संगम कालीन तमिल राज्य - चोल राज्य - Sangam period Tamil kingdom - Chola kingdom
संगम कालीन तमिल राज्य - चोल राज्य - Sangam period Tamil kingdom - Chola kingdom
सुर दक्षिण भारत के राज्यों में चोल राज्य सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली था। यह राज्य पूर्वी तमिलनाडु में 'पेन्नार' तथा दक्षिणी 'वेलार' नदियों के मध्य स्थित था। चोलों की प्रारंभिक राजधानी उत्तरी मनलूर थी, बाद में उयूर (जो कपास के लिए प्रसिद्ध था) तथा तंजावूर भी राजधानियाँ बनीं। कात्यायन ने चोलों का उल्लेख किया है। इनका प्रतीक चिह्न बाघ था। चोल राज्य को चोलमंडलम् या कोरोमंडल कहा जाता था।
चोलों का ही नहीं अपितु संगम काल का भी सबसे प्रमुख एवं महत्वपूर्ण शासक कारकाल' (190 ई.) था। कारैकाल के पिता 'अनेक सुंदर रथों वाला' इलनजेतचेन्नी एक वीर राजा एवं प्रतापी योद्धा थे।
'कारैकाल' नाम का अर्थ है वह व्यक्ति, जिसके पैर झुलसे हों। बचपन में इसके पैर एक दुर्घटना स्वरूप जल गए थे, शायद इसीलिए नाम कारैकाल पड़ा। एक और अनुश्रुति के अनुसार, "कारैकाल को संस्कृत का एक सामासिक शब्द भी माना गया है, जिसका अर्थ होता है 'करि' के लिए मृत्यु अर्थात् 'शत्रु (हाथियों) के लिए मृत्यु । पत्त पाट्ट (दस ग्रामीण गीत) में चोल राजधानी कावेरीपट्टनम पर एक लंबी कविता में कवि ने बतलाया है कि अपने जीवन के प्रारंभिक काल में कारैकाल को सिंहासनाच्युत करके बंदी बना लिया गया था।
जिस साहस के साथ वह जेल से निकल आया तथा पुनः सिंहासनारूढ़ हुआ, वह उसके साहस का प्रतीक है। 190 ई. के लगभग कारैकाल ने अपने समस्त शत्रुओं को हराकर अपने राज्य पर अधिकार स्थापित किया। अपने शासन काल के प्रारंभ में वेण्णि (तंजौर से 15 मील छू, आधुनिक कोविल वेण्ण) नामक स्थान पर कारैकाल ने अपने समकालीन चेर-पांड्य राजाओं सहित उनके सहयोगी ग्यारह सामंत राजाओं के एक संघ को भी पराजित किया। पांड्य तथा चेर शासकों का यश धूल में मिल गया। इस प्रकार कारैकाल ने काफी बड़े शत्रु संघ का अंत कर ख्याति अर्जित की। कारकाल द्वारा प्राप्त इस ख्याति का यशोगान कई संगमकालीन कवियों ने किया।
कारैकाल की दूसरी बड़ी सफलता थी वाहैप्परन्दलइ के युद्ध में 9 छोटे-छोटे राजाओं को परास्त करना। इसके कारण अन्य राजाओं के साथ-साथ पांड्य राजा भी कारैकाल से भयभीत हो गए। इन विजयों का सर्वप्रमुख फल यह हुआ कि कारैकाल ने कावेरी नदी घाटी में अपनी स्थिति सुदृढ़ कर ली।
कारैकाल वास्तव में एक महान प्रतापी साम्राज्य निर्माता था, परंतु तत्कालीन कवियों ने करिकाल की उपलब्धियों का अतिश्योक्तिपूर्ण विवरण प्रस्तुत किया है।
उनके अनुसार कारैकाल ने हिमालय तक सैनिक अभियान किया तथा वज्र मगध और अंवति राज्यों को जीत लिया। इसी प्रकार कुछ अनुश्रुतियों में उसकी सिंहल विजय का वृतांत मिलता है। कुछ अनुश्रुतियाँ यह भी बतलाती हैं कि कारैकाल ने सिंहल से 12,000 युद्ध-बंदियों को लाकर पुहार के समुद्री बंदरगाह के निर्माण में लगा दिया था। मगर इन विवरणों में कवि की कल्पना अधिक है, इतिहास के तथ्य कम। अतः उन्हें हम प्रामाणिक नहीं मान सकते।
कारैकाल ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था तथा उसने इस धर्म को प्रश्रय भी दिया, उसने अनेक वैदिक यज्ञ भी किए। विद्वान होने के साथ-साथ उसने दरबार में विद्वानों को आश्रय भी दिया।
स्थापत्य के क्षेत्र में भी उसने तृतीय राजधानी पुहारपत्तन (आधुनिक कावेरी पतनम) का निर्माण कराया। इसके अतिरिक्त उसने सिंचाई की उत्तम व्यवस्था हेतु कावेरी नदी के मुहाने पर 160 किमी. लंबा बाँध बनवाया, जिसके जल का उपयोग सिंचाई कार्य में लिया जाता था। इस उद्देश्य से उसने नहरों का भी निर्माण कराया था। उसके समय कृषि के साथ-साथ उद्योग-धंधों एवं व्यापार का भी विकास हुआ। अतः निःसंदेह कारैकाल एक महान विजेता, लोकहितकारी, प्रजा वत्सल शासक था। वह चोल शासकों में महानतम था। कारैकाल के पश्चात् चोल राज्य पर अधिकार हेतु कारैकाल के पुत्र नलगिल्लि तथा नेडुजेलि
के बीच एक लंबा गृह-युद्ध छिड़ा। अंततः कारियारू के युद्ध में नलगिल्लि पराजित हुआ तथा मार डाला गया। इस युद्ध का विवरण संगम ग्रंथ मणिमेकले से मिलता है।
इनके पश्चात् के चोल राजाओं की उपलब्धियाँ नगण्य थीं। कोप्पेरूलोमन नामक शासक ने गृह कलह से तंग आकर आत्मदाह कर लिया था। पेरूनरकिल्ल नामक शासक ने राजसूय यज्ञ किया था। कोच्चेगनान या शेष्गणान शैव मतानुयायी था, साथ ही उसने सात मंदिरों का भी निर्माण कराया था। एलारा नामक शासक ने श्रीलंका को विजित किया था, परंतु इन सभी की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। उपर्युक्त सभी उपलब्धियाँ कवि की कल्पना भी हो सकती हैं। संगमयुगीन शासकों में चोल शासकों ने तीसरी-चौथी सदी तक शासन किया। तत्पश्चात् उरैयर के चोल वंश का इतिहास 9वीं शताब्दी तक अंधकारमय हो जाता है, जबकि विजयालय के नेतृत्व में पुनः चोल वंश का पुनउत्पाद या पुनरुत्थान हुआ था।
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