पुलकेशिन- प्रथम - Pulakeshin - I
पुलकेशिन- प्रथम - Pulakeshin - I
पुलकेशिन - प्रथम (550-66 ई.) चालुक्य राजवंश का पहला महान शासक था । उनका पोलिकेशिन तथा पुलिकेशन के नाम से भी उल्लेख हुआ है। फ्लीट ने पुलकेशिन शब्द के दो भाग किए हैं। उसने प्रथम भाग 'पुल' को कन्नड़ तथा दूसरे भाग 'केशिन' को संस्कृत मानकर इसका अर्थ 'व्याघ्र के बालों वाला' बताया है, किंतु नीलकंठ शास्त्री दोनों भागों को संस्कृत का शब्द मानकर पुलकेशिन का अर्थ 'महान शेर' मानते हैं। पुलकेशिन प्रथम का पूरा नाम सत्याश्रय श्री पुलकेशी वल्लभ महाराज था। इनमें वल्लभ एक विरुद था, जिसे इस राजवंश के सभी शासकों ने धारण किया। कुछ राजाओं ने पृथ्वीवल्लभ नामक उपाधि धारण की, जिसका अर्थ पृथ्वी का पति होता है। कुछ परवर्ती शासकों ने सत्याश्रय नामक उपाधि भी धारण की।
बादामी में एक चट्टान पर उत्कीर्ण एक अभिलेख से विदित होता है कि 543-44 ई. तक चालुक्य वल्लभेश्वर ने वातापी के दुर्ग की किलेबंदी पूरी कर ली थी। चालुक्य वल्लभेश्वर के विषय में इस अभिलेख में उल्लिखित है कि उसने अश्वमेध सहित कई यज्ञ संपन्न किए। नीलकंठ शास्त्री का मत है कि चालुक्य वल्लभेश्वर नामक यह व्यक्ति पुलकेशिन - प्रथम था, जिसने राजधानी के रूप में वातापी अथवा बादामी का चुनाव उसके सामरिक महत्व के कारण किया।
पुलकेशिन द्वितीय का ऐहोल अभिलेख पुलकेशिन-प्रथम के द्वारा वातापी पर अधिकार किए जाने का उल्लेख करता है। इस अभिलेख में पुलकेशिन प्रथम द्वारा अश्वमेध यज्ञ संपन्न किए जाने का भी उल्लेख है। नीलकंठ शास्त्री का मत है
कि पुलकेशिन प्रथम ने कदंबों के आधिपत्य से स्वयं को मुक्त कर अपनी स्वतंत्रता घोषित की और वातापी तथा उसके पड़ोस में अवस्थित प्रदेशों पर अपना अधिकार स्थापित किया।
पुलकेशिन प्रथम द्वारा संपन्न अश्वमेध यज्ञ का उल्लेख बारहवीं सदी तक के अभिलेखों में हुआ है। बादामी अभिलेख में पुलकेशिन प्रथम का उल्लेख हिरण्यगर्भप्रसूत के रूप में भी हुआ है। इसका यह अर्थ है कि उसने हिरण्यगर्भ महादान का आयोजन किया।
मंगलेश के एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि पुलकेशिन प्रथम ने अग्निष्टोम, अग्निचयन, वाजपेय, बहुसुवर्ण तथा पौंडरीक आदि यज्ञ भी संपन्न किए। उसकी तुलना ययाति एवं दिलीप जैसे पौराणिक व्यक्तियों के साथ की गई है। साथ ही, उसे मनु की विधि संहिता, रामायण एवं महाभारत का ज्ञाता माना गया है।
पुलकेशिन - प्रथम का उत्तराधिकारी उसका पुत्र कीर्तिवर्मन (556-97 ई.) था। उसे वातापी का पहला निर्माता कहा गया है। इतिहासकारों के अनुसार,
इससे मात्र यह सूचित होता है कि कीर्तिवर्मन- प्रथम ने वातापी को मंदिरों एवं भक्तों से सुसज्जित किया। उसे मौर्यो, नल एवं कदबों के लिए "कालरात्रि' अथवा 'मृत्यु की रात' कहा गया है। मौर्यो, नलों एवं कदंबों के विरुद्ध कीर्तिवर्मन की सफलता बहुत महत्वपूर्ण थी। इससे पुलकेशिन प्रथम द्वारा स्थापित राज्य के भूभाग में वृद्धि हुई।
कोंकण में मौर्यो का शासन था। उनकी राजधानी पुरी थी, जिसे पश्चिमी सागर की लक्ष्मी' कहा जाता था। कोंकण की विजय से रेवती द्वीप अथवा गोवा जैसा बंदरगाह चालुक्यों के अधिकार में आ गया।
नल नलवाड़ी के शासक थे, जो बेलारी एवं करनूल की दिशा में अवस्थित था। कदंब राजधानी, वनवासी पर विजय का बादामी के चालुक्य अभिलेखों में विशेष उल्लेख है। इनमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि कीर्तिवर्मन ने वनवासी पर अपना अधिकार स्थापित किया।
कीर्तिवर्मन की मृत्यु के समय उसका पुत्र पुलकेशिन द्वितीय अल्पवयस्क था। इसलिए उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका अनुज मंगलेश (597-611 ई.) राज्य का उत्तराधिकारी घोषित हुआ। मंगलेश ने कीर्तिवर्मन द्वारा प्रारंभ की गई राज्य विस्तार की नीति जारी रखी।
उसने अपने शासनकाल के प्रारंभ में ही कलचुरियों पर विजय प्राप्त की। कलचुरियों के साथ उसके युद्ध का उल्लेख महाकूट स्तंभ अभिलेख में है। इसलिए अनुमान किया जाता है कि यह घटना 602 ई. के पहले की होगी। नेरूर अभिलेख से विदित होता है कि मंगलेश ने कलचुरि शासक बुद्धराज को पराजित किया। समकालीन कलचुरि अभिलेखों से संकेत मिलता है कि उस समय कलचुरियों ने गुजरात खानदेश एवं मालवा में अपना शासन स्थापित किया था। इतिहासकारों का मत है कि मंगलेश के नेतृत्व में कलचुरियों के विरुद्ध चालुक्यों का आक्रमण एक सफल धावा से अधिक कुछ नहीं था क्योंकि बुद्धराज के अभिलेखों से पता चलता है कि 609 ई. के आसपास वह एक स्वतंत्र राजा के रूप में संपूर्ण राजसी वैभव के साथ शासन कर रहा था।
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