आदिवासियों का विद्रोह एवं महिलाएं - Tribal Revolt and Women
आदिवासियों का विद्रोह एवं महिलाएं - Tribal Revolt and Women
अंग्रेज़ों के खिलाफ 1767 से 1772 और 1795 से 1816 तक चुआर विद्रोह हुआ था, जिसममें आदिवासियों और अंग्रेज़ो के बीच होने वाला पहला विद्रोह था। यह विद्रोह पश्चिम बंगाल के मिदनापुर, बांकुड़ा और बिहार के जिलों में फैला था। यह विद्रोह अंग्रेजोंके क्रूर शासन और आदिवासियों के जंगल, जमीन एवं प्रकृतिक संसाधन के ऊपर अधिपत्य को लेकर उपजा था। इसमें आदिवासियों ने अपने परंपरागत हथियारों से अंग्रेजों का सामना किया जिसमे उनकी औरतों ने उनका मजबूती से साथ दिया था। एक अंग्रेज मजिस्ट्रेट ने इस विद्रोह के बारे में लिखा है कि अंग्रेजी फौज ने जब इन इलाकों में अपनी छावनियाँ बना ली थी तब,
आदिवासी पुरुष गिरफ्तारी के डर से बचने के लिए जंगलों में शरण ले रखी थी और पहाड़ियों में जा छुपे थे। उस समय वहां की औरतों ने विद्रोह की बागडोर अपने हाथो में ले रखी थी। रात के अंधेरे में वे पुलिस को चकमा देकर जंगल में छुपे अपने पुरुषों को खाना, पानी, हथियार और महत्वपूर्ण खबरें पहुंचाती थीं जिनसे उस विद्रोह में लगे आदिवासियों को विद्रोह में सहूलियत मिली। महिलाओं को कई बार पुलिस ने पकड़ा और अनैतिक अत्याचार किया लेकिन महिलाओं ने उस अत्याचार के बावजूद अपनी जबान नहीं खोली। आदिवासी औरतों के इस योगदान से चुआर विद्रोह को
मजबूती मिली। छोटा नागपुर का कोल विद्रोह 1820 1837 तक चला था।
अंग्रेजो और गैर आदिवासियों द्वारा आदिवासियों के दमन, शोषण और आदिवासी महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ था। इस विद्रोह का मूल आदिवासी महिलाओं के यौन शोषण, दमन के खिलाफ जंग छेड़ना और उनके मान-सम्मान की रक्षा करना था। जहां आये दिन महिलाओं को अपनी इज्जत से तार-तार होना पड़ता था। इससे अजिज होकर आदिवासियों ने गैर-आदिवासियों और अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह किया जिसमें महिलाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर साथ दिया। इस विद्रोह में महिलाओं की सक्रियता प्रतिशोध लेने, खाना- पानी, हथियार और सूचनाएँ पहुंचाने, अपने गाँव की सुरक्षा में थी। इस विद्रोह का कारण औरतें थी इस लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया, जेल में डाला गया, पुलिसिया अत्याचार किया गया, लेकिन महिलाएं डटी रहीं जब तक की उन्हें मजबूर नहीं किया गया।
आदिवासी विद्रोह का चर्चित विद्रोह संथाल 1854 में उपजा था। संथाल विद्रोह जमीदारों, महाजनों और व्यापारियों के खिलफ़ा जंग का ऐलान था, जो आदिवासियों को कर्ज देने, किराया देने के नाम पर इनका शोषण कराते थे और फिर इन्हें गुलाम बना लेते थे। गुलामी की जंजीर इन्हें पीढ़ी दर पीढ़ी निभानी पड़ती थी। इसके कारण संथालों में गुस्सा उबल रहा था और उन्होने इस आतंक के खिलाफ विद्रोह छेड़ दिया। स्वयं न्याय प्राप्त करने के लिए संथाल एक जुट हुए जिसमें लगभग तीस हजार महिलाओं ने भाग लिया था, वे पुरुषों के साथ जुलूस निकालने, सूचना पहुचाने, तीर-धनुष-कुल्हाड़ी चलाने, हमला करने में, जमीदारों के घरों को लूटने और उन्हें बर्बाद करने में साथ रहीं । इस विद्रोह में महिलाओं को पुलिस कैद, अत्याचार, शोषण आदि का सामना करना पड़ा, लेकिन वे अपनी गुलामी को दूर करने के लिए आखिरी दम तक लड़ती रहीं।
महाजनी व्यवस्था, ठेकेदारों और जगीदारों के विरुद्ध उपजे बिरसा मुंडा विद्रोह जो 1895 में बिरसा नामक क्रांतिकारी के प्रयासों से सामने आया। बिरसा ने मांग उठाई कि आदिवासियों को जंगल तथा उसके पास के क्षेत्रों में आदिवासियों को मवेशी चराने एवं जंगल के संसाधनो के पारंपरिक अधिकार से वंचित न किया जाय जिस पर अंग्रेजों ने टैक्स लगा रखा था। इस आंदोलन में महिलाओं ने अपने घर छोड़े और आंदोलन में कूद पड़ीं बिरसा ने अंग्रेजी पुलिस का समाना करने के लिए महिलाओं के अलग समूह बनाए। इस विद्रोह में बड़ी संख्या में औरतें खुल कर सामने आई और साहस के साथ हथियार चलाने, सूचनाएँ पहुंचाने का बखूबी काम किया। जिसमें उन्हें गिरफ्तारी देनी पड़ी और गोली भी खानी पड़ी। कई औरतों को मौत के घाट उतार दिया गया, कई को काले पानी की सजा हुई। यह विद्रोह चार वर्षों तक चला जिसमें महिलाओं ने महती भूमिका का निर्वहन किया।
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