राष्ट्रकूट काल : आर्थिक स्थिति - Rashtrakuta Period: Economic Condition
राष्ट्रकूट काल : आर्थिक स्थिति - Rashtrakuta Period: Economic Condition
राष्ट्रकूट काल में भूमि पर व्यक्तिगत स्वामित्व की मान्यता थी। किंतु कर की अदायगी न करने पर राजा को कृषक को भूमि से वंचित करने का भी अधिकार होता था। ऊसर और गोचर भूमि सामूहिक स्वामित्व अथवा सार्वजनिक उपभोग का अधिकार ग्राम वासियों को होता था। वन, खनिज, जैसी भूमि पर राजा का स्वामित्व था। विविध प्रकार के भूमिकर प्रचलित थे। भागकर और उदंग कर का अभिलेखों में बराबर उल्लेख होता है। कृषक भूमिकर अन्न के रूप में भी दे सकते थे और वसूली भी दो तीन बार में होती थी। कर माफी के भी उदाहरण मिलते हैं। अग्रहार ग्राम कर से मुक्त थे।
राष्ट्रकूट समाज का आर्थिक ढाँचा दृढ़ था। कपास, ज्वार, बाजरा, धान, नारियल, की उपज अधिक होती थी। चंदन, आबनूस, और इमारती लकड़ी का व्यापार उन्नति पर था। ताँबे की खानों से राज्य को अच्छी आमदनी थी। मार्ग पहाड़ी किंतु यातायात के योग्य थे। आंतरिक और विदेशी व्यापार में प्रगति थी। बाजार में वस्तुएँ सुलभ और सस्ती थीं। एक विवरण के अनुसार गाय, 32 सेर चालव, 25 सेर दाल, 24 सेर दही, 3 सेर घी, 75 सेर नमक की कीमत 1 रूपये थी। भैंस की कीमत 2 रूपये थी। विनिमय ही पणन का अधिक प्रचलित माध्यम था। वेतन भी अन्न के रूप में अधिक दिया जाता था। सिक्कों की कभी थी।
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