महाकाव्य-काल में स्त्रियों की स्थिति - Status of women in the epic period
महाकाव्य-काल में स्त्रियों की स्थिति - Status of women in the epic period
महाकाव्य काल के अंतर्गत 'रामायण' एवं 'महाभारत' शीर्षक महाकाव्यों में स्त्रियों की स्थिति के
विषय में पर्याप्त चर्चा की गई है। इन दोनों महाकाव्यों के केंद्र में स्त्री है। रामायण में सीता और महाभारत में द्रौपदी। महाकाव्य-काल में वेदकालीन स्त्री-संबंधी व्यवस्थाएँ धारणाएँ, मान्यताएँ आदि पर्याप्त स्तर पर जारी
रहती हैं यद्यपि इनमें कतिपय परिवर्तन भी उपस्थित हुए। इस विषय में निम्नलिखित बिंदुओं पर विचार किया जा सकता है-
(1) शिक्षा का अधिकार उच्च कुल की स्त्रियों को विविध प्रकार की शिक्षाएँ प्राप्त करने का अधिकार था।
इस काल में उच्चकुलीन स्त्रियाँ विविध प्रकार की विद्याओं में निपुण होती थीं। इस संदर्भ में राजा भोज की पुत्री कुंती का नाम लिया जा सकता है, जो अत्यधिक विदुषी एवं गुणवती थी। उसने अपने श्रम और बुद्धिमत्ता से वशीकरण मंत्रतक प्राप्त कर लिया था। विख्यात है कि उसने अपने आतिथ्य सत्कार से दुर्वासा जैसे क्रोधी ऋषि को प्रसन्न किया और उनसे मनचाहा वर प्राप्त करने का वरदान प्राप्त किया। इसके लिए उन्होंने कुंती को वशीकरण मंत्र दिया, जिसके द्वारा वह किसी भी देवता को वश में करके उससे पुत्र प्राप्त कर सकती थी। (महाभारत, आदिपर्व, अध्याय-110) 1
इसका दूसरा उदाहरण द्रौपदी है, जो पांडवों की पत्नी थी।
जब पांडव उसे द्यूत-क्रीडा में दाँव पर लगाकर हार जाते हैं और जब दुःशासन उसे घसीटकर सभा में लाता है, तब वह सभा में उपस्थित गुरुजनों से धर्म-विषयक प्रश्न करती है तथा उन्हें धिक्कारती है। (महाभारत, सभापर्व, अध्याय-69)। इस घटना से स्पष्ट होता है कि द्रौपदी एक उच्चशिक्षित विदुषी स्त्री थी। उसे धर्मविषयक गूढ़ बातों का व्यवस्थित ज्ञान था। इसके अतिरिक्त इस घटना से यह भी स्पष्ट होता है कि गंभीर ज्ञान से स्त्री में एक प्रकार की निर्भीकता आती है, उसमें आत्मविश्वास उत्पन्न होता है व दृढ़ता आती है। द्रौपदी हस्तिनापुर की राजसभा में उपस्थित महारथियों से चुनौतीपूर्ण सवाल पूछती है तथा उन्हें निरुत्तर कर देती है।
(2) हिंदू-परंपरा में खियों के आत्मसम्मान की सुरक्षा की सुदृढ व्यवस्था है। स्त्रियों के सम्मान की रक्षार्थ यहाँ भी हुए युद्ध हैं। महाकाव्य काल इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। रामायण एवं महाभारत दोनों के महायुद्धों के मूल में स्त्रियाँ ही हैं। भारतीय इतिहास के ये दोनों महानतम युद्ध स्रियों के सम्मान की रक्षा के लिए ही किए गए थे। रामायण में राम-रावण के बीच का युद्ध सीता के कारण हुआ, जिसमें रावण मारा गया। महाभारत युद्ध द्रौपदी के सम्मान की खातिर हुआ, जिसमें कौरवों की पराजय हुई।
(3) महाकाव्य-काल में एक विशेष स्थिति दृष्टिगोचर होती है।
सामान्यतः यज्ञ के समय पति सपत्नीक वेदी पर बैठते थे। अकेला पुरुष पति यज्ञ संपन्न नहीं करवा सकता था, किंतु इस काल में ऐसे उदाहरण मिलते हैं कि स्त्रियों ने बिना किसी पुरुष पति की सहवर्तिता के यज्ञ कराए हैं। जैसे कि रामायण में कौशल्या ने अपने पुत्र राम के लिए अकेले यज्ञ किया तथा तारा ने अपने पति बाली के लिए अकेले यज्ञ किया। यह अधिकार स्त्रियों ने पाया, किंतु पुरुष बिना पत्नी के यज्ञ कर नहीं सकते थे। इसका तात्पर्य यह हुआ कि स्त्रियाँ चाहें तो कोई भी अधिकार प्राप्त कर सकती हैं।
(4) महाकाव्य-काल में स्त्रियाँ विदुषी होने के साथ-साथ वीरांगनाएँ भी हुआ करती थीं।
उस समय की युवतियाँ युवकों की भाँति ही शस्त्र-विद्या में भी निपुण पाई जाती हैं। वे पुरुषों की भाँति ही शस्त्र-विद्या का प्रशिक्षण लेती थीं और युद्ध में लड़ने भी जाती थीं। कैकेयी का उदाहरण इस संदर्भ में लिया जा सकता है। कैकेयी दशरथ के साथ न केवल युद्ध भूमि में जाती थीं, बल्कि एक बार उन्होंने अपने शौर्य से दशरथ की प्राणरक्षा भी की थी। इस प्रकार के उदाहरण और भी हैं। इन उदाहरणों से यह स्पष्टतः सिद्ध होता है कि बाहुबल के आधार पर पुरुष श्रेष्ठता की धारणा निराधार है तथा भारत में प्राचीन काल में ही इसे नकार दिया गया था। बाहुबल में स्त्रियाँ भी पुरुषों के समान ही सक्षम थीं।
(5) महाभारत काल में स्त्रियों का सम्मान अत्यधिक था। कोई उनकी अवमानना नहीं कर सकता था।
किसी पुरुष 'पति ने यदि उन्हें कोई वचन दिया है, या उनसे कोई वादा किया है, तो उसे पूरा करना पुरुष / पति के लिए अपरिहार्य होता था। यहाँ तक कि यदि इस प्रक्रिया में उसके प्राण भी चले जाएँ, तो यह आश्चर्य की बात नहीं मानी जाती थी। रामायण में दशरथ कैकेयी प्रसंग इसका अन्यतम उदाहरण है जिसके अंतर्गत अपने वचन की प्रतिपूर्ति की प्रक्रिया में राजा दशरथ को अपने प्राण गँवाने पड़ते हैं। (6) महाभारत काल में स्त्रियों को पर्याप्त विविध स्तरीय सुविधाएँ, महत्व, सम्मान एवं अधिकार उपलब्ध थे, जैसे- विवाहिता के रूप में। इस संबंध में कहा गया है कि वह घर घर नहीं, जिसमें पत्नी नहीं' तथा यह भी कि गृहिणीहीन घर जंगल है "।
इसके अतिरिक्त महाभारत काल में स्त्रियाँ सामाजिक संबंध स्थापित करने के लिए स्वतंत्र थीं। खुला यौनाचार तो नहीं था, लेकिन अपनी ओर से प्रणय निवेदन करना स्त्रियों के लिए वर्ज्य नहीं था। वे स्वयंवर द्वारा अपना वर चुनने के लिए स्वतंत्र थीं। संतानोत्पत्ति के लिए नियोग प्रथा प्रचलित थी, जो स्त्री स्वतंत्रता का एक प्रारूप माना जा सकता है । पर्दा प्रथा नहीं थी। स्त्रियाँ अपेक्षाकृत खुली हवा में साँस लेती थीं। (7) महाभारत काल में स्त्रियों को राज्य तंत्र में भी महत्वपूर्ण पद प्राप्त हो सकते थे। इसका उदाहरण
पूतना है, जो मथुरा के राजा कंस के गुप्तचर विभाग की मुखिया थी।
इस काल में विधवा स्त्रियों को पुनर्विवाह का अधिकार था।
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