राष्ट्रकूट काल - Rashtrakuta period
राष्ट्रकूट काल - Rashtrakuta period
समाज पारंपरित वर्ण और जातिविधान के आधार पर संगठित था। राजा क्षत्रिय होते थे, जो अपने को 'सत्क्षत्रिय' कहते थे। उनकी अपनी मान्यता थी कि वे वर्णक्रम में ब्राह्मणों से भी श्रेष्ठ हैं। फिर भी ब्राह्मणों का समाज में विशेष आदर था। वैश्यों की स्थिति में गिरावट आयी थी और वे शूद्रों से मिश्रित हो रहे थे। शुद्रों के प्रति वर्जनशीलता का भाव होते हुए भी उनके साथ मानवीय व्यवहार होता था। अनुलोम विवाह की प्रथा थी। जो ब्राह्मण पारंपरिक रूप से पठन पाठन और श्रौत कर्म में लीन थे, उनका समाज और राज्य में विशेष आदर था। वैदिक श्रोत कर्मों का कुमारिल के प्रयत्नों के बावजूद उतना प्रचलन नहीं था, जितना कि वाकाटक युग में स्मार्त धर्म का प्रभाव बड़ रहा था।
ब्राह्मणों को अभी भी दान मिलते थे। पूर्वप्रचलित दानों के क्रम को राष्ट्रकूट राजा मान्यता दिए हुए थे यहाँ तक कि वे राज भी जो जैनी हो गए थे। निर्धन ब्राह्मणों से कर नहीं लिया जाता था। शूद्रवर्ग में चमार, मछुए, धोबी, भंगी, चांडाल आदि अछूत थे। सतीप्रथा नहीं थी, किंतु बाल विवाह का प्रचलन था। विधवा विवाह पर भी प्रतिबंध था। पर्दा प्रथा नहीं थी।
राष्ट्रकूट समाज का आर्थिक ढाँचा दृढ़ था। कपास, ज्वार, बाजरा, धान, नारियल, की उपज अधिक होती थी। चंदन, आबनूस, और इमारती लकड़ी का व्यापार उन्नति पर था।
ताँबे की खानों से राज्य को अच्छी आमदनी थी। मार्ग पहाड़ी किंतु यातायात के योग्य थे। आंतरिक और विदेशी व्यापार में प्रगति थी। बाजार में वस्तुएँ सुलभ और सस्ती थीं। एक विवरण के अनुसार गाय, 32 सेर चालव, 25 सेर दाल, 24 सेर दही, 3 सेर घी, 75 सेर नमक की कीमत 1 रूपये थी। भैंस की कीमत 2 रूपये थी। विनिमय ही पणन का अधिक प्रचलित माध्यम था। वेतन भी अन्न के रूप में अधिक दिया जाता था । सिक्कों की कभी थी।
धार्मिक समवाय राष्ट्रकूट समाज की विशेषता थी। अमोघवर्ष प्रथम, जैनधर्म का निष्ठावान अनुयायी होते हुए भी हिंदूधर्म के देवी देवताओं की उपासना करता था।
इंद्र तृतीय भी जैन था। गंगानरेश भी जैन थे। इस प्रकार जैनधर्म को राजकीय मान्यता थी। बौद्धधर्म की पतनावस्था थी। सातवी शती में जहाँ डकन में 200 बौद्ध मठ थे, वहाँ अब केवल तीन मठों की चर्चा मिलती है, जिनमें कन्हेरी की स्थिति अच्छी थी। हिंदू अर्थात् ब्राह्मणधर्म के प्रति प्रजा में बड़ा आदर था। मंदिरों के निर्माण की प्रक्रिया अभी जारी थी। विष्णु, शिव, लक्ष्मी और सूर्य की उपासना बहुत प्रचलित थी। धार्मिक समन्वय की दृष्टि इतनी व्यापक थी कि राष्ट्रकूटों ने इस्लाम धर्म को भी आश्रय दिया। अरब विवरणों के आधार पर जाना जाता है। कि मुसलमानों को राष्ट्रकूट राज्य में बसने ओर मस्जिद बनवाने की सुविधा थी।
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