गुप्तोत्तर काल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी - Science and Technology in the Post-Gupta Period

गुप्तोत्तर काल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी - Science and Technology in the Post-Gupta Period


गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी काफी उन्नति हुई। गुप्त काल विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के विकास का ही युग था । ईपू तीसरी सदी में गणित, खगोल विद्या एवं आयुर्विज्ञान तीनों का विकास आरंभ हो गया था। गणित के क्षेत्र में प्राचीन भारतीयों की समस्त विश्व को तीन प्रमुख देन हैं-


(1) अंकन पद्धति,


(2) दशमलव पद्धति एवं


(3) शून्य का प्रयोग


गणित एवं विज्ञान-दशमलव पद्धति (Decimal System)


इसके प्रयोग का सबसे प्राचीन उदाहरण ईसा की पाँचवीं सदी के आरंभ का है। गुप्तकाल के प्रख्यात गणितशास्त्री आर्यभट्ट (476-550 ई.) इससे परिचित थे। वराहमिहिर ने भी अपने ग्रंथों में दशमलव पद्धति का उल्लेख किया है। चीनियों ने दशमलव पद्धति बौद्ध धर्म प्रचारकों से सीखी और पश्चिमी जगत ने अरबों से सीखी जब वे भारत के संपर्क में आए। ज्योतिष और गणित क्षेत्र में आर्यभट्टगुप्त युग में प्रख्यात थे। वह पटना के रहने वाले थे और 476 ई. के लगभग उनका जन्म हुआ था। आर्यभट्ट ने सर्वप्रथम बताया कि पृथ्वी गोल है एवं सूर्य नहीं अपितु पृथ्वी अपनी धुरी पर घूमती है। उन्होंने यह भी बताया कि ग्रहणों का कारण चंद्र और सूर्य को राहु अथवा केतुद्वारा ग्रसना नहीं अपितु पृथ्वी और चंद्रमा की बदलती हुई स्थितियाँ हैं।


आर्यभट्ट ने बीजगणित (Algebra), ज्यामिति (Geometry) और त्रिकोणमि (Trigonometry) में विभिन्न नवीन खोज की। इस प्रकार उन्होंने नक्षत्र विज्ञान, गणित, ज्योतिष आदि सभी क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया। उन्होंने 'आर्यभट्टीयम्' नामक ग्रंथ की रचना की, जिसका पुनः प्रकाशन बिहार रिसर्च सोसाइटी ने किया है। क्षेत्रमिति, ज्यामिति एवं त्रिकोणमिति का वास्तविक जन्मदाता आर्यभट्ट को ही माना जाता है। भौतिक विज्ञान के विकास में आर्यभट्ट के विभिन्न आविष्कार अत्यधिक सहायक सिद्ध हुए।


भारतीय अंकन पद्धति को अरबों ने अपनाया और वहीं से यह पश्चिमी देशों में प्रचलित हुई। अंग्रेजी में भारतीय अंकमात्रा को अरबी अंक (अरेबिक न्यूमरल्स) कहते हैं,

किंतु अरब लोग इसे भारत से अपनाए जाने के परिणास्वरूप हिंदुसा कहते हैं। पश्चिम में अंकमाला का प्रचार होने के बहुत समय पहले ही भारत में इसका प्रयोग हो चुका था। यहाँ तक कि अशोक के अभिलेखों में भी इसका प्रयोग किया गया था।


शून्य का आविष्कार भारतीयों ने ई.पू. दूसरी सदी में किया। अरब देशों ने शून्य का प्रयोग सर्वप्रथम 873 ई. में किया। संभवतः अरबों ने इसे भारत से ही सीखा था और तत्पश्चात् यूरोप में फैलाया। आर्यभट्ट (476-550 ई.) द्वारा किए गए गणित के अन्य आविष्कार भी अरब एवं यूरोप में भारत से ही पहुँचे।



बना दिया। वराहमिहिर अपने युग के महान ज्योतिषी हुए। वराहमिहिर ने बताया कि चंद्रमा पृथ्वी का चक्कर लगाता है और पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है। उन्होंने ग्रहों के संचार और अन्य खगोलीय समस्याओं के अध्ययन में यूनानियों की अनेक कृतियों का सहारा लिया। यद्यपि भारतीय खगोलशास्त्रियों यूनानियों के ज्ञान से लाभ उठाया तथापि उन्होंने इस ज्ञान को आगे बढ़ाया। इसी खगोलीय ज्ञान की सहायता से भारतीयों ने ग्रहों की गति का तथ्यपरक अवलोकन किया। वराहमिहिर के अन्य प्रसिद्ध ग्रंथ 'बृहज्जातकम्', 'लघुजातक', 'पंचसिद्धांतिका हैं। पंचसिद्धांतिका नामक ग्रंथ में गुप्तोत्तर काल में प्रचलित ज्योतिष के सिद्धांतों का विवरण मिलता है। वराहमिहिर मगध का रहने वाला था तथा जीविका हेतु उज्जैन आ गया था। वराहमिहिर ने तीन शाखाओं पर ग्रंथों की रचना की (तंत्र, जातक एवं संहिता), बृहतसंहिता के 14वें अध्याय में भारतीय भूगोल का दिग्दर्शन मिलता है।


इस युग का एक अन्य प्रमुख विद्वान ब्रह्मगुप्त था। वे ज्योतिषी भी थे और गणितज्ञ भी। उनके दो ग्रंथ क्रमशः 'ब्राह्मस्फुटसिद्धांत' एवं 'खंड खाद्यक हैं। अरबों को भारतीय ज्योतिष का ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्मगुप्त के इन्हीं दो ग्रंथों से हुआ। ब्रह्मगुप्त का जन्म 598 ई. में उस समय हुआ, जब गुप्त साम्राज्य का पतन हो गया था। उन्होंने 628 ई. में अपने ग्रंथों की रचना की । ब्रह्मगुप्त के पिता का नाम जिष्णुगुप्त था एवं यह भीनमाल (उत्तर गुजरात) के निवासी थे। इसीलिए उन्हें 'भिल्ल मालआचार्य' भी कहा जाता है। ब्रह्मगुप्त ने ग्रहण को चंद्रमा तथा पृथ्वी की छाया का फल बताया। वे पहले गणितज्ञ थे जिन्होंने बीजगणित को आगे बढ़ाया और ज्योतिष की गणनाओं में उसका उपयोग किया। उन्होंने बताया जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश तारों की रोशनी को फीका बना देता है,

उसी प्रकार कुट्टक अर्थात् बीजगणित जानने वाला और उसका प्रयोग करने वाला गणितज्ञ दूसरे ज्योतिषियों को पछाड़ देता है। " बाद के महान गणितज्ञ एवं ज्योतिषी भास्कराचार्य ने ब्रह्मगुप्त की प्रशंसा करते हुए उन्हें 'गणक चक्र-चूड़ामणि की उपाधि दी।


बारहवीं शताब्दी के महान गणितज्ञ एवं ज्योतिषी भास्कराचार्य का जन्म 1114 ई. में हुआ। उन्होंने 1150 ई. में महान ग्रंथ सिद्धांत शिरोमणि की रचना की, यह चार पुस्तकों में बँटा है- 


(1) पाटी गणित या लीलावती, (2) बीजगणित, ( 3 ) गोलाध्याय एवं ( 4 ) ग्रह गणित प्रथम पुस्तक का विषय अंकगणित एवं तृतीय चतुर्थ का ज्योतिष है।

भास्कराचार्य ने अपने जीवन के अंतिम समय में 'करण- कुतूहल' नामक पुस्तक लिखी, इसमें पंचांग बनाने की विधि लिखी है। इनकी रचना लीलावती (अंकगणित) इतना प्रसिद्ध हुआ कि 1587 ई. में अकबर की आज्ञा से फैजी ने इसका फारसी में अनुवाद किया। जे. टेलर महोदय ने 1816 ई. में इसका अंग्रेजी में अनवाद किया। भास्कराचार्य प्राचीन भारत के अंतिम महान वैज्ञानिक थे।


चिकित्सा शास्त्र (Medical Science)


चिकित्सा के क्षेत्र में भी गुप्त एवं गुप्तोत्तर काल में अत्यधिक प्रगति हुई। अति प्राचीन भारत में आयुर्वेद पर चरक एवं सुश्रुत के ग्रंथ चरक संहिता' एवं 'सुश्रुत संहिता प्रसिद्ध हैं।

बिंबिसार के काल में जीवक वैद्य का उल्लेख मिलता है। इसी कड़ी में चंद्रगुप्त द्वितीय के काल में महान वैद्य धन्वंतरि हुए। गुप्तोत्तर काल में भी महान वैद्य एवं आयुर्वेदाचार्य हुए जिन्होंने चिकित्साशास्त्र पर कई ग्रंथ लिखे। इस कड़ी में वाग्भट के चिकित्साशास्त्र एवं ग्रंथों के बारे में कहा गया है.


अष्टांगसंग्रहे ज्ञाते वृथा प्राक्तन्त्रयोः श्रमः। अष्टांगसंग्रहेऽज्ञाते वृथा प्राकतन्त्रयोः श्रमः ॥


अर्थात् "वाग्भट के अष्टांग संग्रह का अच्छा ज्ञान हो तो पुराने ग्रंथ पढ़ना व्यर्थ हैं और अष्टांग


संग्रह का ज्ञान न हो तो फिर पुराने ग्रंथ पढ़ने से भी कोई लाभ नहीं।

अष्टांग संग्रह में रोगों का कारण भोजन की विधि एवं रोगों के उपचार की अच्छी जानकारी दी गई है। गुप्तोत्तर काल में ही कालकल्प नामक पशु चिकित्सक ने 'हस्त्यायुर्वेद' नामक पशुओं की चिकित्सा संबंधी पुस्तक लिखी।


 रसायनशास्त्र (Chemistry)


रसायनशास्त्र का एक महान विद्वान नागार्जुन भी इसी युग की देन है। इस युग में पारे का आविष्कार हुआ। नागार्जुन ने प्रसिद्ध ग्रंथ रसरत्नागर लिखा। बाद के रसायनज्ञों ने नागार्जुन को सदैव एक महान रसायनज्ञ के रूप में याद किया। ये संभवतः 9वीं या 10वीं शताब्दी में हुए थे क्योंकि अलबरूनी ने (भारत यात्रा 1017-30 ई.) में लिखा है

कि महान रसायनज्ञ नागार्जुन उनसे 100 साल पहले हुए हैं और वे सोमनाथ के निकट दैहक स्थान के निवासी थे।


शिल्पशास्त्र एवं धातु विज्ञान (Metallurgy)


इसके अलावा धातु विज्ञान एवं शिल्पशास्त्र की भी पर्याप्त उन्नति हुई। मानसार शिल्पशास्त्र का एक उपयोगी ग्रंथ है। इसमें नक्षत्र तथा वास्तुकला का विवरण मिलता है। चंद्रगुप्त द्वितीय का मेहरौली लौह स्तंभ गुप्तकालीन धातु विज्ञान (Metallurgy) की उन्नति को दर्शाता है। यह लगभग डेढ़ हजार वर्षों से भी अधिक समय से सर्दी, गर्मी एवं बारिश को झेलते हुए ज्यों का त्यों खड़ा है। इस स्तंभ की चिकनाहट एवं इस पर जंग न लगना धातु वैज्ञानिकों के लिए आश्चर्य का विषय है।