राजेंद्र प्रथम (1014 ई.-1044 ई.) - दक्षिण भारतीय साम्राज्य : चोल साम्राज्य - Rajendra I (1014 AD-1044 AD) - South Indian Empire: Chola Empire
राजेंद्र प्रथम (1014 ई.-1044 ई.) - दक्षिण भारतीय साम्राज्य : चोल साम्राज्य - Rajendra I (1014 AD-1044 AD) - South Indian Empire: Chola Empire
राजराज- प्रथम का उत्तराधिकारी राजेंद्र प्रथम था। राजेंद्र प्रथम के शासनकाल की गणना 1012 ई. से की जाती है। इसी वर्ष उसे राजराज- प्रथम द्वारा युवराज घोषित किया गया था। लगभग दो वर्षों तक उसने अपने पिता के साथ संयुक्त रूप से शासन किया। उसका राज्याभिषेक 1014 ई. में संपन्न हुआ। अपने पिता राजराज प्रथम द्वारा स्थापित परंपरा का अनुसरण करते हुए उसने भी 1018 ई. में अपने पुत्र राजाधिराज को युवराज घोषित किया।
राजेंद्र प्रथम ने संपूर्ण श्रीलंका पर विजय पाई। महेन्द्र पंचम को बंदी बनाकर चोल राज्य में लाया गया,
जहाँ 12 वर्षों बाद उसकी मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद उसका पुत्र, कस्यप चोलों के विरुद्ध सिंहली विरोध का केंद्र बना और एक दीर्घकालीन युद्ध के पश्चात् जिसमें सिंहलियों द्वारा भारी संख्या में तमिल चोलों को मारा गया, वह श्रीलंका के दक्षिणी भाग, अर्थात् रोहण का राजा बना और उसने विक्रमबाहु-प्रथम के रूप में शासन किया। राजेंद्र प्रथम ने चेर और पांड्य राज्यों पर भी विजय प्राप्त की । उसने उन्हें अपने राज्य में मिला लिया और अपने एक पुत्र को संयुक्त रूप से दोनों प्रदेशों का प्रशासक नियुक्त किया।
चालुक्य अभिलेखों से ज्ञात होता है कि कल्याणी का शासक जयसिंह द्वितीय चालुक्य जो 1016 ई. के आसपास कल्याणी में सिंहासनारूढ़ हुआ था, राजराज प्रथम के शासनकाल में हुए युद्ध में चोलों द्वारा अधिकृत क्षेत्रों को पुनः प्राप्त करने हेतु प्रयत्नशील था। 1019 ई. के बेलगाँवे अभिलेख में उसे चोलों को पराजित करने वाला बताया गया है। इस बात की पुष्टि बेलारी और मैसूर के उत्तर-पश्चिम में उपलब्ध उसके अभिलेखों से भी होती है। किंतु चोल अभिलेखों से पता चलता है कि 1022 ई. के आस-पास मुसंगी अथव मुयंगी में राजेंद्रप्रथम एवं जयसिंह द्वितीय के बीच एक युद्ध हुआ था, जिसमें जयसिंह द्वितीय पराजित हुआ। इतिहासकारों का मत है कि इस युद्ध का चाहे जो भी परिणाम रहा हो, इतना तय है कि इसके बाद दोनों राजाओं ने तुंगभद्रा नदी को अपने-अपने राज्य की सीमा मान लिया।
राजेंद्र चोल के समय में वेंगी ने पुनः चोल-चालुक्य संघर्ष के लिए अवसर प्रदान किया। 1019 ई. में वेंगी के शासक विमलादित्य की मृत्यु के पश्चात् कल्याणी के जयसिंह द्वितीय चालुक्य ने विमलादित्य और कुंडवा के पुत्र राजराज विष्णुवर्धन के विरुद्ध उसके सौतेले भाई विष्णुवर्धन विजयादित्य - सप्तम का समर्थन किया। ऐसी स्थिति में राजराज विष्णुवर्धन ने राजेंद्र चोल- प्रथम की मदद से अपने प्रतिद्वंद्वियों पर विजय पाई । इतिहासकारों का मत है कि कलिंग और ओइड के राजा भी जयसिंह द्वितीय चालुक्य और उसके आश्रित विजयादित्य- सप्तम के साथ मिल गए थे और चोल सेना को उनसे भी निपटना पड़ा।
अभिलेखों से ज्ञात होता है कि 1022 ई. में राजेंद्र प्रथम का उत्तर भारतीय सैन्य अभियान गंगा की तीर्थयात्रा से अधिक कुछ नहीं था, किंतु नीलकंठ शास्त्री इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनका मत है कि यद्यपि गंगाजल लाने की बात इस अभियान के प्रारंभिक उद्देश्यों में थी, फिर भी उसका प्रधान उद्देश्य
चोल साम्राज्य की शक्ति का प्रदर्शन तथा उत्तरी भारत के राजाओं को उसके बल का अहसास कराना था। इस अभियान की समाप्ति पर राजेंद्र चोल ने गंगईकोंडचोल की उपाधि धारण की और कावेरी नदी के मुहाने पर गंगईकोंडचोलपुरम नामक नगर की स्थापना की।
राजेंद्र प्रथम को अपनी इस नई राजधानी से अपार स्नेह था। यहाँ उसने विशाल बृहदीश्वर मंदिर का निर्माण करवाया। राजेंद्र की इस राजधानी को संस्कृत में गंगापुरी कहा गया है। इसके उत्तर में एक विशाल सरोवर था, जिसे तिरुवालगाड़ ताम्रपत्रों में चोल गंगम कहा गया है।
राजेंद्र प्रथम के उत्तरी एवं समुद्रगुप्त के दक्षिणी अभियानों में दो दृष्टियों से समानता पाई जाती हैं। एक तो यह कि दोनों राजाओं ने एक ही मार्ग का अनुसरण किया और दूसरा यह कि दोनों राजाओं में से किसी की विजय स्थायी सिद्ध नहीं हो सकी,
किंतु इसके बावजूद राजेंद्र चोल के आक्रमण ने बंगाल पर कुछ स्थायी प्रभाव छोड़े। आर.डी. बनर्जी कहते हैं कि एक अल्पज्ञात कर्नाट सरदार ने राजेंद्र चोल-प्रथम का अनुसरण किया और वह पश्चिम बंगाल में बस गया। सामंत सेन उसी का वंशज था जिसे सेन वंश का संस्थापक माना जाता है।
राजेंद्र चोल के शासनकाल के अंतिम वर्षों में 1042 ई. के आसपास कल्याणी के शासक सोमेश्वर-प्रथम (1042 ई.-1068 ई.) ने वेंगी पर आक्रमण कर दिया। वेंगी के शासक,
राजराज विष्णुवर्धन ने एक बार फिर राजेंद्र प्रथम से सहायता माँगी। राजेंद्र प्रथम ने इस बार अपने! पुत्र राजाधिराज प्रथम को वेंगी भेजा। यदि चोल अभिलेखों में उल्लिखित दावों को सही मान लिया जाए तो इसका अर्थ यह होगा कि राजाधिराज के नेतृत्व में चोल सेना ने चालुक्यों को कई स्थानों में पराजित किया। किंतु इस काल के अन्य अभिलेखों से वेंगी पर सोमेश्वर-प्रथम के शासन की पुष्टि होती है। इसलिए इस बात की संभावना अधिक है कि राजराज विष्णुवर्धन ने चोलों का साथ छोड़ दिया और सोमेश्वर-प्रथम से संधि कर ली।
राजेंद्र प्रथम दक्षिण पूर्व एशिया में अवस्थित श्रीविजय साम्राज्य के विरुद्ध अपने नौसैनिक अभियान के लिए ख्यात है।
इस अभियान में चोल नौसेना ने राजधानी श्रीविजय एवं कडारम सहित कई स्थानों पर विजय प्राप्त की। राजा संग्राम विजयोतुंगवर्मन बंदी बना लिया गया किंतु उसे चोलों का प्रभुत्व स्वीकार कर लेने की शर्त पर रिहा कर दिया गया और उसे उसका राज्य वापस कर दिया गया। राजराज- प्रथम के समय एवं राजेंद्र प्रथम के शासनकाल के प्रारंभिक वर्षों में श्रीविजय एवं चोल साम्राज्य के बीच मैत्रीपूर्ण संबंध थे। फिर भी राजेंद्र प्रथम ने श्रीविजय पर आक्रमण किया। कुछ इतिहासकारों का मत है कि राजेंद्र प्रथम दक्षिण पूर्व एशिया में अपना साम्राज्य स्थापित करना चाहता था। किंतु अन्य इतिहासकार इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनके अनुसार राजेंद्र प्रथम के शासनकाल में श्रीविजय साम्राज्य ने भारत और चीन के बीच व्यापार के मार्ग में कोई बाधा खड़ी कर दी थी। इसी कारण राजेंद्र प्रथम और श्रीविजय साम्राज्य के बीच युद्ध की स्थिति बनी।
करदै ताम्रपत्रों से विदित होता है कि राजेंद्र प्रथम ने कंबुज से मैत्रीपूर्ण संबंध रखे। कंबुज एक हिंदू राज्य था जिसकी स्थापना भारतीयों द्वारा आधुनिक कंबोडिया में की गई थी। जनश्रुतियों के अनुसार, इस राज्य की स्थापना कौण्डिन्य नामक एक भारतीय ने दूसरी सदी में की थी। राजेंद्र प्रथम के समय कंबुज में सूर्यवर्मन प्रथम (1002-50 ई.) का शासन था। यहीं विष्णु को समर्पित अंकोरवट का मंदिर है, जिसका निर्माण सूर्यवर्मा द्वितीय (1050-66 ई.) ने करवाया था।
अपने पिता, राजराज- प्रथम की भाँति राजेंद्र प्रथम की भी कई उपाधियाँ थीं। उनमें मुडिगोंड चोल, पंडित चोल विक्रमचोल आदि उल्लेखनीय हैं। उसे एक स्थान पर वीर राजेंद्र भी कहा गया है। लेकिन स्वयं राजेंद्र प्रथम की राय में इन सबसे श्रेष्ठ गंगैकोंडचोल की उपाधि थी। इस नाम से यह सूचित होता है कि उसने जो नई राजधानी स्थापित की थी, उससे उसे गहरा लगाव था।
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