इस्लाम में स्त्रियों के अधिकार - women's rights in islam

इस्लाम में स्त्रियों के अधिकार - women's rights in islam


2.1.6.1. जीने का अधिकार इस्लाम ने चौदह सौ साल पहले स्त्री को वह मुकाम दिया है, जो आज - के जीने का अधिकार कानून भी उसे नहीं दे पाए हैं। स्त्रियों को जीने का अधिकार इस्लाम में बाकायदा दिया गया है। कुरान (16:58-59) में उन माता-पिता को लताड़ा गया है, जो बेटी के जन्म पर दुःखी होते हैं। इसी तरह कुरान की एक आयत (81:8-9 ) में लड़कियों को जिंदा गाड़ देने के कृत्य की भर्त्सना की गई है। सूरतुन नह (16:58-59) में भी इसकी मलामत की गई है।


2.1.6.2. वर चुनने का अधिकार इस्लाम ने स्त्री को यह अधिकार दिया है कि वह किसी के विवाह- प्रस्ताव को स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकती है।

इस्लामी कानून के अनुसार किसी स्त्री की विवाह उसकी स्वीकृति के बिना या उसकी मर्जी के विरुद्ध नहीं किया जा सकता। बीवी के रूप में इस्लाम औरत को इज्जत और अच्छा ओहदा देता है। कोई पुरुष कितना अच्छा है, इसका मापदंड इस्लाम ने उसकी पत्नी को बना दिया है। इस्लाम कहता है कि अच्छा पुरुष वहीं है, जो अपनी पत्नी के लिए अच्छा है। यानि इन्सान के अच्छे होने का मापदंड उसकी हमसफर है। जैसा कि पैगंबर मुहम्मद सल्ल ने फरमाया-


"तुम में से सर्वश्रेष्ठ इन्सान वह है जो अपनी बीवी के लिए सबसे अच्छा है।"

(तरमिजी, अहमद)। 2.1.6.3. संपत्ति में अधिकार इस्लाम में औरत को बेटी के रूप में पिता की जायदाद और बीवी के - रूप में पति की जायदाद का हिस्सेदार बनाया गया है। संपत्ति के अधिकार के विषय में इस इकाई के अंश 2.1.4 में भी बात की गई है।


2.1.6.4. लैंगिक समानता का अधिकार इस्लाम में स्त्री-पुरुष को बराबर का दर्जा हासिल है। - पैगंबर सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम ने सूचना दी है कि मानवता के अंदर स्त्री, पुरुष के बराबर है। उन्होंने फरमाया है- “महिलाएँ पुरुषों के समान हैं।" (इसे अहमद अबू दाउद और त्रिमिजी ने रिवायत किया है।) ( पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम और महिला का सम्मान (हिंदी), संकलन अताउर्रहमान जियाउल्लाह, इस्लामी आमंत्रण एवं निर्देश कार्यालय रब्वा, रियाज़ सऊदी अरब; (1429-2008)।