भारत में सामंतवाद का उदय - Rise of Feudalism in India

भारत में सामंतवाद का उदय - Rise of Feudalism in India


गुप्तोत्तर राजनीति से स्पष्ट है कि हर्षवर्धन अथवा द्वितीय नागभट्ट से लेकर प्रथम महेन्द्रपाल तक के गुर्जर प्रतिहार सम्राटों जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर 600 से 1200 ई. के बीच संपूर्ण भारत की तो बात ही क्या, उत्तर भारत को भी एक राजनैतिक सूत्र में बाँधकर प्रभावित करने वाली कोई केंद्रीय सत्ता नहीं रही। इसका एक बहुत बड़ा कारण सामंतवाद का उदय था, जो कई दृष्टियों से मध्ययुगीन यूरोप की सामंतवादी स्थितियों के समान था। किंतु भारतीय सामंतवाद अपनी उत्पत्ति में कई अर्थों में यूरोपीय सामंतवाद से भिन्न था।


यूरोप के देश, अरबों, हंगेरियनों मेम्यारों और अनेक जर्मन जातियों के अनवरत आक्रमणों से इतने त्रस्त थे कि वहाँ साधारण निवासियों का भी जीवन अत्यंत असुरक्षित और दूभर हो गया और वे रक्षकों की खोज में रहने लगे। दूसरी ओर वहाँ के राजा, राजकुमार और जमींदार अपने सेवकों, गुलामों और अनुयायियों की सेना अथवा दल तैयार कर अपने लिए राजनैतिक और आर्थिक भविष्य बनाने लगे। इस प्रकार मूलतः रक्षा चाहने वाला उसे दे सकने वाले की सेवा में लग गया और उसकी भक्ति करने लगा तथा उसका रक्षक उसे अपना जन मानने लगा।

ऐसे जन अथवा सामंत (हवैसल) शांतिकाल में राजदरबारों में रहकर कई प्रकार की सेवाएँ करने लगे और अनेक प्रकार के कर देने लगे, जिनके बदले में सम्राट उन्हें प्रतिष्ठा और सेवाभूमि अथवा तालुकदारी देते थे। युद्ध के समय इन सेवकों का युद्धस्थल में जाकर लड़ना मुख्य कर्तव्य हो गया। धीरे-धीरे इस प्रकार के सामंतों की कई श्रेणियाँ बन गई तथा उनके मालिकों की भी कई सीढ़ियाँ हो गई, जिन्हें राज्य तथा समाज ने एक राजनैतिक, आर्थिक और सामाजिक संस्था के रूप में विधानतः स्वीकार कर लिया। फ्राँस और जर्मनी जैसे देशों में सामंत-संस्था इतनी सशक्त हो गई कि जब विलियम विजेता ने 1066 ई. में इंग्लैण्ड की विजय की तो वहाँ विधिवत उसे प्रचलित किया, जिसकी परंपराएँ आगे चलकर अनेक संवैधानिक संस्थाओं के निर्माण और विकास को प्रभावित करने वाली सिद्ध हुई।