संगम साहित्य - Sangam Literature

संगम साहित्य - Sangam Literature


तमिल भाषा का प्राचीनतम साहित्य, जिससे कि हमें सुदू दक्षिण भारत का क्रमबद्ध इतिहास ज्ञात होता है 'संगम साहित्य कहलाता है। संगम का अर्थ संघ परिषद अथवा गोष्ठी होता है। वस्तुतः संगम तमिल कवियों, विद्वानों, आचार्यों ज्योतिषियों तथा अन्य बुद्धिजीवियों की एक परिषद थी, जिसे हम आधुनिक अकादमी या विद्वत परिषद मान सकते हैं। प्रत्येक कवि अथवा लेखक अपनी रचनाओं को संगम के समक्ष प्रस्तुत करता था तथा इस परिषद की स्वीकृति प्राप्त हो जाने के बाद ही किसी भी रचना का प्रकाशन संभव था। पांड्य शासकों के संरक्षण में कुल तीन संगम आयोजित किए गए जिनमें संकलित साहित्य को ही संगम साहित्य कहा गया। प्रो राम शरण शर्मा के अनुसार संगम साहित्य के संकलन की तिथि 300-600 ई. थी।


प्रथम संगम


आयोजन स्थल


अध्यक्ष


सदस्य


रचनाएँ


मदुरै (पांड्यों की प्राचीन राजधानी जो अब समुद्र में विलीन हो गई है)।


इस संगम के अध्यक्ष अगस्त्य ऋषि (अगत्तियवार) थे।


इसमें कुल 549 सदस्य सम्मिलित हुए।


कुल 4,499 लेखकों ने अपनी रचनाएँ प्रस्तुत कर प्रकाशन की अनुमति


प्राप्त की।


अवधि 4,400 वर्ष ।



संरक्षक


पाण्ड्वंशीय 89 राजाओं ने संरक्षण प्रदान किया।


मानक ग्रंथ


मुक्कुरूकु तथा कलिदआवरे थे।


उपलब्ध ग्रंथ


इनमें से वर्तमान में कोई ग्रंथ उपलब्ध नहीं है।


 द्वितीय संगम आयोजन स्थल


कपातपुरम (अलैवाई) (समुद्र में विलीन)।


संस्थापक सदस्य


अगस्त्या


कार्यकारी अध्यक्ष


- तोल्लकापियरा -


सदस्य


• 49 सदस्य सम्मिलित हुए।


संरक्षक रचनाएँ


इस संगम को 59 पांड्य शासकों का संरक्षण मिला।


अवधि


- 3,700 कवियों ने अपनी रचनाओं के प्रकाशन की अनुमति


यह 3,700 वर्ष तक चला।


प्राप्त की


मानक ग्रंथ


अंकत्रियम, तोल्लकापियम, मापुरानम, भूतपुरानम, केलि, कुस्कु, वे ढालि तथा न्यालमलय इत्यादि इस संगम द्वारा प्रमुख संकलित ग्रंथ थे।


उपलब्ध ग्रंथ


- तोलकप्पियम (एक तमिल व्याकरण ग्रंथ) ।


तृतीय संगम आयोजन स्थल -


उत्तरी मदुरा


अध्यक्ष


सदस्य


नक्की


49


|


संरक्षक


49 पांड्य शासका प्रस्तुत रचनाएँ


अवधि


449


1,850 वर्ष ।


प्रमुख विद्वान रैयनार, कपिलर, परनट, सीतले सत्तनार, उद्र (पांड्य शासक)।


मानक ग्रंथ :- यद्यपि इनमें से अधिकांश ग्रंथ नष्ट हो गए हैं। आज जो तमिल साहित्य उपलब्ध है


सभी इसी संगम से संबंधित है इन उपर्युक्त तीनों संगमों की कुल अवधि 9,990 वर्ष मानी जाती है।


संगम साहित्य के प्रमुख ग्रंथ


पांड्य शासकों के संरक्षण में होने वाले तीनों संगमों के अधिकांश ग्रंथ नष्ट हो चुके हैं। तोल्लकापियम् सहित तीसरे संगम के अवशिष्ट सभी ग्रंथों का संपादन एवं प्रकाशन निम्नेवेल्ली की "साउथ इण्डिया शैव सिद्धांत पब्लिशिंग सोसायटी तिन्नेवल्ली द्वारा किया गया है। उपलब्ध संगम साहित्य का विभाजन तीन भागों में किया जा सकता है।


(1) पत्त पाट्ट (दस संक्षिप्त गीत) - यह दस संक्षिप्त पदों का संग्रह है जो निम्नानुसार हैं।


गीतपद


रचयिता


नक्कीरर


(1)


तिरुमुरुलात्रुप्पदै


नक्कीरर


रुद्रन कन्नार


(2) तेडुनलवाड


(3) पैरपनत्रुप्परै


रुद्रन कन्नार


कन्नियार


(4) पट्टिप्पालै 


(5) पोरुन रात्रु पादै


माँगुदि मरुदनार


नथ्थथनार


(6) मौकाँची


(7)


सिरुपानानुप्पदै


(8) मूल्लैप्पानुर


नपुथनार


कपिलर


(9) कुरूजिप्पांतु मलैपदुकराम


कौशिकनार


(10)


(2) एट्टत्तोके (अष्ट पदावली)- एट्टत्तोके में आठ कविताओं का संग्रह है। इनमें संगम युगीन राजाओं की नामावली के साथ-साथ तत्युगीन जन-जीवन एवं आचार-विचार का विवरण भी प्राप्त होता है। ये प्राचीनतम तमिल साहित्य की सर्वोत्तम रचनाएँ हैं। इस संग्रह में 102 अज्ञात लेखों के अतिरिक्त महिला कवयित्रियों सहित 473 कवियों द्वारा विरचित 2.289 कविताएँ हैं।


(3) पटिनेडिकल पट्टिनेन कील कणक्कु (अठारह लघु उपदेश गीत)- ये 18 लघु कविताओं का संग्रह है, जो सभी उपदेशात्मक हैं। इनमें तिरुवल्लूर कृत कुराल सर्वश्रेष्ठ है। इसे तमिल साहित्य का एक मुख्य ग्रंथ माना जाता है। इसके प्रमुख विषय त्रिवर्ग आचारशास्त्र, राजनीति, आर्थिक जीवन एवं प्रणय से संबंधित हैं। 'कुराल' का रचयिता तिरुवल्लूर कौटिल्य, मनु, कात्यायन आदि के विचारों से प्रभावित लगता है। कुराल में कुल 133 खंड हैं। इतिहासकार नीलकंठ शास्त्री इसका रचना काल ई सन् की पाँचवीं शताब्दी बताते हैं।


तोलकाप्पियम (Tolkappiyam)


यह द्वितीय संगम का एकमात्र उपलब्ध ग्रंथ है, इसकी रचना तोलकाप्पियर (Tolkappiyar) द्वारा की गई, जो कि अगस्त्य ऋषि के 12 शिष्यों में से एक थे। कुछ विद्वान इसे तीसरी शताब्दी ई.पू. की रचना मानते हैं एवं कुछ विद्वानों के अनुसार यह ईपू पाँचवीं शताब्दी की रचना है। इसकी भाषिक रचना कुछ अविकसित-सी एवं शैली अन्य संगमकालीन रचनाओं से भिन्न है। इसकी रचना सूत्र शैली में की गई। व्याकरण के साथ-साथ यह एक उच्च कोटि का काव्यशास्त्र का भी ग्रंथ है।


संगमयुगीन समाज की भी जानकारी इससे मिलती है, यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की नियमावली भी है परंतु मूलतः यहएक व्याकरण ग्रंथ है।