वैदिक साहित्य में स्त्रियों की स्थिति - Status of women in Vedic literature

वैदिक साहित्य में स्त्रियों की स्थिति - Status of women in Vedic literature


प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों में वैदिक साहित्य परिगणित किया जाता है, जिसके अंतर्गत वेद एवं उपनिषद सम्मिलित है। वेद चार हैं, जिनके नाम इस प्रकार हैं- 1. ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद । उपनिषद 108 माने गए हैं, जिनमें ऋग्वेद के 10, सामवेद के 16, शुक्ल यजुर्वेद के 19, कृष्ण यजुर्वेद के 32, अथर्ववेद के 31 । इनमें से प्रथम दस यानी ऋग्वेद के उपनिषदों को मुख्य उपनिषद कहा जाता है। 2.2.3.1. वेद विभिन्न वेदों में निहित स्त्री के संबंध में जो कुछ कहा गया है जो स्थापनाएँ, प्रावधान, धारणाएँ एवं अभिमत व्यक्त किए गए हैं, उनका बिंदुवार विवरण इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-


1. वैदिक काल में कोई भी धार्मिक कार्य स्त्री अर्थात् पत्नी की उपस्थिति के बिना प्रारंभ एवं संपन्न नहीं होता था। यह प्रथा हिंदू मतावलंबियों में आज भी यथावत् जारी है।


2. वेद स्त्रियों को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण अधिकार पुरुषों के समान देता है। इस संबंध में


निम्नलिखित उदाहरण द्रष्टव्य हैं-


(i) जो पति-पत्नी समान मनवाले होकर यज्ञ करते हैं, उन्हें अन्न, पुष्प, हिरण्य आदि की कमी नहीं


रहती। (ऋग्वेद 813115-8) 1


(ii) विवाह यज्ञ में वर-वधू उच्चारण करते हुए एक-दूसरे का हृदय स्पर्श करते हैं। (ऋग्वेद


10185147)


(ii) विद्वान लोग पत्नी सहित यज्ञ में बैठते हैं और नमस्करणीय को नमस्कार करते हैं। (ऋग्वेद


117215)


 (iv) 'स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ' अर्थात् स्त्री यज्ञ की ब्रह्मा बनें। (ऋग्वेद 8133119)। 


3. वेदों में धर्म एवं राजनीति से जुड़े मामलों में पुरुष के समान ही महत्व एवं अवसर दिए जाने की बात कही गई है।


4. वैदिक युग में लड़कियों को लड़कों की तरह ही शिक्षा प्राप्ति का अधिकार प्राप्त था। स्त्रियों को पुरुषों की तरह ही हर प्रकार की विद्या और शिक्षा उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान था। जैसे- वेद-ज्ञान, धनुर्विद्या, नृत्य, संगीत-शास्त्र आदि। इस संबंध में निम्नलिखित तथ्य द्रष्टव्य हैं


(1) ईस्वी सन् के आरंभ तक लड़कियों का उपनयन संस्कार होता था और उन्हें वेदों का अध्ययन करने की भी लड़कों के समान ही अनुमति होती थी। (अल्टेकर; पृष्ठ 9-10 ) । उपनयन संस्कार के बाद ही लड़कियों की विधिवत शिक्षा का आरंभ होता था। वैदिक काल में उनका उपनयन संस्कार अपनी पूर्णावधि के साथ ही होता था।

लड़कियाँ भी गुरुओं के आश्रम में रहकर ब्रह्मचर्य का पालन करती हुई यज्ञोपवीत, मौंजी, मेखला और वल्कल धारण करती थीं। ऋक्-यजु - अथर्व संहिताओं में ब्रह्मचारिणी नारियों का उल्लेख है। अथर्ववेद में एक स्थान पर कहा गया है, “ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर शिक्षा समाप्त करने वाली कन्याएँ योग्य पति को प्राप्त करती हैं।" ("ब्रह्मचर्येण कन्यानम् युवाविन्दते पतिम्।"- अथर्ववेद 11/7/18) “जो छात्राएँ अधिक से अधिक संहिताओं के मंत्रों की पंडिता होती थीं उन्हें "बहुवची' की उपाधि दी जाती थी।" (चतुर्वेदी अनुराधा 'वैदिक एवं आर्ष महाकाव्य युग में स्त्रियों की शिक्षा' शीर्षक लेख;

एचटीटीपी://feministfeministफेमिनिस्ट- पोयम्स-आर्टिकलस / ब्लागस्पाट | इन /2012/10/ ब्लॉग पोस्ट 22hmtlhmti hmti एचएमटीएल)। (2) प्राचीन वैदिक काल में स्त्रियाँ पुरुषों के समान ही मंत्रद्रष्ट्री होती थीं। उनमें से कुछ के नाम वैदिक संहिताओं में भी आए हैं। (अल्टेकर; पृष्ठ 10)। अनेक ऋषिकाएँ ऐसी हुई हैं, जिन्होंने ऋग्वेद के सूक्तों की रचना की, जैसे- लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिकता निवावरी, घोषा आदि। इनके द्वारा जिन सूक्तों की रचना की गई. उनका विवरण इस प्रकार है-


लोपामुद्रा प्रथम मंडल का 179 वाँ सूक्त विश्ववारा आत्रेयी- पंचम मंडल का 28वाँ सूक्ता अपाला आत्रेयी- अष्टम मंडल का 91वाँ सूक्त।

घोषा काक्षीवती- दशम मंडल का 39वाँ तथा 40वाँ सूक्ता शची पौलोमी - दशम मंडल का 149वाँ सूक्त (आत्मस्तुति ) । सूर्या सावित्री- दशम मंडल का 85वाँ सूक्ता वैदिक काल की महान दार्शनिक गार्गी ने गार्गी संहिता' नामक पुस्तक लिखी।


(3) वैदिक काल में विशेषतः क्षत्रिय स्त्रियाँ धनुर्वेद अर्थात् धनुर्विद्या की भी शिक्षा ग्रहण करती थीं तथा युद्ध में भी भाग लेती थीं। जैसे- ऋग्वेद के दशम मंडल में 102वें सूक्त में राजा मुगल एवं मुगलानी की कथा वर्णित है। वह उसे युद्ध में विजय दिलाती है। इसी प्रकार शशीयसी का (ऋग्वेद 5161 ) तथा वृत्तासुर की माता 'दनु' का (ऋग्वेद, 1/32/9) वर्णन है,

जिन्होंने युद्ध में भाग लिया तथा इंद्र के हाथों वीरगति को प्राप्त हुई। यजुर्वेद ( 1115118 ) में कहा गया है कि “त्रियों की सेना हो और उन्हें युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें "।


(4) वैदिक युग में स्त्री को यह छूट थी कि वह चाहे तो अपना जीवन बिना विवाह किए व्यतीत कर सकती थी। स्त्रियाँ बिना विवाह किए सारा जीवन शिक्षा में व्यतीत कर सकती थीं। (ऋग्वेद संहिता भाग-1, सूक्त-73 श्लोक- 829)।


(5) अथर्ववेद ( 1115118) में कहा गया है कि ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम् ।

अर्थात् एक ब्रह्मचर्य का जीवन बिता चुकी कन्या (ब्रह्मचर्य स्नातक) अपने योग्य उचित पति को प्राप्त करती है। (6) यजुर्वेद (1017) में लिखा गया है कि राजा को प्रयत्नपूर्वक अपने राज्य में सब स्त्रियों को विदुषी बनाना चाहिए।


(7) ऋग्वेद (311123) में कहा गया है कि विद्वानों की यही योग्यता है कि सब कुमार और कुमारियों को पंडित बनाएँ, जिससे सब विद्या के फल को प्राप्त होकर सुमति हों।


(8) ऋग्वेद के 1115216 तथा यजुर्वेद के 11136, 6114, 11159 में भी स्त्रियों को शिक्षा का अधिकार दिए जाने का उल्लेख है। 


(9) वैदिक युग में स्त्रियों को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार था।


(10) वेदों में पुत्रोत्पत्ति के साथ पुत्रियों के भी पैदा होने की कामना व्यक्त की गई है। कन्या का पैदा होना कलंक या दुःख का कारण नहीं, अपितु यश का हेतु माना गया था। इस संबंध में निम्नलिखित


उदाहरण द्रष्टव्य हैं- (i) मेरे पुत्र शत्रु हन्ता हों और पुत्री भी तेजस्विनी हो। (ऋग्वेद 10115913)


(ii) यज्ञ करने वाले पति-पत्नी और कुमारियाँ होते हैं। (ऋग्वेद 813118)


(ii) प्रति पहर हमारी रक्षा करने वाला पूषा परमेश्वर हमें कन्याओं का भागी बनाएँ अर्थात् कन्या प्रदान करें। (ऋग्वेद 9167110)


(iv) हमारे राष्ट्र में विजयशील सभ्य वीर युवक पैदा हों, वहाँ साथ ही बुद्धिमती नारियों के उत्पन्न होने


की भी प्रार्थना है। (यजुर्वेद 22122 ) |


(v) जैसा यश कन्या में होता है, वैसा यश मुझे प्राप्त हो। (अथर्ववेद 1013120) (vi) ऋग्वेद के देवी सूक्त (10112513-10112518) में स्त्री की शक्तिसंपन्नता और सर्वकेंद्रिकता के विषय में बहुत सारी बातें कही गई हैं।