सीमावर्ती राज्यों द्वारा अधीनता - subjugation by border states

सीमावर्ती राज्यों द्वारा अधीनता - subjugation by border states


राज्यों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। इस प्रशस्ति की 23 वीं व 24 वीं पंक्तियों में पूर्वी व पश्चिमी सीमांत प्रदेशों का पृथक-पृथक उल्लेख किया गया है, जिनका वर्णन निम्नलिखित है- 1. पूर्वी सीमांत प्रदेश- हरिषेण ने पाँच पूर्वी सीमांत प्रदेशों का उल्लेख किया है, किंतु पाँचों के नाम के अंत में 'आदि' शब्द का प्रयोग किया है जिससे ऐसा आभास होता है कि इन प्रमुख पाँच राज्यों के अतिरिक्त भी कुछ छोटे-छोटे राज्य रहे होंगे। हरिषेण द्वारा उल्लिखित प्रमुख पाँच राज्य निम्नवत् थे- 


(1) समतट- रायचौधरी के अनुसार समतट से तात्पर्य पूर्वी समुद्र तट से है, इसकी राजधानी कर्मात थी।


(2) डवाक- फ्लीट का विचार है कि आधुनिक ढाका व चटगाँव के स्थान पर यह स्थित था। 


(3) कामरूप - इससे तात्पर्य आसाम से हैं। प्रो. राय का विचार है कि समुद्रगुप्त का समकालीन कामरूप शासक पुष्यवर्मा था, जो हर्षकालीन भास्करवर्मा का पूर्वज था।


(4) नेपाल- समुद्रगुप्त के समय में नेपाल में लिच्छवि-वंश शासन कर रहा था। यह राज्य वैशाली के लिच्छवि राज्य से भिन्न था।


(5) कर्तृपुर स्मिथ व रायचौधरी ने इसका समीरकण कुमाऊँ, गढ़वाल व रूहेलखंड से किया है। 


2. पश्चिमी सीमांत प्रदेश- हरिषेण द्वारा वर्णित पश्चिमी सीमांत प्रदेश में 9 गणराज्य थे, जिनका वर्णन निम्नलिखित है-


(1) मालव- यह एक प्राचीन गणराज्य था। कालांतर में मालव जाति राजस्थान में बस गई थी


जिससे यह प्रदेश मालवा कहलाने लगा।


(2) आर्जुनायन- यह राज्य अलवर व पूर्वी-जयपुर के मध्य स्थित था। 


(3) यौधेय - यह राज्य वर्तमान रोहतक जिले के समीप स्थित था।


(4) माद्रक- माद्रक राज्य पंजाब में था।


(5) आभीर - यह भी एक प्राचीन गणराज्य था। यह पश्चिमी राजपूताना में था।


(6) प्रार्जून- यह मध्यप्रदेश में था।


(7) सनकानिक- यह भी मध्य प्रदेश में ही था।


(8) काक- भिलसा के समीप यह राज्य स्थित था।


(9) खरपरिक- यह दमोह जिले में था।


प्रयाग प्रशस्ति में प्रत्यंत राज्यों की सूची विजित राज्यों की सूची से पृथक दी गई है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि समुद्रगुप्त का इन राज्यों से युद्ध नहीं हुआ था। समुद्रगुप्त से भयभीत होकर स्वयं ही इन राज्यों ने उसकी अधीनता स्वीकार कर ली थी। प्रयाग प्रशस्ति की 22वीं व 23 वीं पंक्तियों से समुद्रगुप्त की इन राज्यों के प्रति नीति के विषय में भी पता चलता है। इन पंक्तियों से ज्ञात होता है कि सीमांत प्रदेशों के शासकों ने निम्नलिखित तरीकों से समुद्रगुप्त को तुष्ट किया- -


(1) आज्ञाकरण आज्ञा मानकर


(2) सर्वकर दान सभी प्रकार के करों को देकर।