इतिहास लेखन में महिलाएं : फारूक शाह - Women in History Writing: Farooq Shah
इतिहास लेखन में महिलाएं : फारूक शाह - Women in History Writing: Farooq Shah
उपरोक्त पक्तियां एक अनुशासन के रूप में इतिहास की एक अलग तस्वीर प्रस्तुत करती हैं जो मानव इतिहास में स्त्रियों को अदृश्य कर दिए जाने के प्रश्न को अत्यंत गंभीर रूप में उठाती हैं। इतिहास का क्षेत्र बहुत व्यापक है। प्रत्येक व्यक्ति, विषय, आंदोलन आदि का इतिहास होता है, यहाँ तक कि इतिहास का भी अपना इतिहास होता है। अतएव यह कहा जा सकता है कि दार्शनिक, वैज्ञानिक आदि अन्य दृष्टिकोणों की तरह ऐतिहासिक दृष्टिकोण की अपनी निजी विशेषता है। वह एक विचारशैली है जो प्रारंभिक पुरातन काल से और विशेषतः 17वीं सदी से सभ्य संसार में व्याप्त हो गई थी। 19वीं सदी से प्रायः प्रत्येक विषय के अध्ययन के लिए उसके विकास का ऐतिहासिक ज्ञान आवश्यक समझा जाने लगा था।
इतिहास के अध्ययन से मानव समाज के विविध क्षेत्रों का जो व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त होता है उससे मनुष्य की परिस्थितियों को आँकने, व्यक्तियों के भावों और विचारों तथा जनसमूह की प्रवृत्तियों आदि को समझने के लिए और अच्छी खासी कसौटी मिल जाती है। स्त्री प्रश्न पर सबाल्टर्न इतिहासकारों का मत है कि राष्ट्र में स्त्रियों की अपनी एक स्वतंत्र सामुदायिक अस्मिता है। पार्थ चटर्जी राष्ट्र और उसकी महिलाएँ में व्यक्त स्थापनाओं द्वारा घोषित करते हैं कि, राष्ट्र के इतिहास के अंतर्गत स्त्रियों का इतिहास लिखा जाना उनके साथ विश्वासघात है।
अब तक जितने भी समाजों का इतिहास हमें ज्ञात है, खियाँ उन सभी में परिवार और समाज दोनों में पुरुषों के मातहत ही रही हैं।
पूरे सामाजिक ढाँचे में सर्वाधिक शोषित- उत्पीड़ित तबकों में ही उनका स्थान रहा है। जब वर्ग समाज का प्रादुर्भाव हो रहा था और निजी स्वामित्व के तत्व और मानसिकता पैदा हो रही थी उसी समय पितृसत्तात्मक व्यवस्था अस्तित्व में आ चुकी थी, और स्वाभाविक तौर पर, उसके प्रतिरोध की स्त्री चेतना भी उत्पन्न हो चुकी थी जिसके साक्ष्य हमें अलग-अलग संस्कृतियों की पुराणकथाओं और लोकगाथाओं में आज भी देखने को मिल जाते हैं। परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि अब तक भारतीय इतिहास लेखन की दृष्टी पुरुषवादी ही रही है। नतीजतन महिलाओं के शिशुपालन, कृषिकार्य जैसे क्रिया-कलाप और लोककला को महत्वहीन मानकर उनका सही मूल्यांकन नहीं किया गया। सभ्यता के शुरुआत से ही महिलाओं को इतिहास से अलग निकाल कर रखा गया है।
इतिहास लेखन में उनकी उपलब्धियों को बौद्धिक रूप से पुरुषों की तुलना में कम आँका गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि किन कारणों से उन्हें इतिहास में लगभग अदृश्य कर दिया गया है? यह एक सच्चाई है की इतिहास में महिलाओं ने बहुत लंबा सफर तय किया है लेकिन किन्हीं कारणों से उन्हें उनके इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान नहीं किया गया और ना ही नारीवादी इतिहास लेखन अबतक एक अनुशासन के रूप मे नहीं उभर पाया है। महिलाओं की स्थिति का एहसास इसी बात से हो जाता है अबतक दर्ज असंख्य इतिहासों में महिलाएं की अनुपस्थिति हैं। वो पूर्णतः पुरुषों पर केंद्रित हैं। अठारहवीं सदी के अंत एवं बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई ठोस इतिहास नहीं मिलता।
सिर्फ छिटपुट तरीके से उनका जिक्र भर मिलता है। यही वह क्षण है, जब स्त्री आंदोलन व देश में हुए आंदोलनों का पुर्नमूल्यांकन जरुरी है ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके। सिंधु घाटी सभ्यता, हडप्पा एवं मोहनजोदडो के ऐतिहासिक अध्ययन से यह पता चलता है कि वहां की सभ्यता, संस्कृति, आभूषण, पक्के मकान मिट्टी के बर्तन इत्यादि वस्तुएं विकसित थीं परंतु वहाँ पर स्त्रियों के बारे में कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है।
सैद्धांतिक आधार
18 वीं और 19 वीं सदी में एक आधुनिक अकादमिक विषय के रूप में इतिहास लेखन को मान्यता मिलनी प्रारंभ हुई और पश्चिम के साथ-साथ पूर्वी देशों में भी विभिन्न धर्मों,
संस्कृतियों और समुदायों के इतिहास पर शोध करने का काम शुरू हुआ। एक ओर राजनैतिक सामाजिक स्थितियां बदलने से इतिहास लेखन की आवश्यकता का अनुभव किया गया तो दूसरी ओर इतिहास के निर्माण और व्याख्या के विभिन्न दृष्टिकोणों के जरिए विभिन्न समुदायों की राजनैतिक, सामाजिक आकांक्षाओं को नया रूप मिलना आरंभ हुआ। सार्वजनिक जीवन में और इतिहास के दस्तावेज में स्त्रियाँ अदृश्य रही हैं, स्त्री आंदोलन का यह वास्तविक केंद्र बिंदु रहा है। कुछ राजघरानों की स्त्रियों तथा प्राचीन काल में प्रसिद्धि प्राप्त स्त्रियों एवं राजनैतिक आंदोलनों से जुड़ी कुछ गिनी-चुनी स्त्रियों को छोड़ दें तो अन्य स्त्रियों को शामिल करने का प्रयत्न इतिहास लेखन में दिखाई नहीं देता है। ज्यादातर परंपरागत इतिहासकारों ने,
पुरुष सत्ता के वर्चस्व में कार्य करने वाले इतिहासकारों ने स्त्रियों के इतिहास की खोज करने की जरूरत महसूस नहीं की। समाज में पिछड़े, दलित, आदिवासी समुदाय के इतिहास को भी प्रमुखता नहीं मिली। कुछ वर्षों से इतिहास लेखन में कुछ अपवाद को छोड़कर इतिहास लेखन सत्ता और वर्चस्व के बीच बट गया। जो केंद्र में सत्तारूढ़ पक्ष है, उनका इतिहास रखा गया। इस कारण सत्ता के बाहर रहने वाली सभी स्त्रियों को इतिहास में अदृश्य कर दिया गया, अगर उनका समावेश होता तो इतिहास सर्व-समावेशी होता। आजादी के बाद देश में जो समाजिक, आर्थिक व राजनैतिक बदलाव हुए उस बदलाव में स्त्रियों की साझेदारी रही है।
साझेदारी से ज्यादा उसने घर और बाहर के मोर्चे पर दोहरी लड़ाई लड़ी। पर ये लड़ाईयां इतिहास के पन्नों में दर्ज नहीं हुई। जो कुछ नाम दर्ज हैं वे इसलिए कि इन नामों के बिना इतिहास लिखा नहीं जा सकता था वर्जीनिया वुल्फ ने एक जगह लिखा है 'इतिहास में जो कुछ अनाम है वह औरतों के नाम है। इतिहास में औरतों की भूमिका हमेशा से अदृश्य रही है। उसकी एक वजह है कि हम इतिहास चेतन नहीं रहे। इतिहासकारों ने प्रतीकों, लोक गाथाओं, गीतों व अन्य स्रोतों को कभी समेटने की कोशिश नहीं की। हम जानते हैं कि व्यवस्थित रुप से इतिहास रचने की मंजिल पर पहुंचने से पहले ऐसे सभी समुदाय पहले चरण में आत्मगत ब्योरों का इस्तेमाल करते हैं
ताकि उनकी बुनियाद पर इतिहास लिखने की इमारत खड़ी की जा सके। आशा रानी वोरा ने जब महिलाएं और स्वराज किताब लिखना शुरु किया तो उन्हें तथ्य जुटाने में 12 वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगी तो गहरी निराशा हुई । “आधा आसमान हमारा, आधी धरती हमारी, आधा इतिहास हमारा" यह युक्ति आज भी प्रासंगिक लेकिन इतिहास में महिलाओं ने अनेक आंदोलन किये और लड़ाइयाँ लड़ीं लेकिन इतिहास के पन्नो में गिनी-चुनी महिलाओं को छोड़कर अन्य महिलाओं के योगदान पर प्रकाश नहीं डाला गया। देश का शायद ही कोई ऐसा कोना होगा जहां महिलाओं ने अपना योगदान, समर्पण, बलिदान न दिया हो।
पिछले कुछ सालों में इतिहासकारों ने एक स्वतंत्र क्षेत्र के रूप में महिलाओं के इतिहास पर काम शुरू कर दिया है
जो संक्षिप्त अवधि में एक वैचारिक रूपरेखा और वैज्ञानिक प्रणाली तैयार करने की मांग करता है। पहले स्तर पर पारंपरिक रूप से इतिहास लिखने में महारत हासिल किए इतिहासकारों द्वारा महिलाओं की गाथा का वर्णन करते हुए महिलाओं की दृष्टिकोण से इतिहास लेखन का कार्य करवाया गया। वो कौन सी महिलाएं हैं जो इतिहास से नदारद हैं, उपलब्धियों से भरपूर महिलाएँ कौन हैं, उनकी उपलब्धि क्या है? और इसका नतीजा यह निकला की जो इतिहास सामने आया उसमे मुट्ठी भर ख्याति प्राप्त महिलाओं का ही इतिहास सामने आ पाया और उससे भी उनके उन कार्यों का पता नहीं चल पाया जिनमें महिलाएँ ज्यादातर खुद को व्यस्त रखती हैं
और नहीं संपूर्ण समाज में महिलाओं के वे महत्वपूर्ण कार्य ही सामने आ पाए जिनमे महिलाओं का योगदान सबसे अधिक होता है। चुनिन्दा ख्यातिप्राप्त महिलाओं का इतिहास संपूर्ण महिलाओं का इतिहास नहीं हो सकता। इस दृष्टि ने इस बात पर बल दिया कि इतिहास में अलग अलग वर्ग के महिलाओं को अलग अलग तरीके से प्रस्तुत किया जाए। कारण था कि हर वर्ग की महिलाओं का अपना अलग अलग ऐतिहासिक अनुभव था। महिलाओं की चेतना के संबंध में भी एक अलग अनुभव रहा है। उनकी सारी चेतना या तो पुरुषों द्वारा तैयार की गई है या फिर महिलाओं के लिए विशेष रूप तैयार किए गए के इतिहास का नतीजा है जिसे वो सहज मान लेती हैं और उसको खुद मे अंगीकार करती हैं। जैसे जैसे महिलाओं में चेतना का विकास हुआ उन्होंने अपना ध्यान महिलाओं की जरूरतों की तरफ दिया। उन्होने उनके खुद के उत्थान के तरफ ध्यान देना शुरू किया। उन्होने खुद को वेश्यावृति से खुद को अलग किया तथा शिक्षा की तरफ रुख किया। लेकिन इससे केवल महिलाओं की पारंपरिक भूमिका में ही सुधार हुआ। लेकिन उनकी एक अलग समूह के रूप मे पहचान बननी शुरू हुई।
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