पुलकेशिन द्वितीय : विजय एवं उपलब्धियाँ - Pulakeshin II: Conquests and Achievements

 पुलकेशिन द्वितीय : विजय एवं उपलब्धियाँ - Pulakeshin II: Conquests and Achievements


पुलकेशिन द्वितीय (611-642 ई.) चालुक्य राजवंश का सबसे महान शासक था। उसकी गणना भारतीय इतिहास के महानतम शासकों में की जाती है। मंगलेश की समाप्ति के बाद जिस समय वह वातापी में सिंहासनारूढ़ हुआ, उस समय चालुक्यों का राज्य गृह युद्ध की चपेट में था और सर्वत्र अराजकता व्याप्त थी। पुलकेशिन द्वितीय ने संकट की इस घड़ी में साहस और दृढ़संकल्प से काम लिया। धीरे-धीरे उसने न सिर्फ अपने विरोधियों पर विजय पाई, बल्कि अपने राज्य को अपनी दिग्विजय से दक्कन की एक महाशक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफलता पाई। पुलकेशिन द्वितीय अपनी उपाधि सत्याश्रय के नाम से ख्यात था। उसने वल्लभ, पृथ्वीवल्लभ एवं श्रीपृथ्वीवल्लभ नामक उपाधियाँ भी धारण की। हर्षवर्धन के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करने के पश्चात् उसने परमेश्वर नामक उपाधि धारण की।


ऐहोल अभिलेख से पुलकेशिन द्वितीय के सैन्य अभियानों की विस्तृत जानकारी मिलती है। इससे ज्ञात होता है कि मंगलेश की हत्या के कुछ पूर्व गृह युद्ध का लाभ उठाकर कुछ सामंतों एवं नायकों ने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी थी। पुलकेशिन द्वितीय ने एक-एक कर उन सबों को उसकी अधीनता स्वीकार करने हेतु विवश किया। गोविंद एवं अप्पायिक नाम के उसके दो विरोधी मंगलेश की हत्या से उत्पन्न असमंजस की स्थिति में अपनी सेना सहित भीमा नदी तक आ पहुँचे थे। पुलकेशिन ने ऐसी स्थिति में कूटनीति का सहारा लिया। उसने गोविंद को अपना मित्र बनाकर उसके सहयोग से अप्पायिक को पराजित करने में सफलता पाई। नीलकंठ शास्त्री का मत है

कि गोविंद एवं अप्पायिक का ऐहोल अभिलेख में जिस रूप में उल्लेख हुआ है, उससे वे कोई सामंत अथवा सैन्य नायक प्रतीत होते हैं। तथा उनका किसी राजवंश से कोई संबंध नहीं था। उल्लेखनीय है कि फ्लीटगोविंद एवं अप्पायिक को एक ही व्यक्ति मानते हैं। उनके अनुसार अभिलेख में उल्लिखित गोविंद एवं अप्पायिक एक ही व्यक्ति के नाम हैं। किंतु अन्य विद्वान इससे सहमत नहीं हैं। इसके अतिरिक्त आर. जी. भंडारकर गोविंद को राष्ट्रकूटों


से संबंधित मानते हैं। उनका तर्क है कि राष्ट्रकूटों की वंशावली में गोविंद नाम का बास्बार प्रयोग हुआ है। इस प्रकार, अपने गृह प्रांत में अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के बाद पुलकेशिन द्वितीय ने अपने पड़ोसी राज्यों के विरुद्ध सैन्य अभियानों का प्रारंभ किया।

सर्वप्रथम उसने दक्षिण में स्थित कदंब वंश की राजधानी, वनवासी पर आक्रमण कर उसपर विजय पाई। दक्षिणी कर्नाटक के आलुप एवं मैसूर के गंग कदंब राजवंश के मित्र थे। इसलिए वनवासी पर विजय के बाद पुलकेशिन द्वितीय ने इनपर भी आक्रमण कर इन्हें पराजित किया। आलुप दक्षिणी कर्नाटक के सरदारों का एक परिवार था, जिन्होंने सदियों से इस क्षेत्र में शासन किया था।


इसके बाद पुलकेशिन ने अपनी नौसेना द्वारा आक्रमण कर उत्तरी कोंकण के मौर्यों को पराजित किया और एलिफेंटा के द्वीप पर अवस्थित उनकी राजधानी पुरी पर अपना अधिकार स्थापित किया।

पुरी, जिसे पश्चिमी सागर की लक्ष्मी कहते थे, एक समृद्ध पत्तन नगर था। इसके पश्चात् लाट, मालव और गुर्जरों नेपुलकेशिन द्वितीय की अधीनता स्वीकार की और इस प्रकार चालुक्य राज्य की सीमा मही नदी तक बढ़ गई। नीलकंठ शास्त्री का मत है कि दक्षिणी गुजरात के लाट, मालव एवं गुर्जरों ने पुलकेशिन द्वितीय की अधीनता उत्तर भारत में हर्षवर्धन की तेजी से बढ़ती हुई शक्ति के कारण स्वीकार की।


लाट, मालव और गुर्जरों के बाद ऐहोल अभिलेख में पुलकेशिन द्वितीय द्वारा हर्ष पर विजय का वर्णन है। हुआन सांग ने भी इस युद्ध का वर्णन किया है।

हर्षवर्धन कन्नौज का राजा था किंतु शीघ्र ही उसने स्वयं को उत्तर भारत की सर्वोच्च शक्ति के रूप में स्थापित कर लिया था। इसके बाद उसने नर्मदा नदी के दक्षिण में अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहा, जिसका पुलकेशिन द्वितीय ने विरोध किया। पुलकेशिन के विरुद्ध युद्ध में हर्ष को भारी नुकसान का सामना करना पड़ा। उसने बड़ी संख्या में अपने हाथी गँवाए। पुलकेशिन ने हर्ष की सेना को नर्मदा नदी से दक्षिण की ओर बढ़ने का कोई अवसर नहीं दिया। उसने विंध्य के पर्वतीय प्रदेश में अपने हाथी नहीं भेजे, बल्कि दरों एवं घाटियों की सुरक्षा के लिए उसने पैदल सैनिकों की कई शक्तिशाली टुकड़ियाँ तैनात की । हुआन सांग भी इन तथ्यों की पुष्टि करता है। वह कहता है कि हर्षवर्धन ने पश्चिम एवं पूर्व में कई आक्रमण किए और टू अथवा निकट स्थित सभी

• प्रदेशों ने उसकी अधीनता स्वीकार की, किंतु पुलकेशिन द्वितीय ने उससे कभी हार नहीं मानी। रविकीर्ति भी स्पष्ट रूप से कहता है कि हर्ष पुलकेशिन द्वितीय को पराजित कर पाने में असमर्थ रहा, यद्यपि उसके नेतृत्व में एक विशाल सेना ने पुलकेशिन द्वितीय पर आक्रमण किया। संभवत: पुलकेशिन द्वितीय के विरुद्ध हर्षवर्धन का यह अभियान उसके विजयी जीवन का एकमात्र अपवाद था।


अभिलेखों से ज्ञात होता है कि पुलकेशिन और हर्ष के बीच नर्मदा नदी के तट पर यह युद्ध 612 ई. के पूर्व हुआ। हुआन सांग भी इस बात की पुष्टि करता है। वह कहता है

कि हर्षवर्धन के प्रथम छह वर्ष (606-12 ई.) युद्धों एवं अभियानों से भरे रहे किंतु उसके शासनकाल के बाकी वर्ष अपेक्षाकृत अधिक शांतिपूर्ण रहे। हुआन सांग ने दक्कन की यात्रा 642 ई. में की। इस प्रकार हम इस नतीजे पर पहुँचते हैं कि 612 ई. के पूर्व स्थापित शक्ति-संतुलन अगले तीस वर्षों तक निर्विघ्न बना रहा किंतु इसके बावजूद जैसा आर. मुखर्जी कहते हैं, दक्षिण का परमेश्वर उत्तर के परमेश्वर द्वारा पुनः किसी शक्ति प्रदर्शन के प्रयासों की संभावना के प्रति हमेशा सजग बना रहा।


इस युद्ध का कोई निश्चित कारण सामने नहीं आ सका है। कुछ इतिहासकारों के अनुसार इस युद्ध के मूल में पुलकेशिन द्वितीय एवं हर्षवर्धन दोनों ही राजाओं द्वारा गुजरात में अपने-अपने साम्राज्य के विस्तार का प्रयास था।

इसके अतिरिक्त, यह मत भी व्यक्त किया गया है कि हर्षवर्धन की बढ़ती हुई शक्ति के कारण लाट, मालव और गुर्जरों के साथ-साथ वलभी के मैत्रकों ने भी पुलकेशिन द्वितीय की अधीनता स्वीकार कर ली, ताकि हर्ष के विरुद्ध उन्हें उसकी मदद मिल सके और इस प्रकार जिस तरह से इस संघ का गठन हुआ उससे हर्ष ने पुलकेशिन द्वितीय के विरुद्ध आक्रमण करने का निर्णय लिया।


हर्ष की पराजय पश्चिमी दक्कन में पुलकेशिन द्वितीय के अभियानों का चरमोत्कर्ष था। रविकीर्ति के शब्दों में, “पश्चिमी दक्कन में अपनी विजयों के परिणामस्वरूप पुलकेशिन द्वितीय का तीन महाराष्ट्रों पर अधिकार हो गया।"

इतिहासकारों का अनुमान है कि गुजरात से दक्षिणी मैसूर तक विस्तीर्ण पुलकेशिन द्वितीय के साम्राज्य में सम्मिलित तीन महाराष्ट्र से महाराष्ट्र, कोकण एवं कर्नाटक का द्योतन होता है।


हर्ष पर अपनी विजय के पश्चात् पुलकेशिन ने अपने अनुज विष्णुवर्धन को अपने गृह प्रदेश का उत्तरदायित्व सौंपा और पूर्वी दक्कन में अपने अभियानों की शुरुआत की। रविकीर्ति ने उत्तर से दक्षिण की ओर जिस क्रम में पुलकेशिन द्वितीय के अभियानों का उल्लेख किया है, उससे उसकी दिग्विजय दक्कन की प्रदक्षिणा जैसी प्रतीत होती है। संभव है कि पुलकेशिन द्वितीय ने इस क्रम में विजय प्राप्त नहीं की हो, किंतु इस विषय में अन्य स्रोतों के अभाव में रविकीर्ति द्वारा निर्दिष्ट क्रम को मानने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं है।


सर्वप्रथम उसने दक्षिण कोसल एवं कलिंग पर विजय प्राप्त की। इसके बाद चालुक्यों की सेना समुद्रतटीय मार्ग का अनुसरण करती हुई दक्षिण की ओर गई जहाँ सर्वप्रथम पिष्टपुर के दुर्ग पर आक्रमण कर उसकी विजय की गई। इसके बाद पुलकेशिन द्वितीय ने वेंगी पर आक्रमण किया। वेंगी उस समय विष्णुकुंडिनों के अधीन था। उन्होंने पुलकेशिन का विरोध किया, लेकिन उन्हें पराजित होना पड़ा। पुलकेशिन के आक्रमण के समय आंध्रप्रदेश में विष्णुकुंडिन ही सबसे बड़ी शक्ति के रूप में विराजमान थे और कलिंग एवं पिष्टपुर उनके प्रभाव क्षेत्र में थे।


विष्णुकुंडिनों के दक्षिण में कांची के पल्लवों का राज्य था। उस समय कांची में महेंद्रवर्मन प्रथम का शासन था। ऐहोल एवं काशक्कुदी अभिलेखों से पता चलता है

कि पुलकेशिन द्वितीय पल्लवों पर आक्रमण करता हुआ पल्लवों की राजधानी, कांचीपुरम से पंद्रह मील उत्तर पुल्ललूर तक चला आया था। वह कांची पर विजय प्राप्त नहीं कर सका, पर इतना निश्चित था कि उसने पल्लवों के राज्य के उत्तरी प्रांतों पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। नीलकंठ शास्त्री का मत है, “पुल्ललूर का यह युद्ध पल्लवों और चालुक्यों के मध्य दीर्घकालिक संघर्ष का प्रारंभ था, जिसकी नींव पुलकेशिन द्वितीय एवं महेंद्र वर्मन प्रथम के काल में रखी गई।"


पुल्ललूर युद्ध के पश्चात् पुलकेशिन द्वितीय अपनी राजधानी बादामी लौट गया। तत्पश्चात् उसने अपने अनुज विष्णुवर्धन को पूर्वी दक्कन भेजा,

ताकि चालुक्यों की शक्ति नवविजित प्रदेश में दृढ़तापूर्वक स्थापित हो सके। तिम्मापुरम अभिलेख से ज्ञात होता है कि कालांतर में पुलकेशिन द्वितीय एवं विष्णुवर्धन के बीच एक समझौता हुआ, जिसके अंतर्गत विष्णुवर्धन की सेवाओं को ध्यान में रखकर, पुलकेशिन ने विष्णुवर्धन एवं उसके उत्तराधिकारियों को चालुक्य राज्य के पूर्वी प्रदेशों का एकमात्र शासक नियुक्त किया। विष्णुवर्धन के पुत्र जयसिंह प्रथम ने वातापी से संबंध विच्छेद कर लिया और इस तरह वेंगी के पूर्वी चालुक्यों की स्वतंत्र शाखा की स्थापना हुई। बाद में कुलोत्तुंग प्रथम के शासनकाल में 1070 ई. में पूर्वी चालुक्यों का चोल साम्राज्य में विलय हो गया।


अपनी स्थिति को सुदृढ़ करने के लिए पुलकेशिन द्वितीय ने कूटनीति का भी सहारा लिया।

पूर्वी दक्कन की अपनी दिग्विजय के बाद लगभग 625-26 ई. में उसने अपना एक दूतमंडल फारस के दरबार में भेजा। फारसी इतिहासकार तबारी के अनुसार, “पुलकेशिन द्वितीय ने फारस के राजा खुसरो द्वितीय के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखा' तबारी कहता है कि पुलकेशिन द्वितीय ने पत्रों एवं उपहारों सहित अपने दूतमंडल फारस के दरबार में भेजे। फारस के राजा ने भी अपना दूतमंडल पुलकेशिन द्वितीय के दरबार में भेजा होगा, किंतु इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। इतिहासकारों की मान्यता है कि अजंता के एक चित्र में फारस के दूतमंडल का चालुक्य दरबार में स्वागत होते हुए दिखाया गया है। इसके अतिरिक्त अजंता में ही एक अन्य चित्र को खुसरो एवं उसकी पत्नी शिरीन का निरूपण माना गया है।

स्टेन कोनों अजंता के इन चित्रों को फारस के साथ किसी भी रूप में संबद्ध करना उचित नहीं मानते हैं। फिर भी, यह निर्विवाद है कि तबारी के साक्ष्य में किसी भी प्रकार के संदेह की गुंजाइश नहीं है।


अभिलेखों से ज्ञात होता है कि पुलकेशिन द्वितीय 631 ई. में पुनः पूर्वी दक्कन आया। इस बीच कांची में महेंद्रवर्मन के स्थान पर नरसिंहवर्मन प्रथम (630-668 ई.) सिंहासनारूढ़ हो चुका था। पल्लव अभिलेखों में स्पष्ट उल्लेख है कि पुलकेशिन द्वितीय ने एक बार फिर पल्लवों पर आक्रमण किया,

किंतु नरसिंहवर्मन ने पुलकेशिन द्वितीय को परियल, मणिमंगल और शूरमार सहित कई युद्धों में पराजित किया। इनमें सिर्फ मणिमंगल की पहचान की जा सकी है, जो कांची से लगभग 20 मील दूर पूर्व दिशा की ओर अवस्थित है। ऐसा प्रतीत होता है कि पुलकेशिन द्वितीय के आक्रमण से एक बार फिर पल्लवों की राजधानी कांची पर संकट के बादल मँडराने लगे थे। किंतु नरसिंहवर्मन ने कई युद्धों के पश्चात् पुलकेमि द्वितीय को अपने राज्य से खदेड़ भगाया। इन युद्धों में नरसिंहवर्मन को सिंहली राजकुमार मानवर्मा का साथ मिला था। सिंहली स्रोतों के अनुसार इस मदद के पुरस्कार स्वरूप नरसिंहवर्मन ने मानवर्मा को श्रीलंका में राजा बनने में मदद की।


पुलकेशिन द्वितीय के शासन काल के अंतिम वर्षों में चीनी तीर्थयात्री हुआन सांग ने दक्कन एवं दक्षिण भारत की यात्रा की। हुआन सांग की मुख्य रुचि बौद्ध धर्म में थीं भारतीय राजनीति में नहीं। फिर भी,

उसने जो कुछ लिखा है, वह ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। वह कहता है कि पुलकेशिन द्वितीय क्षत्रिय था। वह अत्यंत परोपकारी था तथा प्रजा सहर्ष उसकी आज्ञा का पालन करती थी। उसके सामंत भी उसके प्रति स्वामिभक्ति रखते थे। वह हर्ष एवं पुलकेशिन के बीच हुए संघर्ष से परिचित था। वह चालुक्य राज्य के निवासियों के विषय में कहता है कि वे ईमानदार तथा विद्याप्रेमी थे।


नरसिंहवर्मन- प्रथम के शासनकाल में पल्लवों पर पुलकेशिन द्वितीय का आक्रमण चालुक्यों के लिए पहले आक्रमण की अपेक्षा अधिक विनाशकारी सिद्ध हुआ। मणिमंगलम के युद्ध के पश्चात् नरसिंहवर्मन ने अच्छी तरह समझ लिया कि उसे अपने राज्य की सुरक्षा के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता थी।

उसने पुलकेशिन द्वितीय के विरुद्ध एक आक्रामक योजना बनाई और उसके कार्यान्वयन के लिए 642 ई. में अपने सेनापति शिरूतोंड के नेतृत्व में पल्लवों की एक विशाल सेना वातापी भेजी, जो चालुक्यों के राज्य में अत्यंत फुर्ती से बढ़ती हुई चालुक्यों की राजधानी वातापी पहुँच गई और उसे अपने अधिकार में ले लिया।


चालुक्यों के लिए यह एक गहरा आघात था। बादामी में मल्लिकार्जुन के मंदिर के पीछे एक चट्टान पर पल्लव लिपि में उत्कीर्ण एक अभिलेख आज भी इस बात का प्रमाण है कि पल्लवों ने अपने विरोधी चालुक्यों की राजधानी वातापी पर अपना अधिकार स्थापित करके पुलकेशिन द्वितीय द्वारा कांची को दो बार जोखिम में डालने का अंततः भयंकर प्रतिशोध लिया। इसके पश्चात् पुलकेशिन द्वितीय का कहीं कोई उल्लेख नहीं है।