संगम कालीन समाज - Sangam society

संगम कालीन समाज - Sangam society


संगम साहित्य से हमें संगम कालीन समाज की जानकारी मिलती है। वर्ण एवं जाति व्यवस्था-संगम कालीन समाज चार वर्णों में विभाजित था-


1. अरसर (शासक वर्ग)


2. अंडनर (ब्राह्मण वर्ग)


3. वेलालर (कृषक वर्ग)


4. वेनिगर (व्यापारी वर्ग)


इस समय शासक वर्ग के अंतर्गत राजा की स्थिति सर्वोपरि थी। ब्राह्मण वर्ग का उदय हो चुका था तथा समाज में उसकी अत्यधिक प्रतिष्ठा थी।

अनेक ब्राह्मण कवि भी थे, जो राजा की प्रशंसा में कविताएँ लिखकर पुरस्कार पाते थे। चोल राजा कारैकाल ने एक कवि को पुरस्कार स्वरूप 16 लाख मुद्राएँ प्रदान की थीं। धन के अतिरिक्त उन्हें भूमि, अश्व, रथ, हाथी भी पुरस्कार स्वरूप दिए जाते थे, उनका काम यज्ञ आदि कराना था। अनेक वैदिक यज्ञ प्रचलित थे। ब्राह्मण माँस भक्षण करते थे, सुरा पीते थे, परंतु तत्युगीन समाज में यह निदंनीय नहीं माना जाता था।


ब्राह्मण वर्ग के पश्चात् वेलालर (कृषक) वर्ग का स्थान था। यद्यपि उनका मुख्य व्यवसाय कृषि था, तथापि कुछ धनी किसान भी थे,

जिनके राजघरानों में वैवाहिक संबंध थे इनमें से कुछ महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर भी थे। वेलालर वर्ग में एक दूसरा निर्धन किसानों का वर्ग भी था, जो अपनी भूमि के अभाव में धनी किसानों (वल्लाल) की भूमि पर खेती करते थे।


संगम साहित्य में व्यापारी वर्ग (वेनिगर) की सामाजिक प्रतिष्ठा अच्छी नहीं थी, उन्हों शूद्रों की कोटि में रखा गया था। इन चार वर्णों के अतिरिक्त समाज में कुछ अन्य वर्ग भी थे। संगम साहित्य में पुलैयन नामक दस्तकारों के एक वर्ग का उल्लेख मिलता है

जो रस्सी तथा पशु चर्म की सहायता से चारपाई एवं चटाई बनाने का कार्य करते थे। चरवाहों तथा शिकारियों का अलग वर्ग होता था। शिकारियों की एक जाति 'एनियर' का भी उल्लेख मिलता है। एक अन्य जाति 'मरवा' थी जो अशिक्षित थी एवं लूटपाट करती थी। बंदरगाहों के पास कुछ यवन जातियाँ हिंदयवन, अरब आदि बस गई थीं।


जाति के समूह को उनके प्रांतीय मूल के नाम से जाना जाता था। पर्वतीय क्षेत्र के लोगों को 'कुटिजी, रेगिस्तान क्षेत्र के लोगों को पालै तथा समुद्री क्षेत्र के लोगों को 'नैइडल' कहा जाता था।

तोलकाप्पियम नामक ग्रंथ में विभिन्न तत्कालीन जातियों का उल्लेख मिलता है। इन जातियों में 'टुडियान', 'पानन', 'परैथान' एवं 'कादंबन' आदि प्रमुख थीं।


विवाह - तोलकाप्पियम ग्रंथ से ज्ञात होता है कि संगम युग में विवाह को संस्कार के रूप में मान्यता प्राप्त हो गई थी। इस ग्रंथ में हिंदू धर्मशास्त्रों में वर्णित विवाह के आठों प्रकारों का वर्णन मिलता है। स्त्री-पुरुष के स्वाभाविक प्रणय एवं उससे संबंधित विभिन्न अभिव्यक्तियों को पाँच तिर्णे, एकपक्षीय प्रणय को 'has' तथा अनुचित प्रणय को पेरुंदिणे' कहा जाता था ।


निवास - मकानों का निर्माण शास्त्रीय नियमानुसार होता था।

संपन्न वर्ग के लोग पक्की ईंटों से निर्मित मकान की ऊपरी मंजिल में रहते थे। निचली मंजिल का प्रयोग व्यापारिक कार्यों हेतु करते थे। निर्धन लोग साधारण कोटि के कच्चे मकानों में रहते थे।


शिक्षा- छात्रों को 'पिल्लै' अथवा 'भाण्यनन' तथा शिक्षकों को कणक्कार कहा जाता था। मंदिरों में शिक्षा दी जाती थी। गुरु की सेवा एवं गुरुदक्षिणा भी प्रचलित थी। समाज के सभी वर्गों में शिक्षा का प्रसार था। छात्र व्याकरण, साहित्य, गणित, ज्योतिष विज्ञान आदि की शिक्षा ग्रहण करते थे।


स्त्रियों की दशा- संगम कालीन साहित्य से ज्ञात होता है कि स्त्रियों की दशा अच्छी थी।

अष्ट पदावली के संग्रह में महिला कवयित्रियों की भी कविताएँ हैं। तमिल साहित्य में 'नेच्चेलियर' तथा 'ओवैयर' जैसी कवयित्रियों का उल्लेख प्रमाणित करता है कि इस काल की स्त्रियाँ सुशिक्षित होती थीं, परंतु इस युग में विधवाओं की स्थिति दयनीय थी, उनके लिए कई नियमों का विधान था। बाल मुड़वा दिए जाते थे, बिस्तर पर शयन, आभूषण पहनना, अच्छा भोजन करना उनके लिए वर्जित था। इसी कारण विधवाएँ मर जाना बेहतर समझती थीं। संभवत: इसीलिए समाज में सती प्रथा प्रारंभ हुई। वेश्यावृति प्रचलित थी। कुछ महिलाएँ नृत्य-गान द्वारा जीवनयापन करती थीं। शीतलै सत्तनार में माधवी नामक नर्तकी का उल्लेख मिलता है।

कुछ खियाँ बौद्ध भिक्षुणी भी थीं। मणिमेकलै की नायिका बाद में बौद्ध भिक्षुणी बन जाती है। उसकी माँ माधवी भी बौद्ध भिक्षुणी थी। स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार नहीं था। राजा के अंगरक्षक के रूप में उनकी नियुक्ति होती थी। चेर शासक सेंगुडवन (लाल चेर) ने 'कण्णगि पूजा अर्थात् पत्नी पूजा प्रारंभ की थी, जो कि निश्चित तौर पर स्त्रियों के सम्मानीय स्थान होने का सूचक है।


खान-पान- शाकाहारी एवं माँसाहरी दोनों प्रकार का भोजन संगम युग में प्रचलित था तथा ब्राह्मण भी माँस खाते थे। मदिरा और ताड़ी प्रिय पेय थे। चावल मुख्य खाद्य पदार्थ था। चावल को दूध में मिलाकर सांभर नामक खाद्यान तैयार किया जाता था।


मनोरंजन के साधन - कविता, नाटक, नृत्य, संगीत, कुश्ती, मुक्केबाजी, शतरंज, शिकार, गेंद और गोली आदि मनोरंजन के कुछ प्रमुख साधन थे। शतरंज वृद्ध लोगों का प्रिय खेल था। गीत एवं नृत्य धनी लोगों का प्रमुख शौक था। नर्तक- नर्तकियों तथा गायकों के दल घूम-घूम कर लोगों का मनोरंजन किया करते थे। संगम साहित्य में उन्हें 'पाणर' तथा 'विडैलियर' कहा गया है। काव्य पाठ भी लोगों का मनोरंजन का साधन था।


मृतक संस्कार अग्निदाह एवं समाधिकरण दोनों ही विधियों से मृतक का संस्कार किया जाता था। शवदाह के पश्चात् अस्थियों को मंजुषा अथवा 'कलश' में रखकर समाधिस्थ भी किया जाता था।

कभी-कभी शवों को जानवरों के भक्षणार्थ खुला छोड़ दिया जाता था। दक्षिण भारत की महापाषाणिक समाधियों में खुदाई के दौरान शवों के साथ दैनिक उपयोग की वस्तुएँ भी प्राप्त हुई हैं। अतः सर्वश्री एच.डी. सांकलिया का विचार है कि दक्षिण भारत की महापाषाण युगीन संस्कृति (Megalithic Culture) में प्रचलित अनेक प्रथाएँ संगम युग में भी मौजूद थीं। पति की मृत्यु के पश्चात् विधवा स्त्री घास के बिछावन पर अपने मृतक पति को चावल का पिंडदान करती थी। 


धार्मिक स्थिति


संगम कालीन धार्मिक जीवन में मुख्यतः कर्मकाण्डों एवं आध्यात्मिक विचारों का समन्वय दृष्टिगोचर होता है, लेकिन कहीं-कहीं इसमें एकरूपता का अभाव भी दृष्टिगोचर होता है।

संगमकालीन दक्षिण भारत में ब्राह्मण अथवा वैदिक धर्म का प्रचलन स्पष्टतः दिखाई देता है। अनुश्रुतियों के अनुसार दक्षिण भारत में वैदिक संस्कृति को ले जोने का श्रेय अगस्त्य ऋषि को जाता है। अतः इसीलिए आज भी दक्षिण भारत में अगस्त्य ऋषि की पूजा का प्रचलन है।


संगम काल में यज्ञ आदि कर्मकांडों की प्रधानता थी। इसी कारण ब्राह्मणों का महत्व अधिक था। ब्राह्मण लोग अपना समय अध्ययन-अध्यापन में व्यतीत करते थे।

संभवतः अन्य धर्मानुयायियों से उनका वाद-विवाद भी होता था। बौद्ध एवं जैन धर्मों का भी अस्तित्व था। मणिमेकले में माधवी एवं उसकी पुत्री को बौद्ध भिक्षुणी बताया गया है। ब्राह्मण धर्म से संबंधित देवताओं विष्णु शिव, कृष्ण, बलराम, इंद्र आदि की उपासना दक्षिण भारत में भी प्रचलित थी।


दक्षिण भारत के संगमकालीन कुछ देवता निम्न हैं-


1. अर्धनारीश्वर की पूजा प्रचलित थी।


2. गुरु पूजा, वीर पूजा, सती पूजा, कण्णगि पूजा आदि प्रचलित थीं। 3. वरुण की पूजा मछुआरे तथा तटवर्ती क्षेत्र के लोग करते थे।


4. इंद्र की पूजा पुहार के वार्षिक उत्सव में की जाती थी। 5. कृष्ण की पूजा बहेलिया (शिकारी) लोग नृत्य तथा गायन के साथ करते थे।


6. मुरूगन- यह तमिल देश के प्राचीन देवता थे। इन्हें प्रारंभिक मध्यकाल में सुब्रह्मण्यम कहा जाने लगा था। बाद में स्कंद-कार्तिकेय के साथ इसका तादात्म्य स्थापित कर दिया गया। तमिल भाषा में मुरुगन शब्द का अर्थ 'कुमार' है, जो कि स्कंद का ही एक नाम है। मुरूगन का प्रतीक मुर्गा माना जाता था तथा यह भी मान्यता थी कि उसे पर्वत पर क्रीड़ा करना अत्यधिक प्रिय था। इसीलिए इसे पर्वतीय प्रदेशों का स्थानीय देवता भी कहा गया है। इसका अस्त्र बर्छा था तथा कुरवस नामक एक पर्वतीय जाति की स्त्री को मुरूगन की पत्नी माना जाता था।

संभवतः इस देवता की उपासना सुदूर दक्षिण के प्रागैतिहासिक काल से ही प्रचलित थी। मुरुगन की उपासना हेतु 'वेलनाडल' नामक उल्लासमय नृत्य काफी प्रसिद्ध था। 


7. उत्तर भारत की ही तरह कई ग्राम्य एवं लोक देवताओं की पूजा भी यहाँ प्रचलित थी, जिसमें बलि भी दी जाती थी।


8. मरियम्मा (परिया स्त्री का शरीर एंव ब्राह्मण स्त्री का सिर) चेचक की देवी थी। इसे बकरे व मुर्गे की बलि


दी जाती थी। यह परशुराम की माता एवं शीतला माता भी कहलाती थी। 


9. येल्लमा सीमा प्रदेश की देवी थी जिसे भैंस की बलि दी जाती थी। 


10. बरगद के पेड़ में देवताओं का निवास माना जाता था।


मंदिर संगम साहित्य से संगमकालीन मंदिरों का भी उल्लेख मिलता है। तमिल साहित्य में मंदिर को ‘नागर’, ‘कोट्टम’, ‘पुराई’ एवं कोली' कहा गया है। मंदिरों में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती थी। मंदिर में शिक्षा भी दी जाती थी।


संगम काल में तमिल प्रदेश में महाभारत तथा पौराणिक कथाओं का भी प्रचलन था। विष्णु का वामन अवतार, गौतम ऋषि द्वारा इंद्र को श्राप देना,

शिव द्वारा त्रिपुर राक्षस का वध एवं परशुराम द्वारा माता का सिर काटने जैसी पौराणिक कथाओं का व्यापक प्रचलन था। कर्म तथा पुनर्जन्मवाद में लोगों की आस्था थी।


ब्राह्मण धर्म के साथ-साथ बौद्ध एवं जैन धर्म भी प्रचलित थे। इन सभी धर्मों से संबंधित मंदिर एवं विहार यहाँ अवस्थित थे। अशोक ने अपने तेरहवें अभिलेख में चेर, चोल, पांड्य राज्यों में धर्म प्रचारक भेजने का उल्लेख किया है।



शासन प्रणाली


संगम काल में वंशानुगत राजतंत्र का प्रचलन था। राजा निरंकुश होता था।

राजा को मन्नम वेंडम, कोर्टवन अथवा रैवन भी कहा जाता था। युवराज को 'कोहमन' एवं अन्य पुत्रों को 'इगो' कहा जाता था। राजसभा 'मनडाय' कहलाती थी। राजा के निम्न परामर्शदाता थे-


1. मंत्री


अमियचार


2. पुरोहित


पुरोहितर


3. सेनापति


सेनापतियार


4. राजदूत


5. गुप्तचर


दूतार


ओरार


राजा का सर्वोच्च न्यायालय राजा की सभा में मनम होता था। प्रतिवर्ष राजा का जन्मदिन मनाया जाता था, जिसे 'पेरूनल' कहते थे।