रुद्रदामन के उत्तराधिकारी - Successor of Rudradaman

रुद्रदामन के उत्तराधिकारी - Successor of Rudradaman


रुद्रदामन के बाद अन्य शासक हुए जिनके विषय में उनकी मुद्राओं से ज्ञान प्राप्त होता है।


दामध्सद/दामज़द


इस सम्राट के सिक्कों पर इसे राजा महाक्षत्रप रुद्रदामन का पुत्र और राजा क्षत्रप दामसद दामजद का उल्लेख मिलता है। इसने अपने पिता के साथ क्षत्रप के रूप से शासन में सहायता की और वह रुद्रदामन के बाद स्वयं महाक्षत्रप हो गया।


जीवदामन


सिक्कों से ज्ञात होता है कि दामजद का पुत्र जीवदामन ही महाक्षत्रप / राजा हुआ। जीवदामन के सिक्कों पर 100, 119, और 120 (क्रमशः 178, 197 और 198 ई.) तिथियाँ प्राप्त होती हैं,

जिनसे उसके राज्यकाल की अवधि का ज्ञान होता है।



रुद्रसिंह (प्रथम)


यह महाक्षत्रप रुद्रदामन का पुत्र था जो पहले क्षत्रप और बाद में महाक्षत्रप हुआ। उसके सिक्कों पर 102, 118 119 (क्रमशः 180, 196, 197 ई.) तिथियाँ मिलती हैं। इन मुद्राओं से ऐसा प्रकट होता है। कि जीवदामन और उसमें समकालीनता थी। इससे यह सिद्ध होता है कि संभवतः दोनों में उत्तराधिकार के लिए युद्ध हुआ था।


रुद्रसेन (प्रथम)


कालांतर में रुद्रसिंह (प्रथम) के पुत्र रुद्रसेन (प्रथम) ने शासन किया और क्षत्रप काल के सर्वत् 121 (199-200 ई.) में सिक्के चलाए।

122 संवत् (200-201 ई.) द्वारिका के निकट उसका (मलवेसर) लेख प्राप्त हुआ है, जिसमें उसे महाक्षत्रप कहा गया है। वैशाली की एक मोहर में भी उसे महाक्षत्रप कहा


गया है। सिक्कों से ज्ञात होता है कि रुद्रसेन (प्रथम) के बाद उसका भाई सिंहदामन शासक हुआ, जिसका शासन एक वर्ष तक ही रहा। इसी समय मालवा के लोगों ने स्वतंत्रता के लिए युद्धघोष प्रारंभ कर दिया था


और डॉ. अल्तेकर का विचार है कि “223 ई. में मालवों से युद्ध करते हुए सिंहदामन की मृत्यु हो गई।"


सिक्कों से पता चलता है कि सिंहदामन के बाद ही इस वंश का पतन प्रारंभ हो गया और अंतिम शक क्षत्रप स्वामी रुद्रसेन (तृतीय) के समय ही चन्द्रगुप्त (द्वितीय) विक्रमादित्य ने शकों को पराजित कर उनके राज्य को गुप्त साम्राज्य में विलीन कर लिया।


पहवों का इतिहास


भारत के पह्नवों (पारद अथवा पार्थियन राजाओं) का इतिहास अंधकार में है। उनके इतिहास पर कुछ प्रकाश सिक्कों और लेखों से पड़ता है। पार्थिया सीरिया साम्राज्य का एक प्रांत था जिसके गवर्नर अर्सकीज़ ने स्वतंत्र होकर पारद (पार्थियन) राज्य की स्थापना की। शकों के साथ इनका घनिष्ठ संबंध था।

रुद्रदामन (प्रथम) के शासनकाल में उसका एक अमात्य पह्नव भी था, जिसका नाम सुविशाख था। इससे सिद्ध होता है कि शकों की भाँति ही पह्नव ने भी भारत में प्रवेश किया और वे द्वितीय शताब्दी ई. के मध्य तक भारतीय हो गए थे। सुविशाख नाम भारतीयता का परिचायक है। प्रारंभ में पहवों ने काबुल गान्धार और सिंधु को जीत लिया था, ऐसा उसके सिक्कों से सिद्ध होता है।


इस वंश का पहला शासक जिसके विषय में कुछ ज्ञान प्राप्त होता है वह वानानीज़ था। उसने अर्कोसिया और सीस्तान में अपनी सत्ता स्थापित कर 'महाराजाधिराज' की उपाधि धारण की। उसके सिक्के भी प्राप्त होते हैं। उसने 'महरजस् रजसमहतस् की उपाधि भी धारण की थी। इसके सिक्कों पर केवल ग्रीक लेख ही प्राप्त होते हैं। इससे सिद्ध होता है कि अब तक वह भारतीय राज्य से अधिक संबंधित नहीं था।


वानानीज़ के पश्चात् स्पेलिराइसिस सिंहासनारूढ़ हुआ। इसके सिक्कों पर यूनानी लेखों के अतिरिक्त खरोष्ठी लिपि में भारतीय (प्राकृत) लेख भी मिलता है, जिससे इसका संबंध भारतीय भूभागों से सिद्ध होता है।


गोन्दोफनिर्स


गोन्दोफनिर्स इस वंश का सबसे प्रसिद्ध राजा था। तख्तेबही लेख (103 सवंत्) में उसके शासन का साक्ष्य मिलता है कि वह उस समय राज्य कर रहा था। उसकी मृत्यु के पश्चात् धीरे-धीरे इस वंश का पतन होता गया। इस पतन का मुख्य कारण उत्तर-पश्चिमी भारतीय द्वार से कुषाणों का आक्रमण और प्रभुत्व की स्थापना थी।