इस्लाम में त्रियों की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति - Social, cultural, economic and political status of the triads in Islam

इस्लाम में त्रियों की सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक एवं राजनैतिक स्थिति - Social, cultural, economic and political status of the triads in Islam


कुरान (7:189) में कहा गया है कि खुदा ने तुम्हें एक आत्मा से रचा है तथा उसी आत्मा से तुम्हारा साथी भी रचा है, जिसके साथ वह हमनवा हो सकता है। कुरान (42:11) में यह भी कहा गया है कि स्वर्ग और पृथ्वी का सृजन करने वाले खुदा ने तुम्हारे लिए तुम्हारे अंदर से ही तुम्हारा जोड़ा बनाया है।" (द्रष्टव्य : The status of Women in Islam, Dr. Jamal Badawi; Al- Itsihad, vol. 8, No. 2, Sha ban 1391 / sept 1971)


कुरान की उक्त मान्यता भारतीय अर्द्धनारीश्वर' की अवधारणा जैसी है, जिसका सूत्रवाक्य यह . 'एकोहं बहुस्यामः।'


इस्लाम में यों तो स्त्री-पुरुष की समानता की बात कही गई है, लेकिन फिर भी हर धर्म की तरह यहाँ भी लैंगिक आधार पर कार्यों, श्रम का बँटवारा व्यावहारिक तौर पर मिलता है। स्त्री की जगह घर में मानी गई है; जहाँ की वह स्वामिनी है और बाह्य जगत का काम पुरुष के जिम्मे है। यह एक सामान्य परिपाटी रही है। इससे स्त्रियों के अवसर, अधिकार कम हो जाते हैं, किंतु यह अटल नियम नहीं है। समय के अनुसार स्त्रियों की भूमिका में बदलाव आया है तथा वे घर के बाहर के कार्य- नौकरी इत्यादि भी कर रही है तथा मौजूदा समय में अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जिनसे पता चलता है कि सार्वजनिक जीवन में, प्रशासनिक पदों पर, शासनाध्यक्ष के रूप में, व्यावसायिक दुनिया में मुस्लिम स्त्रियों ने महत्व पूर्ण भूमिका अदा की है।


स्त्री-शिक्षा- कुरान तथा पैगंबर मुहम्मद दोनों ही स्त्री एवं पुरुष दोनों के शिक्षा / ज्ञान प्राप्त करने के अधिकार की वकालत करते हैं। (Jawad Haifaa (1998) The Rights of Women in Islam: An Authentic Approach, Londan, Palgrave Macmillan. P. 8 ISBN 978-0333734582) | कुरान जैविक लिंग से ऊपर उठकर समस्त मुस्लिमों को ज्ञान की खोज का प्रयास करते रहने का निर्देश देती है। कुरान शरीफ़ मुस्लिमों को लगातार पढ़ने, सोचने तथा प्रकृति में खुदा के चिह्नों को अधिगमित करने की प्रेरणा देती है। (वही, पृ. 3) पैगंबर मुहम्मद स्त्री और पुरुष दोनों की शिक्षा को प्रोत्साहन देने की बात करते हैं। (वही)।

पैगंबर ने यह भी कहा कि पुरुषों की तरह स्त्रियाँ भी ज्ञान प्राप्त करें, अपनी बुद्धि-जीविता को विकसित करें, अपने दृष्टिकोण का विस्तार करें तथा इन सबसे लैस अपनी प्रतिभा एवं बुद्धिमत्ता का अपने स्वयं के तथा समाज के हित में इस्तेमाल करें। (वही; पृ. 20)1


स्त्री और रोजगार - इस्लाम में स्त्री को रोजगार करने की छूट है बशर्ते कि उससे उनके मूलभूत कर्तव्यों माँ एवं पत्नी के रूप में घर के दायित्व पर कोई आंच न आए (Al Qwadawy, Yusuf The Status of Women in Islam. Chapter: the Women as Member of the Society: when is a Women allowed work?)


कुरान (28:23) में एक वाकया आया है, जिसमें दो लड़कियाँ अपने जानवरों को पानी पिलाने एक मदयन पर मौजूद दिखाई गई हैं। इस वाक्य से यह स्पष्ट होता है कि स्त्रियाँ घर से बाहर काम पर जाती थीं।


इस्लाम के लंबे इतिहास में अनेक मुस्लिम देशों में ऐसे उदाहरण मिलते हैं, जहाँ स्त्रियाँ पुरुषों की तरह ही अनेक तरह के काम करती रही हैं। जैसे योद्धा के रूप में इतिहास में अनेक ऐसी मुस्लिम स्त्रियाँ हुई हैं, जिन्होंने सैनिक एवं जनरल के रूप में युद्धों में भाग लिया। (Girl Power ABC News)


आज के आधुनिक समय में दुनिया भर में मुस्लिम औरतों के लिए रोजगार के अवसर बढ़े हैं। वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम की 2012 की रपट तथा अभी हाल की अन्य रिपोर्ट्स के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अनेक देश अपने यहाँ की मुस्लिम औरतों के लिए आर्थिक एवं नौकरी के अवसर बढ़ाने में लगे हैं। आज अनेक देशों में महत्वपूर्ण व्यावसायिक प्रबंधन पदों, जैसे- सी.ई.ओ, निदेशक, अध्यक्ष, संस्थापक सदस्य आदि के बतौर मुस्लिम महिलाएँ नियुक्त एवं कार्यरत हैं। सन् 2014 की इंटरनेशल बिजनेस रिपोर्ट से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि अनेक देशों में बड़ी संख्या में मुस्लिम औरतें विभिन्न महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।


विवाह - इस्लाम में स्त्री के विवाह की उम्र अनेक प्रथाओं, विद्वानों एवं मान्यताओं के हिसाब से अलग-अलग है, लेकिन अब ज्यादातर मुस्लिम विद्वान यह मानते हैं कि जब लड़की यौन रूप से परिपक्व हो जाए, वही उसकी शादी की उम्र है। हर लड़की के हिसाब से यह अलग-अलग भी हो सकती है। 12 से लेकर 15 वर्ष तक की उम्र सामान्यतः विवाह की उम्र मानी गई है। (A.A. Ali, Child Marriage in Islamic Law, The Institute of Islamic studies, Mc Gill University (Canada), August 2000, see pages 16-18.) किंतु एक तरह से यह बाल-विवाह ही तो है। जैसे कि पूर्व में भी कहा गया- इस्लाम में स्त्री को अपना वर चुनने का अधिकार है।

उसका निकाह उसकी सहमति से ही हो सकता है। उस पर कोई विवाह थोपा नहीं जा सकता। इस्लाम में विवाह (निकाह) एक अनुबंध है।


राजनीति में स्त्री विश्व के अनेक देशों में मुस्लिम स्त्रियों ने राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस्लाम में स्त्रियों के राजनीति में आने की मनाही नहीं है। पहले कहा गया है कि इस्लाम के इतिहास में रज़िया सुल्तान जैसी महिला भी हुई है, जो एक समय दिल्ली की सुल्तान थी। रजिया सुल्तान के अलावा शजारत अंदर (मिश्र), ताज उल आलम (अक्का) ऐसे अन्य उदाहरण हैं। यह एक भ्रम है कि इस्लाम में स्त्री को नेतृत्व दिए जाने की मनाही हैं।

कुरान (27:23) में कहा गया है- “मैंने एक स्त्री को उन पर शासन करते पाया। उसे हर चीज प्राप्त है और उसका एक बड़ा सिंहासन है।" स्पष्ट है कि स्त्री नेतृत्व हानिकारक नहीं, बल्कि बरकत देने वाला होता है। अल तबारी जैसे खाँटी इस्लामिक विद्वान भी स्त्री को नेतृत्व दिए जाने का समर्थन करते हैं। (Anne Sofia Roald, Women in islam, The western Experience, pp. 186-07)। इस्लाम के लंबे इतिहास में ऐशा (Aisha) उमे वर्क, (Ume Warga), सामरा बिते वहाब जैसी अनेक महिलाएँ हुई हैं, जिन्होंने राजनैतिक गतिविधियों में हिस्सेदारी की थी।


आधुनिक काल में अनेक देशों में मुस्लिम महिलाएँ राजनैतिक नेतृत्व के सर्वोच्च शिखर पर पहुँची हैं।

इनमें पाकिस्तान की प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो इंडोनेशिया की राष्ट्रपति मैगावती सुकर्णोपुत्री, कोसोबा की राष्ट्रपति एटीफेट जाह जगा, बाँग्लादेश की प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया तथा शेख हसीना, तुर्की की प्रधानमंत्री तानसु सिलर किर्गीज़िस्तान की राष्ट्रपति रोजा ओटनबाएवा आदि-आदि उल्लेखनीय नाम हैं।


वर्तमान में अनेक मुस्लिम बहुल देशों में ऐसे कानून हैं, जो अपने यहाँ की मुस्लिम स्त्रियों को संसदीय एवं अन्य राजनैतिक प्रक्रियाओं एवं मंचों पर प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करते हैं।

अनेक देशों में स्त्रियों के लिए राजनैतिक नेतृत्व में आरक्षण की भी व्यवस्था है। यह आरक्षण 30 से 50 प्रतिशत तक का है। इंडोनेशिया, ट्यूनीशिया, अल्जीरिया, सेनेगल आदि देश इसके उदाहरण हैं। हालाँकि खाड़ी के अरब देशों में महिला नेतृत्व की स्थितियाँ शोचनीय हैं। इनमें अनेक देशों में तो बहुत देर से महिलाओं को मताधिकार दिया गया था।


इस्लाम की स्त्री-संबंधी पहल यह एक विचारणीय तथ्य है कि इस्लाम से पूर्व की सभ्यताओं एवं धर्मों में स्त्रियों की स्थिति क्या थी। इस संबंध में हिंदू यूनान व रोमन सभ्यताओं पर विचार किया जा सकता है।


प्रसिद्ध इस्लामिक विद्वान डॉ. जमाल बडावी ने अपने प्रसिद्ध लेख 'The Status of Women in Islam' में इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका के हवाले से कहा है कि “भारत में पराधीनता एक आधारभूत सिद्धांत रहा है। मनु कहता है कि स्त्री को उसके संरक्षकों द्वारा दिन-रात निर्भरता की स्थिति में रखना चाहिए। उत्तराधिकार का नियम पितृमूलक रहा है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी पुरुषों में रहता है; स्त्रियाँ इससे बहिष्कृत हैं।” (The Encyclopedia Britannica, 11th ed1911,vol.28,p.782)


हिंदू धर्म ग्रंथों में एक श्रेष्ठ पत्नी की पहचान यह बताई गई है वह स्त्री जिसका मस्तिष्क,

वाणी एवं देह पराधीनता में आबद्ध हो, वही श्रेष्ठ स्त्री मानी जाती है।” (Mace, David and Vera, Marriage East and west Dolphin Boobs, Doubleday and co., Inc., N.Y., 1960)


यूनानी संस्कृति में भी स्त्री की स्थिति अच्छी नहीं थी। वहाँ भी उनकी स्थिति भारतीय एवं रोमन स्त्रियों जैसी ही थी। “यूनानी खियाँ सदैव अवयस्क मानी जाती रही हैं; अपने पिता, भाई या अन्य पुरुष- गोत्रियों के तहता (Allen, E. A., History of Civilization, vol. 3p. 444)। विवाह के मामले में उसकी सहमति / स्वीकृति का अधिकार उसे प्राप्त नहीं था। उसे अपने माता-पिता की इच्छानुसार जिस पुरुष का चुनाव उसके पति के रूप में वे करते थे,

उसके साथ उसे विवाह करना पड़ता था, जो कि उसके लिए नितांत अपरिचित होता था। (वही; पृ.443) |


रोमन स्त्री/पत्नी के विषय में इस प्रकार का वर्णन आता है कि "वह एक बच्ची, अवयस्क या एक ऐसा व्यक्ति है" जो अपने विवेक से कोई काम करने की क्षमता नहीं रखती। वह एक ऐसा व्यक्ति है, जो निरंतर अपने पति के संरक्षण एवं अभिभावकत्वमें रहती आती है। (वही, पृ. 550) अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'The Subjection of Women' में जॉन स्टुअर्ट मिल ने लिखा है- यह कहा जाता है कि सभ्यता और ईसाइयत ने स्त्रियों को उनके हक दिलाए,

किंतु सच्चाई यह है कि पत्नी अपने पति की वास्तविक बँधुआ मजदूर बनी हुई है। उसकी कानूनी स्थिति गुलामों जैसी है।' (Mace david and vera, Marriage East & West-Dolfin Boobs, Doubleday and co. Inc. N.Y. 1960, पृ. 82-83)। वर्जीनिया वुल्फ ने भी अपनी पुस्तक 'द रूम ऑफ वन्स ओन में इसी प्रकार के विचार व्यक्त किए हैं।


इस्लाम ने उक्त तीनों सभ्यताओं से आगे बढ़ते हुए स्त्रियों को पर्याप्त व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक अधिकार दिए तथा उसकी अस्मिता को एक नई पहचान दी।