पुलकेशिन द्वितीय के उत्तराधिकारी एवं चालुक्य राजवंश का अंत - Successor of Pulakeshin II and end of Chalukya dynasty
पुलकेशिन द्वितीय के उत्तराधिकारी एवं चालुक्य राजवंश का अंत - Successor of Pulakeshin II and end of Chalukya dynasty
642 से 654 ई. तक चालुक्य साम्राज्य में अराजकता की स्थिति बनी रही। इस बीच वहाँ शासन की बागडोर किसके हाथ में थी, इस विषय में निश्चयपूर्वक कुछ भी नहीं कहा जा सकता है। कुछ इतिहासकारों का मत है कि इस अवधि में वहाँ पल्लवों का ही शासन था। अन्य इतिहासकारों ने भी येवूर अभिलेख के आधार पर यह कहा है कि पुलकेशिन की मृत्यु के पश्चात् बादामी में अमर और आदित्यवर्मन चालुक्य राजवंश के शासक नहीं थे। संभवतः वे पल्लवों के प्रतिनिधि अथवा सामंत थे।
654 ई. के आसपास विक्रमादित्य- प्रथम (654-680 ई.) ने अपने नाना गंग नरेश दुर्विनीत की मदद से अपने पैतृक साम्राज्य को पुनः प्राप्त करने में सफलता पाई।
विक्रमादित्य प्रथम पुलकेशिन द्वितीय का द्वितीय, किंतु प्रिय पुत्र था, इसलिए उसे राज्य का उत्तराधिकार मिला। पुलकेशिन द्वितीय का ज्येष्ठ पुत्र चंद्रादित्य- प्रथम किसी दूरस्थ प्रांत का प्रशासक बनाया गया, जबकि पुलकेशिन द्वितीय के एक अन्य पुत्र जयसिंह को विक्रमादित्य प्रथम के द्वारा पल्लवों के विरुद्ध युद्ध में उसकी सहायता देने के पुरस्कारस्वरूप लाट या दक्षिणी गुजरात का प्रशासक बनाया गया।
विक्रमादित्य- प्रथम के शासन काल में पल्लव चालुक्य संघर्ष जारी रहा। अभिलेखों के अनुसार, विक्रमादित्य प्रथम ने महेंद्रवर्मन द्वितीय एवं परमेश्वरवर्मन को युद्ध में परजित किया,
जबकि पल्लवों के साक्ष्य यह घोषित करते हैं कि परमेश्वरवर्मन ने विक्रमादित्य प्रथम पर विजय पाई। संभवत: ऐसा इसलिए है क्योंकि पल्लवों और चालुक्यों के मध्य युद्ध दीर्घकाल तक चला और विजय कभी चालुक्यों को मिली तो कभी पल्लवों को।
विक्रमादित्य प्रथम का उत्तराधिकारी विनयादित्य सत्याश्रय ( 680-696 ई.) था। अभिलेखों में उसका सकलोत्तरापथनाथ' अथवा समस्त उत्तर भारत के सम्राट के रूप में उल्लेख है। यह वर्णन अतिशयोक्तिपूर्ण है, क्योंकि अन्य किसी स्रोत से इसकी पुष्टि नहीं होती है।
संभवतः उसने परवर्ती गुप्तवंश के शासक आदित्यसेन के किसी उत्तराधिकारी के विरुद्ध सैन्य विजय हासिल की। विनयादित्य सत्याश्रय का उत्तराधिकारी विजयादित्य (696-733 ई.) था। बादामी के चालुक्य राजाओं में उसने सबसे लंबी अवधि तक शासन किया। उसका शासनकाल सर्वाधिक शांतिपूर्ण तथा धन एवं समृद्धि से परिपूर्ण था। विजयादित्य के उत्तराधिकारी विक्रमादित्य द्वितीय के शासनकाल (733-747 ई.) में चालुक्यों का पल्लवों के साथ संघर्ष एक बार फिर प्रारंभ हो गया। अभिलेखों से ज्ञात होता है किविक्रमादित्य द्वितीय ने पल्लव राजा नंदीवर्मन को पराजित कर कांची पर अधिकार कर लिया। विक्रमादित्य के शासनकाल में अरबों का आक्रमण हुआ।
अरबों ने सिंध और उसके आसपास के क्षेत्रों पर अधिकार कर दक्कन की ओर बढ़ना प्रारंभ कर दिया। किंतु विक्रमादित्य द्वितीय ने उन्हेंरोकने में सफलता पाई।
बादामी के चालुक्य राजवंश का अंतिम राजा कीर्तिवर्मन द्वितीय ( 747-753 ई.) था। कीर्तिवर्मन द्वितीय पांड्य शासक मारवर्मन राजसिंह द्वारा वेणवयी के युद्ध में पराजित हुआ था। लगभग उसी समय दंतिदुर्ग, जो बादामी के चालुक्यों का सामंत था, ने कीर्तिवर्मन द्वितीय को पराजित किया और 753 ई. में स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। इस तरह बादामी के चालुक्य राजवंश का अंत हो गया और राष्ट्रकूट वंश की स्थापना हुई।
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