा का पालन करती है।
यदि ऐसी स्त्री कुरूप हो, तो भी सुंदर कहलाने योग्य है। कबीर, दादू नानक, रैदास, शेख फरीद, चरणदास, आदि समस्त संत कवियों का यही विचार है। जो स्त्री पतिव्रता नहीं है, वह निंदनीय है। संत कवियों ने पतिव्रता स्त्री पर अलग से वर्गीकृत करके साखियाँ लिखी हैं। उदाहरण के लिए दादू की ये साखियाँ प्रस्तुत हैं -
पतिव्रता ग्रह आपने करे खसम की सेवा
ज्यों राखै त्यों ही रहै. आज्ञाकारी देव।।
दादूनीच ऊंच कुछ सुन्दरी, सेवा सारी होइ। सोइ सुहागिन कीजिए, रूप न पीजै घोड़ा।
इसी प्रकार सती की प्रशंसा करते संत कवि नहीं अघाते। पतिव्रत की चरम स्थिति सतीत्व है। संत सतीत्व को साधना का आदर्श मानते हैं। एक प्रकार से संत कवि सतीत्व को एक प्रतीक या रूपक या दृष्टांत के रूप में ही लेते हैं, जो साधना के चरम आदर्श का
प्रतीक प्रतिरूप है। कबीरदास कहते हैं कि जिस तरह सती अपने मन में तन-मन से प्रियतम को समर्पित होने का सुनिश्चय कर घर से निकलती है, उसी प्रकार साधक को भी हरि की भक्ति में लीन हो जाना चाहिए-
सती जलन कूँ नीकली, चित धरि एकबमेखा
तन मन सौंप्या पीव कूं, अंतर रही न रेख ।।
इसी प्रकार संत साहित्य में दांपत्यभाव भी आत्मा-परमात्मा के संबंधों के वाचक के रूप में प्रचलित रहा है। संत कवियों ने परमात्मा के प्रति अपने समर्पण को अपने पति के प्रति एक स्त्री के प्रेमाकुल समर्पण के समान और परमात्मा से दूर होने की वेदना को एक स्त्री की विरह-वेदना के जैसा निरूपित किया है। संत आत्मा को स्त्री पत्नी तथा परमात्मा को पति के रूप में चित्रित करते हैं। यहाँ भी संरचना वही परंपरावादी है, जिसमें स्त्री पुरुष का मुँह जोहती रहती है। इस संबंध में कबीर की यह साखी द्रष्टव्य है-
कबीर सुन्दरि यों कहै, सुणि हौ कन्त सुजाण ।
बेगि मिलौ तुम आइ करि, नहिं तर तज पराण।।
कामिनी तथा मायारूपिणी स्त्री संत कवियों की दृष्टि में भारी निंदनीय है। कामिनी के रूप में प्रकारांतर से संत कवि देहवाद का निषेध करते प्रतीत होते हैं। इसे प्रगतिशील दृष्टिकोण माना जा सकता है। धार्मिक प्रतीकवाद की यह अवधारणा प्रकारांतर से स्त्री-सौंदर्य के प्रतिमानों पर भी नए सिरे से विचार करने के लिए उत्प्रेरित करती है। इस अवधारणा के तहत कमनीयता या कामुकता स्त्री-सौंदर्य के मापदंड नहीं हैं। मूलतः ये पुरुषवादी पैमाना है।
(2) सूफ़ी भक्ति धारा
सूफी भक्ति धारा में स्त्री को अपेक्षाकृत अधिक महत्व का स्थान प्राप्त है। यद्यपि यहाँ भी वस्तुस्थिति से ज्यादा रूपकात्मकता की ही स्थिति है; किंतु यह अपेक्षाकृत बेहतर स्थिति है।
यह स्थिति यह है कि यहाँ स्त्री को आत्मा का नहीं, परमात्मा का प्रतीक-स क-रूपक बनाया गया है। यह अन्य भक्ति- धाराओं से एकदम उलट स्थिति है। अन्य लगभग समस्त भक्ति प्रणालियों में पुरुष की प्रधानता है। पुरुष ही वहाँ ईश्वर का प्रतीक है। स्त्री उसकी दासी या सेविका या आज्ञाकारिणी या अनुगामिनी है। स्त्री को अधिकांश भक्ति-संप्रदायों में आत्मा का प्रतीक कहा गया है, जो अप्रधान या दोयम है। सामाजिक संरचना की प्रकृति के अनुरूप भक्ति परंपरा में भी स्त्री समान और स्वतंत्र नहीं है। इस दृष्टि सेदेखा जाए तो सूफी काव्य श्लाघ्य और प्रशंसनीय है कि वहाँ उसे परमात्मा का प्रतीक बनाकर उसे सर्वाधिक महत्व प्रदान किया गया है। इस संबंध में डॉ शहनाज बानो का यह कथन उद्धरणीय है- “सूफी काव्य में प्रेमाभिव्यंजना के व्यापार में ईश्वर को हमेशा 'स्त्री' का रूपक दिया गया। सूफी प्रेमाख्यानों में इसी प्रकार के ऐसे अनेक प्रसंग मिलते हैं, जिनमें स्त्री को महत्ता एवं उत्कृष्ट स्थान दिया गया है।” सूफी कवि जायसी इस संदर्भ में निर्गुण भक्ति की परंपरा में स्त्री को महत्व का स्थान देने वाले सबसे गंभीर कवि के रूप में सामने आते हैं। जायसी स्त्री की पराधीनता की स्थिति का भी दुःख के साथ वर्णन करते हैं तथा इस संबंध में पुरुष प्रभुत्व को चुनौती भी देते हैं।
(3) कृष्ण भक्ति-धारा
भक्तिकाल के कवियों में कृष्ण भक्ति धारा के कवि स्त्री की स्वतंत्र स्थिति का निरूपण करते हैं। रासलीला के रूपक के माध्यम से यह स्वतंत्रता एवं स्वच्छंदता सामने आई है। सूरदास तथा अन्य कृष्ण भक्त कवियों ने स्त्री की इस स्वतंत्रता का वर्णन किया है। राधा तथा गोपियाँ इसकी प्रतिनिधि हैं।
कृष्ण भक्ति धारा में भी स्त्री का निरूपण कई रूपों में हुआ है। इनमें तीन रूप सर्वप्रमुख हैं- पतिव्रता स्त्री, मातृरूपा स्त्री तथा सखी / प्रेमिका रूप स्त्री।
इन तीनों में सबसे उल्लेखनीय और कृष्ण भक्ति धारा की पहचान स्त्री का सखी या प्रेमिका का रूप है, जो स्त्री की स्वतंत्रता और निर्बंधता का सूचक है। सूरदास ने मुक्त हृदय से स्त्री की इस निर्बंधता का निरूपण किया है। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी ने इस संबंध में लिखा है
कि घर के बंधन को तोड़कर बाहर निकलने की आकांक्षा का जैसा सहज, स्वाभाविक और मार्मिक चित्रण सूरदास के यहाँ है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।"
सूरदास में राधा परम ब्रह्म की आराध्या के रूप में मान्य है। स्वयं परम ब्रह्म राधा की आराधना करते हैं। इसे सूफी काव्य के साथ तुलना करके देखा जाना दिलचस्प होगा। कृष्ण भक्ति धारा में राधा- 'भाव' एक पारिभाषिक प्रत्यय की भाँति प्रयुक्त होता है। गोपियाँ ईश्वर की आह्लादिनी शक्तियों के रूप में मानी जाती हैं। सूरदास के अतिरिक्त अन्य कृष्ण भक्त कवि भी स्त्री का इसी रूप में चित्रण करते हैं।
12345(4) राम भक्ति-धारा
राम भक्ति काव्य धारा में स्त्री के संबंध में लगभग वही बातें रखी गई हैं जो उक्त तीनों धाराओं में आ चुकी हैं। तुलसीदास अपने काव्य में स्त्री की पराधीनता का सहानुभूतिपूर्वक वर्णन अवश्य करते हैं, लेकिन अंततः वे वर्णाश्रम धर्म की स्थापना करते देखे जाते हैं। तुलसीदास ने पीड़ा के साथ स्त्री की पराधीनता का इस प्रकार वर्णन किया है-
कत बिधि नारि सृजी जग मांही। पराधीन सपनेहूँ सुख नाहीं।।
अन्य भक्त कवियों की भाँति राम भक्ति धारा के कवि भी स्त्री के कामिनी रूप की भर्त्सना करते हैं तथा उसके पतिव्रता रूप का गुणगान करते हैं। कामिनी रूप की भर्त्सना को देहवाद का निषेध माना जा सकता है।
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