राजपूत कालीन संस्कृति - Rajput carpet culture
राजपूत कालीन संस्कृति - Rajput carpet culture
शासन व्यवस्था (Administration System)
राजपूत काल में सामंतवाद का विकास स्पष्ट दिखाई देने लगा था। संपूर्ण राजपूत राज्य छोटी- छोटी जागीरों में विभक्त थे। जागीर का प्रशासन सामंत देखता था। सामंत प्रायः राजा के कुल से ही संबंधित रहता था। सामंत प्रायः महाराज महासामंत, महासामंताधिपति, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर एवं मांडलिक आदि उपाधियाँ धारण करते थे। ये कई ग्रामों के स्वामी होते थे। कलचुरी शासक कर्ण के शासन में 136 सामंतों के अस्तित्व का पता चलता है। सामंतों के पास अपने न्यायालय एवं मंत्रीपरिषद होती थी।
इस प्रकार राजपूत राजा अपनी प्रजा पर शासन न कर सामंतों पर शासन करते थे। समय-समय पर ये सामंत राजदरबार में उपस्थित होकर राजा को भेंट एवं उपहार प्रदान करते थे। किसी भी राजपूत राजा के राज्याभिषेक के अवसर पर सामंतों की उपस्थिति आवश्यक मानी जाती थी। युद्ध के समय राजा को विभिन्न सामंत अपने अधीन सैन्य सहायता उपलब्ध कराते थे। सामंतों में स्वामीभक्ति की भावना प्रबलता से विद्यमान रहती थी।
राजपूत काल में राजा प्रायः निरंकुश रहते थे। मंत्रीपरिषद का महत्व घट गया था। प्रबंध चिंतामणि ग्रंथ से पता चलता है कि परमार नरेश मुंज ने अपने प्रधानमंत्री रुद्रादित्य की सलाह के विपरीत चालुक्य नरेश तैलप से युद्ध किया।
राजा अपने मंत्रियों को दंडित भी करते थे। मेरुतुंग कृत प्रबंध चिंतामणि एवं दण्डी कृत दशकुमारचरित से पता चलता है कि राजा अपने मंत्रियों के नाककान काट लेते थे अथवा उन्हें अंधा बना देते थे। इस प्रकार हम देखते हैं कि राजपूत काल में राजा एवं मंत्रिपरिषद के बीच संबंधों में सामंजस्य का अभाव था।
आर्थिक जीवन (Economic Life)
कृषि कार्य राजपूत कालीन प्रजा की जीविका का प्रमुख आधार था। इस समय कई प्रकार के अन्नों का उत्पादन आरंभ हो चुका था। अरब लेखकों ने राजपूत कालीन उत्पादन का वर्णन किया है।
चूँकि इस समय सामंतवादी व्यवस्था थी, इस कारण किसान का अतिरिक्त उत्पादन सामंत कर के रूप में प्राप्त कर लेते थे। इस काल में भाग, भोग, बलि, धान्य, हिरण्य, उद्रग्ङ, उपरिकर आदि करों का उल्लेख मिलता है।
भाग भोग
कृषकों से उपज के अंश के रूप में लिया जाता था।
समय-समय पर प्रजा से राजा के उपभोग के लिए लिया जाता था।
-
बलि राजा को उपहार स्वरूप प्राप्त होता था।
धान्य-
हिरण्य-
कुछ विशेष प्रकार के अनाजों पर लगाया जाने वाला कर था।
उपरिकर-
यह नकद वसूल किया जाता था।
भूमि पर अस्थायी रूप से रहने वाले किसानों से लिया जाता था।
उद्रग्ड-
भूमि पर स्थायी रूप से रहने वालों से लिया जाता था। सिंचाई के लिए प्राप्त पानी के भाग पर लगने वाला कर था।
सिंचाई के लिए राजपूत राजाओं ने पर्याप्त व्यवस्था कराई थी। सिंचाई कृषि कार्य के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए, राजपूत राजाओं ने कई कुएँ, तालाब, झीलें एवं नहरों आदि का निर्माण कराया। चौहान नरेश अर्णोराज ने 'आणासागर झील एवं बीसलदेव ने 'बीसलसर झील का निर्माण कराया। बुंदेलखंड के चंदेल एवं मालवा के परमारों ने भी सिंचाई व्यवस्था की ओर पर्याप्त ध्यान दिया। चंदेल शासकों ने महोबा में कई झीलों का निर्माण कराया। परमारों ने घाट में कई झीलों का निर्माण कराया। परमार शासक राजा भोज ने भोपाल के दक्षिण पूर्व में 250 वर्ग मील लंबा 'भोजसर तालाब निर्मित कराया।
कृषि के अलावा व्यापार एवं व्यवसाय के क्षेत्र में भी राजपूत काल में प्रगति के चिह्न दिखाई देते हैं। यातायात की सुविधा आंतरिक व्यापार की आवश्यक शर्त है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए विभिन्न नगरों को सड़कों द्वारा जोड़ दिया गया। चूँकि बड़े-बड़े किलों के निर्माण में पाषाण का प्रयोग किया गया, अतः इस काल में पत्थर तराशने का उद्योग एक महत्वपूर्ण उद्योग बन चुका था। राजपूत काल में युद्धों की अधिकता के कारण अस्त्र-शस्त्र निर्माण उद्योग भी प्रगति पर था। पूर्व मध्यकाल में भारत आने वाला विदेशी यात्री अलबरूनी इस काल में जूते बनाने, टोकरी बनाने, ढाल बनाने, मत्स्य पालन, कताई-बुनाई आदि प्रमुख उद्योगों का वर्णन करता है। राजस्थान में नमक उद्योग प्रमुख था। यहाँ की सांभरझील से नमक तैयार किया जाता था।
व्यापारियों की पृथक्-पृथक् श्रेणियाँ होती थीं। श्रेणी प्रमुख को श्रेष्ठी कहा जाता था। इनके सदस्य व्यापार संबंधी मसलों पर विचारविमर्श करते थे। उनके बनाए गए व्यापार संबंधी नियमों का राज्य आदर करता था। परंतु सामंतवादी व्यवस्था के कारण पूर्व की तुलना में श्रेणियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। आंतरिक एवं बाह्य दोनों ही प्रकार का व्यापार उच्चतम शिखर पर था। स्थल मार्ग के अलावा जलमार्ग से भी व्यापार होता था। बाह्य व्यापार समुद्र द्वारा एवं आंतरिक व्यापार नदियों व सड़कों द्वारा
होता था। बड़े-बड़े मालवाहक जहाज व्यापार के सिलसिले में अरब, फारस, मिस्र एवं पूर्वी द्वीप समूह जाते थे। विदेशी व्यापारी भी भारत आते थे।
ब्याज की दर 25 से 30 प्रतिशत तक होने के कारण सूदखोरों को फायदा हुआ। चोर-डाकू व्यापारियों को लूटते थे, मार्गों की सुरक्षा पर ध्यान नहीं दिया गया था। इस समय कई मंदिर बनवाए गए एवं अधिकांश संपत्ति मंदिरों मेंही जमा होती थी। यही कारण है कि विदेशी मुस्लिम आक्रांताओं ने मंदिरों को अपना निशाना बनाया और यहाँ एकत्रित संपत्ति को लूट कर ले गए।
धार्मिक जीवन (Religious Life)
राजपूत काल में ब्राह्मण, जैन एवं बौद्ध धर्म प्रचलन में थे। बौद्ध धर्म में वज्रयान शाखा का प्रभाव बढ़ रहा था। बौद्ध विहार पतन की ओर अग्रसर थे।
बौद्ध धर्म की तुलना में ब्राह्मण धर्म एवं जैन धर्म अधिक लोकप्रिय थे। इस युग में अवतारवाद के सिद्धांत का विकास हुआ। क्षेमेंद्र की कृति 'दशावतार चरित (1060 ई.) एवं जयदेव के गीत गोविंद (1180 ई.) में अवतारों का वर्णन प्रस्तुत किया गया है। अभिलेखों में भी अवतारों का उल्लेख मिलता है। इस काल में विष्णु, शिव, दुर्गा एवं सूर्य आदि देवी- देवताओं की उपासना होती थी। हिंदुओं में ब्राह्मण धर्म के अंतर्गत यज्ञों का पुनरुत्थान हुआ एवं उनको बढ़ावा मिला। इस युग में भक्ति मार्ग और पौराणिक मार्ग का उदय हुआ। कुमारिल भट्ट ने वैदिक कर्मकाण्ड पर विशेष जोर दिया। शंकराचार्य ने अद्वैतवाद का प्रचार किया। रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैतवाद का प्रचार किया और भक्ति का मार्ग अपनाया।
आधुनिक हिंदू धर्म ने राजपूत काल तक आते-आते अपना स्वरूप ग्रहण कर लिया था। छोटे-छोटे स्थानीय देवी-देवता अस्तित्व में आ गए थे। विष्णु को वासुदेव, चक्रधर, गोविंद नारायण, गदाधर, जनार्दन एवं माधव कहा जाने लगा एवं भगवान शिव को शंभु हर-हर महादेव, पशुपति, शूलपाणि, महेश्वर आदि कहा जाने लगा।
हिंदू धर्म की उन्नति के साथ ही राजपूताना में जैन धर्म भी उन्नतिशील था। राजपूताना क्षेत्र के गुर्जर प्रतिहार वंश के शासकों ने जैन धर्म की उन्नति में योगदान दिया।
प्रतिहार नरेश भोज के समय एक जैन मंदिर का निर्माण कराया गया। उसी समय आबू पर्वत पर भी एक जैन मंदिर का निर्माण हुआ। बुंदेलखंड के चंदेल शासकों के समय में खजुराहो में जैन तीर्थंकरों के 5 मंदिरों का निर्माण कराया गया। गुजरात के चालुक्य (सोलंकी) शासकों ने तो जैन धर्म को राजधर्म बनाया। चालुक्य वंश के शासक कुमारपाल के समय जैन धर्म ने अत्यधिक उन्नति की। प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचंद्र को राजकीय संरक्षण प्रदान किया गया था। हेमचंद्र के कारण ही कच्छ, काठियावाड़, गुजरात एवं राजस्थान में जैन धर्म का अत्यधिक प्रचार-प्रसार हुआ। गंग राजाओं ने भी जैन धर्म को संरक्षण दिया। सेनापति चामुंडराय ने 983 ई. में श्रवणबेलगोला में गोमतेश्वर की मूर्ति स्थापित की।
बौद्ध धर्म अवश्य इस काल में पतन की ओर अग्रसर था। महायान संप्रदाय की प्रधानता थी, परंतु उसका तांत्रिक स्वरूप विकसित हो रहा था। बौद्ध-मठ एवं विहारों में अधिक संपत्ति एकत्रित हो रही थी। ये मठ व विहार विलासिता एवं भ्रष्टाचार के केंद्र बन गए थे। बौद्ध धर्म में वज्रयान संप्रदाय का विकास इसी युग में हुआ। इस संप्रदाय में मैथुन एवं हठयोग को प्रधानता दी गई। बौद्ध धर्म में तारा को प्रधानता • मिली । इतिहासविद ए. एस. अल्तेकर महोदय के अनुसार इस समय तक आते-आते बौद्ध धर्म अपना प्रभाव पूर्णतः खो चुका था एवं पतन के अंतिम सोपान पर पहुँच चुका था। प्रख्यात दार्शनिकों कुमारिल भट्ट एवं शंकराचार्य ने बौद्ध धर्म में व्याप्त बुराइयों पर कठोर प्रहार कर इसको अलोकप्रिय बना दिया।
चंदेल शासक यशोवर्मन ने खजुराहों में बैकुंठ मंदिर का निर्माण कराया। परमार्दिदेव के मंत्री ने भी एक विष्णु मंदिर का निर्माण कराया। मदनवर्मन के मंत्री गदाधर ने देदू नामक स्थान पर एक विष्णु मंदिर का निर्माण कराया। खजुराहों के वराह तथा वामन मंदिरों का निर्माण भी 10वीं- 11वीं शताब्दी में हुआ।
चंदेल शासक धंगदेव ने प्रथमदेव नामक शिव मंदिर का निर्माण कराया। गहपति वंशीय कोक्कल ने वैद्यनाथ मंदिर का निर्माण कराया। खजुराहो के कांदरीय महादेव, विश्वनाथ मृत्युंजय महादेव एवं
नीलकंठ महादेव मंदिर का निर्माण भी इसी काल में हुआ। प्रारंभिक चंदेल शासक विष्णु तथा शिव दोनों की आराधना करते थे। परवर्ती चंदेल नरेश शैव धर्म के उपासक थे। त्रैलोक्यवर्मन ने वामदेव की उपाधि धारण की थी।
वार्तालाप में शामिल हों