हिंदू धर्म में स्त्री - woman in hinduism

 हिंदू धर्म में स्त्री - woman in hinduism


हिंदू धर्म में स्त्री का स्थान विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न रहा है। प्राचीन काल से उत्तरोत्तर उसमें क्षरण की स्थितियाँ देखी गई हैं। हिंदू धर्म में स्त्रियों की स्थिति का आकलन इस प्रकार किया जा सकता हैं-


वैदिक काल


उत्तर वैदिक काल


स्मृति-युग


वैदिक काल


वैदिक काल में स्त्रियों की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर थी। उसे सर्वत्र सम्मान और अधिकार प्राप्त थे। लड़कियाँ ब्रह्मचर्य का पालन करती थीं। आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करती थीं। उस समय सह-शिक्षा के प्रचलित होने के प्रमाण मिलते हैं। वैदिक काल में स्त्रियों को शिक्षा का भरपूर अधिकार था। ऋग्वेद एवं यजुर्वेद में अनेक विदूषियों के उल्लेख मिलते हैं। वेदों में स्त्रियों को अबला नहीं, सबला के रूप में देखा गया है। वेदों में स्त्री संबंधी स्थापनाएँ प्रावधान, धारणाएँ एवं अभिमत निम्नानुसार हैं-


1. वैदिक काल में समस्त धार्मिक कार्य स्त्री अर्थात् पत्नी की उपस्थिति में प्रारंभ एवं संपन्न होते


थे। यह प्रथा हिंदू मतावलंबियों में आज भी यथावत् जारी है। 


2. वैदिक काल में स्त्रियों को यज्ञ में भाग लेने का पूर्ण व पुरुषों के समान अधिकार था।


3. धर्म एवं राजनीति से जुड़े मामलों में स्त्रियों को पुरुष के समान ही महत्त्व एवं अवसर दिए जाते थे।


4. वैदिक युग में लड़कियों को लड़कों की तरह ही शिक्षा प्राप्ति का अधिकार प्राप्त था। स्त्रियों को पुरुषों की तरह ही हर प्रकार की विद्या और शिक्षा जैसे कि वेद -ज्ञान, धनुर्विद्या, नृत्य, संगीत- शास्त्र आदि उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान था।


5. लड़कियों का भी उपनयन संस्कार होता था। इसके बाद ही लड़कियों की विधिवत शिक्षा आरंभ होती थी। ऋक-यजुः - अथर्व संहिताओं में ब्रह्मचारिणी नारियों का उल्लेख है ।

अथर्ववेद में एक स्थान पर कहा गया है, “ब्रह्मचर्य व्रत का पालन कर शिक्षा समाप्त करने वाली कन्याएँ योग्य पति को प्राप्त करती हैं।" ("ब्रह्मचर्येण कन्यानम युवाविन्दते पतिम। - अथर्ववेद, कांड 11, सूक्त-7, मंत्र - 18 ) 1


6. प्राचीन वैदिक काल में स्त्रियाँ पुरुषों के समान ही मंत्रद्रष्ट्री होती थीं। उनमें से कुछ के नाम वैदिक संहिताओं में भी आए हैं, जैसे- लोपामुद्रा, विश्ववारा, सिकता निवावरी, घोषा आदि। 


7. वेदों (यजुर्वेद 10.7) में इस प्रकार का उल्लेख आता है कि राजा को प्रयत्नपूर्वक अपने राज्य में सब स्त्रियों को विदुषी बनाना चाहिए।


8. वैदिक युग में स्त्रियों को अपना जीवन साथी चुनने का अधिकार था। वैदिक युग में पुत्र की तरह पुत्रियों के भी पैदा होने की कामना व्यक्त की गई है। 


9. कन्या का पैदा होना कलंक या दुःख का कारण नहीं, अपितु यश का हेतु माना गया था। 


10. यजुर्वेद ( 22.22) में विजयशील सभ्य वीर युवकों की भाँति बुद्धिमती नारियों के उत्पन्न होने की भी प्रार्थना है।


उत्तर वैदिक काल


1. उत्तर वैदिक काल के प्रारंभिक वर्षों में स्त्रियों की स्थिति वैदिक काल की तरह ही बेहतर थी।


2. उत्तर वैदिक काल में उन्हें शिक्षा का अधिकार प्राप्त था और वे वेदों का अध्ययन कर सकती थीं।


3. उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों को अपना वर चुनने का अधिकार था।


4. उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों के धार्मिक एवं सामाजिक अधिकार वैदिक काल की तरह ही जारी थे।


5. उत्तर वैदिक काल में स्त्रियों के बिना कोई भी मंगल कार्य पूर्ण नहीं होते थे। 


स्मृति-युग


1. स्मृति युग तक आते-आते स्त्रियों के समस्त अधिकारों पर कुठाराघात होने लगा. 


2. स्त्री की परतंत्रता की कहानी स्मृति युग से ही शुरू होती है। मनुस्मृति में कहा गया है कि स्त्री स्वतंत्रता के योग्य नहीं है। बाल्यावस्था में उसे पिता के, युवावस्था में पति के तथा में वृद्धावस्था में पुत्रों के संरक्षण में रहना चाहिए।


3. स्मृति युग में स्त्री को पूरी तरह पति/पुरुष के अधीन बना दिया गया।मनु स्मृति में कहा गया है कि पति की सेवा करना तथा हर हाल में उसकी आज्ञा का पालन करना स्त्री का धर्म है।


4. पति चाहे नपुंसक हो, आलसी हो, नशेड़ी हो, रोगग्रस्त हो या परस्त्रीगामी हो, पत्नी उसकी हर आज्ञा का पालन करे।


5. मनु स्मृति में कहा गया है कि पति चाहे स्त्री को बेच दे या उसका परित्याग कर दे, किंतु वह उसकी पत्नी ही कहलाएगी।


आज भी लगभग यही धारणाएँ समाज में प्रचलित हैं।