संगम कालीन तमिल राज्य - चेर राज्य - Sangam period Tamil kingdom - Chera kingdom
संगम कालीन तमिल राज्य - चेर राज्य - Sangam period Tamil kingdom - Chera kingdom
चेर राज्य पश्चिमी तमिलकम अर्थात् आधुनिक उत्तरी त्रावणकोर, कोचीन तथा दक्षिणी मालाबार के क्षेत्र में विस्तृत था। संगम कवियों ने चेर राज्य की प्राचीनता को महाभारत के युद्ध से जोड़ने का प्रयास किया है, जो मात्र कवियों की कल्पना ही है। चेरों की राजधानी पणजी थी। अशोक के शिलालेखों में चेर राज्य को 'केरल पुत्र' कहा गया है। चेर राज्यों के शासक चोल-पांड्य संघर्ष में कभी चोलों के साथ रहे तो कभी पांड्यों के साथा
संगमकालीन प्रथम ऐतिहासिक चेर शासक उदियनजेरल (लगभग 130 ई.) हुआ, जिसकी राजधानी मरंदै थी।
संगमकालीन कवियों के अनुसार इस शासक ने महाभारत युद्ध में भाग लेने वाले सभी योद्धाओं को भोजन कराया था। मगर यह कथन कपोल कल्पित है। उदियनजेरल को बरामभन एवं पेरूनजोरम उदियन भी कहा जाता था। वह कवि परणर का समकालीन था जो संगम काल का सर्वाधिक समय तक जीवित रहने वाला कवि था एवं परणर उत्तरी हिमालय अभियान के नेतृत्व कर हिमालय तक पहुँचा था। इसके अतिरिक्त उदियनजेरल के विषय में हमें कोई जानकारी नहीं मिलती।
उदियनजेरल का उत्तराधिकारी उसका पुत्र नेदुनजेरल आदन (लगभग 155 ई.) हुआ।
उसने मालाबार तट पर किसी शत्रु को नौसैनिक युद्ध में पराजित करके कुछ यवन व्यापारियों को बंदी बनाया, बाद में उनसे अधिकाधिक धन प्राप्त कर उन्हें छोड़ दिया। यहाँ यवनों से तात्पर्य संभवतः रोम तथा अरब के व्यापारियों से है। एक अनुश्रुति के अनुसार इसने सैनिकों के साथ शिविर में रहकर कई वर्षों तक युद्ध करके एक अभिषिक्त शासक' को हराकर अधिराज' की उपाधि धारण की। इसने मुकुटधारी राजाओं के साथ (सात राजाओं) लड़ाइयाँ जीतीं और इसी कारण अधिराज' कहलाया, कुछ विद्वानों का यह मत है।
कि इसे संगम साहित्य में श्रमयवरंबन (अर्थात् जिसकी सीमा हिमालय तक हो) कहा जाता है। यह उपाधि उसके इस दावे को प्रकट करती है
कि उसने सारे भारत को जीत लिया था तथा हिमालय पर चेर राजवंश के राजचिह्न 'धनुष को उत्कीर्ण किया। यह निश्चित ही काव्य एवं कल्पनात्मक अतिशयोक्ति है। इसकी राजधानी का नाम 'मरंदै' था। अपने समकालीन चोल राजा के साथ उसका युद्ध हुआ एवं इस युद्ध में दोनों ही राजा मारे गए और दोनों की ही रानियाँ सती हो गई।
आदन के दो भिन्न रानियों से दो पुत्र थे। इनमें से एक कलंगाय माला तथा तंतु मुकुट वाला चेर' के नाम से प्रसिद्ध था एवं दूसरा पुत्र सेंगुडूवन (Senguttuvan) अर्थात् न्यायपारायण गुडवन (180 ई.)।
संगमकालीन सर्वदीर्घजीवी कवि परनार या परनर ने अपने गीतों में इसका भी यशगान किया है। सेनगुडुवन को लाल चेर (अच्छा चेर) भी कहा गया है। वह घुड़सवारी, हाथी की सवारी तथा दुर्ग की घेरेबंदी में कुशल था। परनर ने इसके समुद्री अभियान का उल्लेख किया है। वह एक वीर योद्धा एवं कुशल सेनानायक था, उसने भी अधिराज' उपाधि धारण की थी। उसने पूर्वी तथा पश्चिमी समुद्र के बीच अपना राज्य विस्तृत किया था। वह साहित्य और कला का उदार संरक्षक था।
सेंगुडुवन (Senguttuvan) यद्यपि एक महान विजेता था,
परंतु चेर इतिहास में उसका नाम "कण्णगी' पूजा प्रारंभ करने के लिए जाना जाता है। कण्णगी' का अर्थ होता है पत्नी अर्थात् एक आदर्श तथा पवित्र पत्नी को देवी रूप में मूर्ति बनाकर पूजा जाना। कहा जाता है कि लाल चेर ने इस मूर्ति का पत्थर किसी आर्य राजा को युद्ध में हराकर प्राप्त किया तथा गंगा नदी में स्नान कराने के बाद उसे अपनी राजधानी ले आया था।
गुडुवनका पुत्र पेरुजेरल इरंपोरई (लगभग 190 ई.) भी महान विजेता था। इसके विरुद्ध सामंत आदिगइमान ने चोल तथा पांड्य राज्यों को मिलाकर एक मोर्चा तैयार किया किंतु इस संयुक्त मोर्चे को मुँह की खानी पड़ी। कालांतर में आदिगइमान उसका मित्र बन गया।
आदिगइमान को नडुमान अंजी भी कहा जाता है। एक अनुश्रुति के अनुसार दक्षिण में गन्ने की खेती आरंभ करने का श्रेय आदिगइमान को ही दिया जाता है।
चेर वंश का अगला राजा कुडक्को इलं जेराल इरपोरई (190 ई.) हुआ। इसने चोल तथा पांड्यों के विरुद्ध सफलता प्राप्त की। संगमकालीन अंतिम चेर शासक गजमुखशीय (हाथी की आँख वाला शीश) था। इसकी उपाधि मांदरंजेरल इरपोरई (210 ई.) थी। उसके समकालीन पांड्य शासक नेडुजेलियन ने उसे पराजित कर चेर राज्य की स्वाधीनता का लगभग अंत कर दिया।
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