पुराणों में स्त्रियों की स्थिति - Status of women in Puranas

पुराणों में स्त्रियों की स्थिति - Status of women in Puranas


पुराण काल में स्त्रियों को देवी के रूप में प्रकल्पित किए जाने के उदाहरण मिलते हैं। पहले मार्कंडेय पुराण के 'देवी माहात्म्य' और फिर 'देवी भागवत पुराण में स्त्री को देवी के रूप में प्रकल्पित किए जाने की स्थिति देखी जाती है। इसे हिंदूधर्म की शक्ति-परंपरा के बतौर देखा जाता है। इस धारणा के अनुसार इस सृष्टि की अधिष्ठात्री शक्ति देवी स्वरूप है। उसका वर्चस्व बहुआयामी है। वह असुरों और पाप का सर्वनाश करने वाली है। उसके विभिन्न रूप हैं।

वह दुर्गा भी है, चंडिका भी है, अंबिका भी है, भद्रकाली भी हैं, इश्वरी, भगवती, श्री व देवी भी है। इनके अतिरिक्त अन्य प्रारूपों में भी स्त्री अधिष्ठान प्रकल्पित किया गया, जैसे- लक्ष्मी धन-संपदा और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री देवी और सरस्वती ज्ञान, प्रतिभा, कला, संस्कृति इत्यादि की अधिष्ठात्री देवी मानी गई।


पुराणों की इस धारणा की उत्पत्ति स्त्री को शक्तिशाली बनाने एवं मानने के उद्देश्य से हुई प्रतीत होती है। जीवन की लगभग समस्त सरणियाँ इनमें सम्मिलित हैं। आगे आने वाले समय में इन रूपकों और मिथकों का भारी प्रभाव हिंदूजनमानस पर पड़ा।