नगरीय व ग्राम्य प्रशासन - urban and rural administration
नगरीय व ग्राम्य प्रशासन - urban and rural administration
ग्राम्य सबसे नीचे की इकाई थी। ग्राम्य को तमिल में उर, परूर (बड़ा गाँव) एवं शिरूर (छोटा गाँव) कहते थे। ग्राम्यों के समूह 'कुर्रम' (तहसील) कहलाते थे। अनेक कुर्रम नाडू (जिला) तथा कई नाडू के समूह 'कोट्टम' (कमिश्नरी) एवं अनेक कोट्टम को मंडलम् (राज्य) कहते थे। मंडलम् राजपरिवार के सदस्यों के अधीन रखे जाते थे। तटीय शहर पट्टिनम, प्रमुख सड़कें सालै और नगर की प्रमुख गली 'तेरू' कहलाती थीं।
नगरीय विकास
संगम युग में कई नगरों का विकास हुआ। टोंडी (आधुनिक पोन्नानी) और मुजरिस चेरकालीन प्रमुख बंदरगाह थे। इनमें मुजरिस भारतरोम व्यापार का प्रमुख केंद्र था। उरैयूर कपास के व्यापार के लिए प्रसिद्ध था।
पुरार चोलकालीन प्रमुख बंदरगाह था। कोकई पांड्य कालीन बंदरगाह होने के साथसाथ मोती निर्यात के लिए भी प्रसिद्ध था। सलापस भी एक प्रमुख पांड्य कालीन बंदरगाह था। संगम युग में व्यापार में वृद्धि एवं उद्योग-धंधों की स्थापना के कारण नगरीय विकास में भी तेजी आ रही थी। कुछ नगर तो किसी वस्तु विशेष के व्यवसाय हेतु विकसित हो चुके थे। संगम युगीन नगरों में पुहार (कावेरीपट्टनम), उयूर, मौ, मुलरी, करपुर एवं कांची विशेषतः प्रसिद्ध नगर थे।
आर्थिक स्थिति
कृषि - चावल, गन्ना, रागी, कपास की खेती की जाती थी । उरैयुर कपास के लिए प्रसिद्ध था। वस्तुतः देश अथवा राज्य की आर्थिक समृद्धि का मूल आधार कृषि ही था। यहाँ की भूमि काफी उपजाऊ थी।
एक अनुश्रुति के अनुसार “भूमि के उपजाऊ होने का प्रमाण इस बात से मिलता है कि जितनी भूमि को एक हाथी बैठ कर घेरता है, उतनी ही भूमि पर सात लोगों के लायक अनाज का उत्पादन होता था।" सिंचाई की व्यवस्था अत्यंत उत्तम थी। नदी व तालाबों का उपयोग सिंचाई हेतु किया जाता था। कारकाल द्वारा कावेरी नदी पर 160 किमी. लंबा बाँध बनाकर उसमें से नहरें निकलवाना उस समय सिंचाई की उन्नत व्यवस्था का संकेत देता है। कृषि कार्य मुख्यतः निम्न वर्ग के लोगों तथा महिलाओं द्वारा किया जाता था। पारी नामक छोटे से राज्य के जंगल में कटहल, शहद एवं चेर राज्य में कटहल, काली मिर्च एवं हल्दी की पैदावार होती थी। एक अनुश्रुति के अनुसार गन्ने की खेती भी प्रारंभ हो गई थी।
हस्तकला उत्पादन- कृषि के साथ-साथ हस्तकला उत्पादन उद्योगों का भी आशातीत विकास हुआ था। तत्युगीन हस्तकला कौशल का प्रतीक बारीक सूती कपड़ा विश्व में प्रसिद्ध था। कवियों ने, बुनकरों द्वारा जटिल बेलबूटे के बुनने की चर्चा की है। रुई और संभवतः रेशम की कताई और बुनाई बहुत ऊँचे स्तर पर पहुँच गई थी। उस समय कताई महिलाओं का अंशकालिक धंधा था। पेरीप्लस का अज्ञात लेखक बताता है कि उरैयुर उस समय सूती वस्त्र व्यवसाय का सर्वप्रमुख केंद्र था। तत्कालीन कविताओं के अनुसार सूती कपड़े साँप के केंचुल या भाप के बादल के भाँति महीन होते थे, उनकी कताई हस्तकला का बेजोड़ नमूना था, क्योंकि आँखें धागों को देख तक नहीं सकती थीं। अतः निश्चित तौर पर सूती कपड़ा हस्तकला उत्पादन का सर्वश्रेष्ठ नमूना था। रैयुर के साथ-साथ मदुई भी प्रख्यात कपड़ा केंद्र था।
स्वर्णकारी एवं समुद्र से मोती निकालने का कार्य भी संगम कालीन प्रमुख उद्योग था। यहाँ से अनेक प्रकार के बहुमूल्य रत्न, हीरे, पारदर्शी पत्थर (रत्न), नीलम, कर्पर (Tortoise Shell) आदि निर्यात किए जाते थे। कोरतई बंदरगाह मोती निर्यात के लिए प्रसिद्ध था। जीवन की आवश्यकताओं संबंधी अधिकांश वस्तुओं का उत्पादन राज्य के अंतर्गत ही होता था।गृह निर्माण, शहरों के निर्माण की योजना, सैनिक अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण तथा कपड़ा बुनना प्रमुख उद्योग थे। इन उद्योगों का प्रमुख आधार हस्तकला उत्पादन ही था। पुहार, उरैयूर, वाणि, टोंडी, मुजरी, मदुरई, कांची आदि हस्तकला उत्पादन के प्रमुख केंद्र थे।
इस प्रकार संगम साहित्य से हमें तत्युगीन साहित्य, समाज एवं संस्कृति की स्पष्ट झाँकी मिलती है। गोविंद प्रसाद उपाध्याय के अनुसार, "संगम कवियों के वर्णन से स्पष्ट है कि चेर, चोल, पांड्य तथा दक्षिण के अन्य राज्यों के अंतर्गत जिस सामाजिक ढाँचे में ब्राह्मण संस्कृति की नैतिकता तथा उच्च आदर्श स्थापित थे, उसी में जनजातीय रीति-रिवाज तथा जीवन मूल्य भी प्रतिष्ठित थे। ” नीलकंठ शास्त्री 17 के अनुसार, "संगम साहित्य तमिल देश की सामाजिक एवं आर्थिक परिस्थितियों जनता के विचारों और आदर्शों तथा उनको जीवित रखने वाली संस्थाओं और कार्यों का पूर्ण तथा वास्तविक विवरण हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है।"
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