उपनिषद - Upanishads

उपनिषद - Upanishads


उपनिषदों में अनेक विदुषी महिलाओं का नाम आया है। जैसे- सुलभा मैत्रेयी, वडवा पार्थियेयी, गार्गी वाचकनवी। इनका अनेक ग्रंथों में बार-बार नामोल्लेख हुआ है।


उपनिषद काल में स्त्री-शिक्षा पर पर्याप्त ध्यान दिया गया था। इस काल में महिला छात्राएँ दो श्रेणियों में विभाजित थीं- 1. सद्योद्वाहा तथा 2. ब्रह्मवादिनी। सद्योद्वाहा' स्त्रियाँ वे होती थीं, जो ब्रह्मचर्य आश्रम के अनंतर गृहस्थ आश्रम में प्रविष्ट होती थीं तथा उस आश्रम के नियमों का पालन करती हुई मातृत्व के महनीय पद पर प्रतिष्ठित होती थीं। वे समग्र विद्याओं का शिक्षण प्राप्त करती थीं, जो उन्हें सदगृहिणी बनाने में पर्याप्त सहायक होती थीं। संगीत की शिक्षा भी उन्हें दी जाती थी। यजमान पत्नी के रूप में वे अग्न्याधान करने वाले अपने पति के धार्मिक कृत्यों में हाथ बँटाती थीं।

अग्नि के परिचरण के अवसर पर वे सतत विशिष्ट मंत्रों के उच्चारण के साथ हवन कार्य का भी संपादन करती थीं। (उपाध्याय, आचार्य बलदेव वैदिक साहित्य और संस्कृति, शारदा संस्थान, वाराणसी 1998, पृष्ठ-424)। ब्रह्मवादिनी खियाँ उपनिषद् युग की विशिष्टता मानी जा सकती हैं। ये स्त्रियाँ ब्रह्म-चिंतन में तथा ब्रह्मविषयक व्याख्यान में अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देती थीं। वे ब्रह्मतत्व के व्याख्यान तथा परिष्कार में उस युग के महान दार्शनिकों से भी वाद-विवाद एवं शास्त्रार्थ करती थीं। बृहदारण्यकोपनिषद् ऐसी दो ब्रह्मवादिनी नारियों की विद्वत्ता का परिचय बड़े विशद शब्दों में देता है। इनमें से एक हैं- उस युग के महनीय तत्त्वज्ञानी याज्ञवल्क्य ऋषि की धर्मपत्नी मैत्रेयी और दूसरी हैं उसी याज्ञवल्क्य से शास्त्रार्थ करने वाली वाचक्नवी गार्गी (वही, पृष्ठ-425) |